हास्य व्यंग्य


पिछ्ले हफ्ते मौन थे इसलिये नहीं कि किसी भाई ने धमकाया / समझाया हो कि मौन रहूं बल्कि इसलिये कि रोटी देने वाले ने भेज दिया किसी काम से और हम मजदूर की तरह चल दिये …यानि कि ऑफिस के काम से हमें शहर के बाहर जाना पड़ा . लप्पू-ट्प्पू (लैपटौप) तो साथ था पर मुए विचार थे कि आ ही नहीं रहे थे. लगता है हमारा शब्दज्ञान कुछ कम ही है .क्योकि कल ही पता चला कि शब्दों के बिना विचार नहीं आते. आ तो अब नहीं रहें हैं पर क्या करें मजबूरी है . कुछ ना कुछ तो लिखना ही पड़ेगा …

आजकल पता नहीं लोग शब्दों के पीछे क्यों पड़ गये हैं . कोई “नि:शब्द” दिखा रहा है तो कोई “शब्दों” की महत्ता बतला रहा है . कहा गया ..शब्दों का ज्ञान व्यक्ति के अनुभव की पहचान है . सही बात.. इसीलिये तो अपना देश महान है क्योकि अपने पास तो शब्दों की खान है. अब पुराने कवियों को ही देख लें .हमारे पुराने कवियों ने शब्दों को अनेक अर्थों में प्रयोग किया . एक ही शब्द अलग अलग जगह अलग अलग अर्थ दे जाता है. बचपन में हमें बताया गया शब्दों का ऎसा प्रयोग ‘यमक अलंकार’ भी कहलाता है . जैसे “कनक कनक ते सौ गुनी , मादकता अधिकाय “ … और कहीं पढ़ाया गया “रहिमन पानी राखिये , बिन पानी सब सून “ इसका अर्थ तो तब मालूम ही नहीं था . हम सोचते थे कि रहीम दास जी बता रहे है कि “टॉयलेट में पानी हमेशा रखो , बिना पानी के टॉयलेट का क्या मतलब ‘ अब उस जमाने में नल और टंकी तो होती नहीं थी. पानी रखना पड़ता था . इसीलिये ये बात आयी .

वैसे शब्द केवल कोरे शब्द नही है . शब्द अपने निहित अर्थों में महत्वपूर्ण हैं . शब्दों का चतुर प्रयोग और चतुर अर्थ विश्लेषण शब्दों को नये अर्थों में परिभाषित करता है . अब किसने सोचा था कि ‘तटस्थ’ (तट पर स्थित) रहने वाले ‘समय’ के पीछे हाथ धोकर पड़ जायेंगे . अब आप पूछेंगे कि उन्हें हाथ धोने की आवश्यकता क्यों पड़ी . शायद आपने ध्यान दिया हो उन्होने लिखा था कि “सोचते सोचते हमारी दशा शोचनीय हो गयी” अब शौच के बाद हाथ तो धोएंगे ही ना.

शब्द भले ही अपने अर्थों से महत्वपूर्ण हों पर हमें तो ये शब्द हमेशा कंफ्यूजियाते है. कब किस शब्द का क्या अर्थ होगा समझना थोड़ा कठिन हो जाता है.हमने कभी लिखा था .

“नाग के फन को देखकर , सपेरा अपना सारा फ़न भूल गया , और उस फन गेम में भी फनफनाने लगा ”
यहां फन शब्द तीन अर्थों में प्रयोग में आया है . हिन्दी का फन उर्दू का फ़न और फिर अंग्रेजी का फन .

ऎसी ही एक दिन “ फूल लेकर फूल आया , हमने फूलकर कहा फूल क्यों लाये हो तुम तो खुद ही फूल हो” ( यहां एक फूल हिन्दी का है तो एक अंग्रेजी का )

महाकवि भूषण की यह कविता तो आपको याद होगी ही ना

’ऊँचे घोर मन्दर के अन्दर रहन वाली,
ऊँचे घोर मन्दर के अन्दर रहाती हैं
नगन जड़ाती थी , वो नगन जड़ाती हैं
तीन बेर खाती थी, वो तीन बेर खाती हैं’

(इस कविता में युद्ध में हारे हुए राजाऑं कि रानियों कि दशा का वर्णन है . भूषण कहते है कि जो ऊँचे बड़े महलों के अन्दर रहती थी,वह अब ऊँची घोर गुफाओं के अन्दर रहती हैं. पहले जो नगीनों आभूषणों से जड़ी रहती थी , अब को कपड़ों की कमी से नग्न हो सर्दी में ठिठुरती हैं .जो दिन में तीन बार खाती थी, अब वो सिर्फ तीन बेर खाकर जिंदा हैं )

तो ये है शब्दों और उनके अर्थों का चमत्कार . अब कुछ दोहे मेरे भी सुन लें

शब्दों की पड़ताल में , मिले शब्द अनुकूल
‘फूल’ ढूंढने हम चले , खुद ही बन गये ‘फूल’

‘सफर’ कठिन है आजकल , करें ‘सफर’ बिन बात
गरमी तो चिपचिप करे, और घमौरी साथ

‘सोना’ दूभर हो गया , अब सपनों के संग
सोना’ चांदी बन गये , जब दहेज के अंग

मन की गहरी ‘पीर’ को , मिले कौन सा ‘पीर’
चादर चढ़े विश्वास की , बेबस है तकदीर

‘आम’ हो गये ‘आम’ अब , ये गरमी का रूप
तरबूजे तर कर गये , निकली जब जब धूप

शब्द रहे सीधे सादे, अर्थ हो गये गूढ़
‘भाव’ बढ़ गये भीड़ के,‘भाव’ ढूंढते मूढ़

जितने जितने शब्द मिले , उससे ज्यादा अर्थ
हम तो बौड़म ही रहे , वो कर गये अनर्थ

dogकल अपने क्लिनिक पर बैठे थे तो एक व्यक्ति आये . अब आप कहेंगे कि मैने कभी बताया ही नहीं कि मैं डाक्टर हूँ …हमने तो कल तक आपको ये भी नहीं बताया था कि हम ‘कागाधिराज’ हैं….चलो आपके गिले शिकवे फिर कभी …अभी तो आप कल की बात सुनिये. 

जी हाँ मैं डाक्टर हूं और कुत्तों का कुत्ते के काटने का इलाज करता हूँ.कल एक व्यक्ति आये ….

गोल गोल मुंह, छोटे छोटे बाल.. आँखों में फोटो-क्रोमेटिक चश्मा …जो कि थोड़ा भूरा भूरा सा हो गया था … शायद धूप में आये थे. ..गले में गुलाबी रंग का गमछा सा कुछ…आसमानी सी शर्ट या फिर कुर्ता …वो आये और आकर मुस्कुराने लगे.

हम किसी कौवे को गुजरात भेजने के फरमान की तैयारी करने में व्यस्त थे . उसी व्यस्तता के बीच उनको सर उठा के देखा तो लगा कि वो ऎसे मुस्कुरा रहे हैं जैसे कोई समुद्र किनारे फोटो खिचवाने के लिये खड़े हों.हम कुछ बोलने के लिये मुँह खोलें इससे पहले ही वो बोल पड़े….

आज खुश तो बहुत होगे तुम ..!!

क्यों भाई क्या हुआ ?

आजकल बहुत मरीज आ रहे हैं ना तुम्हारे पास….उन्होने व्यंगात्मक लहजे में पूछा.

वैसे पिछ्ले कुछ दिनों से मरीज तो खूब आ रहे थे पर इस ओर ध्यान नहीं गया था… हाँ पर….??

क्या तुम्हें मालूम है कि क्यों आ रहे हैं….???

उन्होने फिर पूछा..नहीं मुझे तो नहीं मालूम …. मैने अज्ञानता जतायी.

तुम्हें नहीं मालूम कि कुछ दिनो से यहां कुछ कुत्तों का आतंक छाया हुआ है..

कुत्तों का आतंक ..???  कैसा आतंक …!!

यहां किसी एक मोहल्ले में आजकल कुछ कुत्तों ने डेरा जमा लिया है और हर आने जाने वाले पर पहले गुर्राते हैं फिर काट लेते हैं . आज तो पता चला है कि उनमे से कुछ कुत्ते पागल भी हो गये हैं.

जरूर हो गये होंगे ..क्योकि अमूमन तो कुत्ता ऎसे काटता नहीं क्योकि कुत्ता तो बहुत वफादार होता है. हमने अपना ‘कुत्ता ज्ञान’ बधारते हुए कहा.

क्या पता अपने मालिक की वफादारी ही कर रहे हों..

मालिक की वफादारी !! यानि कि कोई मालिक भी है इनका !!

वो बोले….अब ये तो पता नहीं पर कुछ लोगों को कहते सुना कि इन कुत्तों का भी कुछ ‘हिडन ऎजेंडा’ है….

लेकिन इसका कुछ तो करना पड़ेगा ना..नहीं तो कहीं यहां रेबीज ना फैल जाये. हमने अपनी डाक्टरी चिंता जतायी…

लेकिन करें तो क्या करें…. वो बोले .

हम मौन रहे ..

वे बोले ऎसे मौन रहोगे तो फिर सारे 365 दिन ही मौन रहना पड़ेगा …. उन्होने चिंतक की तरह उकसाते हुए कहा.

हाँ सो तो है… लेकिन करें तो क्या करें…हम इसी सोच विचार में थे कि सामने से लड़खड़ाते हुए दो आदमी आते दिखायी दिये…दोनों ने एक दूसरे को सहारा दे रखा था… एक को तो हम पहचान गये …वो थे ‘भगत जी’ …जो डाक विभाग में पोस्टमैन थे और चिट्ठा चिट्ठी इधर उधर पहुंचाने का काम करते थे….बहुत बकबक भी करते थे… इसीलिये कुछ लोग उन्हें नारद जी भी कह के बुलाते थे…

आइये भगत जी आइये …ये लड़खड़ाते हुए क्यों आ रहे हैं और ये महाशय कौन हैं…हमने पूछा.

ये हैं मेरे दोस्त इरफान मियां…वे बोले.

आदाब..

आदाब..
दुआ-सलाम के बाद मैने देखा दोनों के पांवों में जख्मों के निशान थे.

अरे ये क्या हुआ आप लोगों को ..कहीं आप दोनो भी मोहल्लों वाले कुत्तों के चक्कर में तो नहीं पड़ गये…

चक्कर में नही साहब चंगुल में कहिये…

लेकिन कैसे..?

अब क्या बतायें साहब ,भगत जी ने बोलना प्रारम्भ किया , आप को तो मालूम है आजकल ये डाक बांटने का काम कितना कठिन होता जा रहा है..

वो तो ठीक है पर ये जख्म…

अरे वही बता रहा हूं साहब .. मैं रोज डाक लेने डाकखाने जाता हूं और इरफ़ान भाई अपनी प्यारी सी बिटिया ‘सारा’ को स्कूल छोड़ने … हम दोनों का समय लगभग एक सा ही होता है. जाने का….

लेकिन पिछ्ले कुछ दिनों से एक मोहल्ले में कुछ कुत्ते आ गये हैं पहले तो बेवजह भौंकते हैं और फिर कुछ बोलो तो काट खाते हैं…. इरफ़ान मियां ने बात को जारी रखते हुए कहा… और ‘सारा’ बिटिया तो और भी डरी हुई है..वो कहती है मैं स्कूल नहीं जाऊंगी ..वहां रास्ते में बहुत कुत्ते हैं…मेरे टीचर (भैन जी) मेरे को अच्छी- अच्छी चिट्ठी घर में ही भेज देंगी और उसी से ही बहुत कुछ सीख जाउंगी….

जैसे नेहरू जी भेजा करते थे चिट्ठी …जेल से …. भगत जी बीच में टपकते हुए बोले.

अरे अभी नेहरू जी को छोड़ो …काम की बात करो…मैं बोला…

हाँ तो उन्ही कुत्तों ने हमें भी जख्मी कर दिया… इरफान मिंया बोले..

मैने दोनो की मरहम पट्टी की ..टिटनैस का एक इंजक्सन दिया .. तब उनकी हालत थोड़ी ठीक हुई..

भगत जी बोले …लेकिन इससे कैसे बचें साहब … आप कब तक इंजक्सन लगाते रहेंगे..कुछ तो सोचना पड़ेगा ही ना…

क्यो ना हम ये कस्बा ही छोड़ दें… इरफ़ान मिय़ां बोले…

कस्बा ही छोड़ दें !! ये भी कोई बात है… भगत जी ने प्रतिकार किया. हम कस्बा तो नहीं बदल सकते . और फिर क्यों बदलें.

क्यों .. क्या बात है..मैने जानना चाहा…

अरे भाई ये कस्बा तो अच्छा ही है .यहां अपने पप्पू के पास होने की पूरी गैरंटी है और एक फायदा और है सुना जाता यहां रहने वालों का पुनर्जन्म स्काट्लैंड में होता है 🙂

ये तो ठीक बात है लेकिन इस कस्बे के मालिक भी कभी कभी जाते हैं ना उन बदनाम कुत्तों वाले मोहल्ले में. इरफ़ान मियाँ बोले..

मालिक!! यानि ..कस्बे का भी कोई मालिक होता है क्या… ? हमने चौंक कर पूछा.

अरे कस्बे के मेयर साहब.. अब मेयर साब तो मालिक ही हुए ना .

हाँ वो तो है… लोकतंत्र में हर चुना हुआ व्यक्ति देश , समाज ,गांव , शहर का मालिक ही होता है. हम बोले

लेकिन कल जब कुछ लोग आपके पास आये थे कैमरा-सैमरा ले के तो उनको भी आप मालिक मालिक ही ना बोल रहे थे. भगत जी ने पूछा.

भईये आजकल तो जिसके पास कैमरा है वो भी मालिक ही है… इरफ़ान मियाँ बोले.

और जिसके पास हथोड़ा है वो … भगत जी ने चुटकी लेने के अंदाज में पूछा.

वो है मालिक का बाप .. हमने गुस्से में कहा ….आप तो काम की बात पर आइये.

हाँ तो मैं कह रहा था कि मेयर साहब कभी उन बदनाम गली मुहल्लों में जाते हैं ना .. इरफ़ान मियाँ ने बात को जारी रखते हुए कहा.

हाँ ..लेकिन वो तो शांतिदूत बनके जाते है ना …भगत जी बोले.

शांति… अरे ये शांति कौन है हमने तो केवल चंपा का ही नाम सुना था इरफ़ान मियाँ ने पूछा .

अरे वो वाली शांति नही मियाँ.. अशांति वाली शांति.

लेकिन जाते तो हैं ना वो भी… इरफ़ान मियाँ बोले

ओ हो… तो उस से क्या होता है… वो फिर लाइन में आ ही जाते है ना .. और फिर कभी कभी तो चलता ही है .. भगत जी समझाते हुए बोले …और हाँ यहां ‘कच्ची कली’ भी देखने को भी मिलती है कभी कभी.

हमने भी सोचा के भगत जी से इस बात पर बहस करना ठीक नहीं इतना बड़ा काम करते हैं… कहीं कल से हमारी चिट्ठी ले जाने से मना कर दें तो.

हमने कहा…लेकिन गुरु जी आप ये बताओ कुत्ते कहाँ है कस्बे में या मोहल्ले में.

कौन कुत्ते .. भगत जी कुत्तों को भूल ‘कच्ची कली’ में खो गये थे .

अरे वही वो भौकने वाले कुत्ते ..मैने उन्हें याद दिलाते हुए कहा.

अच्छा हाँ .. अरे भौकने वाले नही साहब कुछ तो पीछे ही पड़ जाने वाले और कुछ दिनों से लग रहा है कि कुछ पागल वगैरह भी हैं…

हाँ हाँ मालूम है… अच्छा ये बताओ आपका डाकखाना और आपकी बेटी का स्कूल जहां है वहां को जाने के लिये क्या एक ही रास्ता है. क्या..कोई दूसरा रास्ता नहीं है…
मतलब …?

मतलब ये कि क्या आप उस मोहल्ले को और उसके कुत्तों को अवोईड नहीं कर सकते..

अवोईड !!! .. इरफान मियां के लिये ये शायद नया शब्द था.

अरे बच कर निकलना, नजरअंदाज करना.. भगत जी ने समझाते हुए बात जारी रखी..हाँ कर तो सकते हैं पर वो मोहल्ला भी तो हमारे ही समाज का ही अंग है ना….कब तक अवोइड करेंगे .

हाँ वो तो ठीक है पर जब तक वो कुत्ते काटना ना छोड़ दें या सारे कुत्तों को रेबीज की वैकसीन ना लग जाये तब तक आप उस मोहल्ले से ना गुजरें…

हाँ ये बात तो ठीक है… ..इरफान मियां ने कहा….

हाँ ..हम दूसरा रास्ता तो अपना ही सकते हैं ..अपना लेंगे ..थोड़ा लंबा पड़ेगा पर ठीक है….भगत जी ने भी सहमति जतायी..

अब तो मेरी बिटिया भी अब बिना किसी ख़ौफ के स्कूल जा पाएगी…

और मैं भी अपनी डाक टाइमली बाँटुंगा …

मेरे सुझाव पर दोनो सहमत थे…और हमारे चश्मे वाले बंधु गुरुदेव की तरह मुस्कुरा रहे थे…

डिस्क्लेमर : ऊपर लिखा लेख किसी व्यक्ति या उसके किसी भी बुरे करम के बारे में नहीं लिखा गया है. ये काकेश की काँव काँव कल्पना का कमाल है . इस कथा के सब पात्र, स्थान एवं परिस्थितियां सार्वजनिक काल्पनिक है. वास्तविक जीवन (वैसे भी जीवन कभी वास्तविक होता कहाँ है ) से इनका दूर दूर तक कुछ भी लेना देना नहीं है. कोई भी समानता केवल उपयोग संयोग मात्र है. यदि आपको कोई आपत्ति हो तो टिप्पणी के माध्यम से दर्ज करायें. हम वादा करते हैं कि उनको किसी दूसरी पोस्ट में इस्तेमाल कर कोई नई पोस्ट नहीं बनायेंगे.

आज मैं बैचेन हूँ.. इसलिये नहीं की मेरी पिछली पोस्ट “निश:ब्द” की तरह पिट गयी.. इसलिये भी नहीं कि मुझे फिर से “नराई” लगने लगी … इसलिये भी नहीं कि मुझे किसी ‘कस्बे’ या ‘मौहल्ले’ में किसी ने हड़का दिया हो .. इसलिये भी नहीं कि मेरा किसी ‘पंगेबाज’ से पंगा हो गया हो .बल्कि इसलिये कि मुझे ‘नाम’ की चाह ना रखने वाले अनामों ,बेनामों का गालियां सुनना अच्छा नहीं लग रहा .

मैं एक चिट्ठाकार हूँ …क्या मुझे चिंतित होना चाहिये कि मेरा अस्तित्व खतरे में है . क्या मेरा लेखन किसी की टिप्पणी के कारण ही अच्छा या बुरा हो सकता है. मुझे ‘आत्मावलोकन’ करना चाहिये (!! ?? ) …क्योकि ‘मैं’ ये निर्धारित करना चाहता हूं कि किसी और के चिट्ठे पर बेनामी टिप्पणी ना हो …. आप अपने चिट्ठे पर बेनामी चिप्पी नहीं चाहते तो उस के लिये आपके पास तकनीकी समाधान है …बन्द कर दीजिये ‘एनोनिमस पोस्टिंग’ …पर हम यह नहीं चाहते क्योकि इस से तो मेरी चिप्पियां कम हो जायेंगी और मैं , टी आर पी की दौड़ में नही आ पाऊंगा या फिसड्डी रह जाऊंगा … टी आर पी रेटिंग लोकप्रियता से निर्धारित होती है और लोकप्रियता टिप्पणीयों से . मैं ‘अप्रगतिशील’ साहित्यकार बन सकता हूँ.. ‘अलोकप्रिय’ नहीं .

हम क्यों चाहते हैं ‘नाम युक्त टिप्पणी’.. क्योंकि हम नाम देखकर निर्धारित करेंगे कि उस टिप्पणी को किस खाँचे में फिट करना है … कैसा बरताव करना है उसके साथ… मैने पिछ्ली पोस्ट में भी कहा था हमारे यहाँ खाँचा बनाने कि प्रक्रिया नाम से शुरु हो जाती .य़े एक बुनियादी सवाल है …हमें इस पर चिट्ठाकारिता के इतर भी विचार करना है . क्यों हम कही हुई ‘बात पर ना जाकर जात पर’ ( नाम पर ) जाते हैं . क्यों मेरी कही हुई ठीक वही बात अलग अलग नामों से अलग अलग अर्थ दे जाती है .

हम अनाम-बेनाम-गुमनाम के चंगुल में क्यों फ़ँस जाते है . यदि में अपना नाम अनाम की जगह अनामदास रख लूं तो ठीक है लेकिन मैं अनाम नहीं रह सकता..ऎसा क्यों …??

किसी ने कहा कि ‘बेनाम लिखने वाला कायर है’ . मैं कहता हूं ‘बेनाम लिखने वाला सभ्य है’ . वो आपकी इज्जत कर रहा है . वो आपके खिलाफ बुरे विचार ,आपकी बात की खिलाफत सीधे मुंह पर नहीं कर रहा . वो आपसे वार्तालाप का एक नया माध्यम तलाश रहा है . इसमें तकनीक भी उसका साथ दे रही है फिर आपको क्या समस्या है ?…. आपके लिये क्या महत्वपूर्ण है वार्तालाप या व्यक्ति .यदि आप कहें ‘वार्तालाप’ .. तो नाम पर क्यों जाते है वो अनाम हो या अनामदास क्या अंतर पड़ता है और यदि आप कहें नहीं ‘नाम’ ज्यादा महत्वपूर्ण है तो बन्द कर दो ना ‘एनोनिमस पोस्टिंग’ .क्यों बेचारों को गरियाकर अपनी सभ्यता का परिचय दे रहे हो .

बेनाम लिखने वाला कायर नहीं है वो आप जैसे छद्मनामधारी लोगों से ज्यादा साहसी है . कितने ऎसे लोग होंगे जो किसी चिट्ठे को पढ़कर मन ही मन कुलबुलाते रहते होंगे … बहुत कुछ कहने को ….पर सामने वाले को नाराज न कर बैठें इस आशंका से मन मसोसकर रह जाते होंगे. जैसे कभी कभी आपको अपने पिताजी या बड़े भाई की बात अच्छी नहीं लगती तो आप सामने कुछ नहीं कहते पर मन ही मन कहीं कोई दरार पाल लेते हैं. बेनाम व्यक्ति साहस तो करता है अपनी बात को रखने का . मुझे लगता है हमारी पीड़ा का कारण बेनाम व्यक्ति नहीं वरन उसकी कही हुई कड़वी ( सच्ची ) बातों को हजम नहीं कर पाना है . आप मेरे को ईमानदारी से जबाब दीजिये यदि यही बेनाम व्यक्ति आप की ढेर सारी (झूठी) तारीफें करता , जैसा कि कई नामधारी व्यक्ति करते हैं , तो भी क्या उसे मारने दौड़े चले आते . तब तो आप इंटरनैट के अनाम चरित्र को सादर प्रणाम करते . उसकी प्रसंशा में कसीदे गढ़ते .

पिछली पोस्ट में भी मैने इसी प्रश्न को रखने का प्रयास किया था कि हम लोगों को किसी भी खांचे में फिट करने की बजाय उसके लेखन को खाँचों में फिट कीजिए . तकनीक आप को सहायता देती है .आप अपने लेखों को श्रेणीबद्ध करते है .ठीक इसी प्रकार आप दूसरे चिट्ठों को भी श्रेणी बद्ध करें और अपनी रुचि के अनुसार पढ़ें . हमारा ध्यान विषयवस्तु पर ज्यादा हो सन्दर्भ पर कम . कॉंनटेन्ट कॉनटैक्सट से ज्यादा महत्वपूर्ण है.

मैं क्यों लिखता हूँ… टिप्पणी के लिये या स्वात: सुखाय के लिये … यदि मैं कहूं कि मैं केवल स्वात: सुखाय के लिये लिखता हूँ तो ये तत्वविहीन कोरा आदर्श होगा. मेरे लिये टिप्पणी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी कि एक फिल्म के लिये दर्शक . सिनेमाहॉल मालिक के लिये भी दर्शक ही महत्वपूर्ण है तो फिर यदि दर्शक ही महत्वपूर्ण है तो हम दर्शक के पहनावे पर क्यों ध्यान दें … .आप कहेंगे मेरा हॉल है मैं निर्धारित करुंगा कि कौन मेरे हॉल में फिल्म देखे कौन नहीं …मैं किसी भी तरह का ड्रेस कोड बना सकता हूं …. बनाईये ना आप …. दरवाजे पर सिक्यूरिटी गार्ड लगाइये . बड़े बड़े अक्षरों में लिख दीजिये कि कौन सा ड्रेस कोड अलाऊड है लेकिन ये मत कीजिये कि आप दर्शक को अंदर आने का टिकट भी दे दें और वो जब फिल्म देख रहा हो तो आप उसे गरियाने लगें … खुद ‘लुंगी’ पहनें.. ड्रेस कोड ‘सूट विद बूट’ का निर्धारित करें और बेचारे ‘कुर्ता पायजामा पहने’ दर्शक को ..जो टिकट ले के अंदर घुसा है उसे बाहर निकालने की पहल करें.

चलो बहुत निकाल ली अपनी भड़ास अब आपको काम की बात बताता हूँ.

अब आप भी इस ‘बेनामी सूनामी’ से बचना चाहते हो तकनीकी रास्ता मैं बता सकता हूं . माफ कीजिये मैं तकनीकी व्यक्ति हूं इसलिये तकनीकी सुझाव ही दे सकता हूं गरियाने की कला में ,मैं माहिर नहीं.

1.आप अपने चिट्ठे पर ‘एनोनिमस पोस्टिंग’ बन्द कर दें .
2.यदि आप चाहते हैं ..कि नहीं आप सब को आने देना चाहते लेकिन चन्द लोगों की ( इसमें अनाम-बेनाम-गुमनाम-नामवर-छ्द्मनामधारी सभी हो सकते हैं ) बातों को सार्वजनिक नहीं करना चाहते तो अपने चिट्ठे पर टिप्पणीयों पर मॉडरेशन लगा दें

बेनामों के लिये सुझाव

1.भाई मेरे… क्यों गाली खा रहे हो वो भी बिना मतलब की. अरे एक आई-डी की छतरी ले ही लो ना . फ्री में मिलती है यार… और नाम चाहे कुछ भी रख लो … कोई फोटो प्रूफ थोड़े मांग रहा है . आपको नाम नहीं सूझ रहा तो मैं कुछ सहायता कर सकता हूं.

आप अनाम-बेनाम-गुमनाम नहीं हो सकते लेकिन आप चाहें तो अनामचंद , बेनामदास या गुमनाम कुमार रख सकते हो . आजकल बाजों का भी बहुत महत्व है ( बहुत दूर दूर की देख लेते हैं ) तो आप चालबाज , तिकड़मबाज , दंगेबाज रख सकते हैं . यदि कोई नया सा नाम रखना हो तो फिर फंटूस , कवि कानपुरी , निंदक , चिंतक जैसे नाम रख लें . वैसे एक राज की बात बताऊं आप अपना नाम कोई स्त्रीलिंग में रख सकें तो बहुत अच्छा . इससे एक तो आपको पप्पी चिप्पी लगाने वाले ज्यादा मिलेंगे और फिर कोई आपको इस तरह से गरियाएगा भी नहीं . जी हां सही बात है . कल के गाली समारोह में सुना नही .. .. हमारे ‘बेनाम साहब’ , ‘हलवाई की लौंडिया’ से नयन-मटक्का करते पकड़े गये थे तो वो पुरुष ही थे ना .. ओ क्या कहा ..नहीं भी हो सकते ..लगता है आपने भी ‘फायर’ फिल्म देख रखी है ..लेकिन जनाब दिवाल गीली करने वाले तो पुरुष ही होंगे ना . जमीन गीली होती तो हम कुछ और सोचते … . हाँ तो मैं आपको नाम बता रहा था.
आप ‘भैनजी’ रख सकते हैं … इससे एक तो आपको य़ू.पी. के चुनावों में कुछ माइलेज मिल जायेगा और फिर आप मासूम से सवाल भी उठा सकती है …“ नेता क्यूं बने अभिनेता “ टाइप …. आप वर्ड्पैड भी रख सकती है इससे आपकी छवि महिलाधिकारों के लिये जागरूक स्वयं सुखी पर दूसरों को दुखी करने देखने वाली महिला की बन जायेगी. यदि आप कोई शोध छात्रा की छवि चाहें तो आप ‘चित्रित मन’ रख लें …. किसने बोला है आपको सही नाम बताने को … बस ‘नामवर’ चाहिये ‘बेनाम’ नहीं चलेगा.

कल जब अपनी नयी प्रयोगात्मक पॉड्कास्ट को फाइनल टच दे रहे थे  कि कहीं से आवाज आयी.

का गजब हुआ जब लव हुआ ….. का गजब हुआ जब लव हुआ ..

गांव के गँवार छोरे को जब शहर की स्मार्ट लड़की से प्यार हो जाता है तो वो जैसे खुश होकर इधर उधर डोलता है वैसे ही कुछ अंदाज में जूता महाशय ने कमरे में प्रवेश किया. पिछ्लों  दिनों की घटनाओं से तो हम सोच बैठे थे कि जूता महाशय कहीं पिट पिटा रहे होंगे लेकिन उन को इस तरह देख कर घोर आश्चर्य हुआ. हम पौड्कास्ट के प्रयोग से काफी थक चुके थे फिर भी हमने पूछ ही लिया क्या हुआ महोदय बड़े खुश नजर आ रहे हो.

दो कारण हैं हमारे खुश होने के …एक तो ये कि तुम्हारी दुकान नहीं चल रही और दूसरी यह की हमारी दुकान चल निकली.

हम तो कुछ समझे ही नही थे इसलिये पूछ बैठे.

क्या मतलब ?

देखो तुम अभी ये ब्लौग का नया धंधा शुरु किया ना और फिर अपनी पूरी फैमिली को लेकर नया नया माल टिकाने की कोशिश कर रहा है ना … तो ना तो तेरा धंधा चल रहा और ना ही तेरा माल  बिक रहा .

बिक नहीं रहा.. मतलब ?

यही कि कितना लोग तेरे ब्लौग पे आता है….कितना हिट्स मिलता है तेरे को.

नहीं… लोग पढ़ते तो हैं ना.

खाक पढ़ते हैं ..अरे तेरे से ज्यादा हिट्स तो वो सैक्सी फोरवर्डेड पिक्चर चेपने वाले को मिल जाता है ..और वहां कमेंट्स भी मिलते हैं ढेरों . 

लेकिन वो तो सिर्फ  टाईम पास के लिये होता है और वहां तो लोग केवल टाइम पास के लिये ही जाते हैं.

तो तेरे ब्लौग को कौन सा लोग ज्ञान प्राप्ति के लिये पढ़ते हैं ..तू भी तो टाइम पास ही लिखता है..

लेकिन मैं तो ब्लौग के माध्यम से कुछ संदेश भी देना चाहता हूं.

वो तो तेरे को लगता है ना ..यदि तू अच्छा लिखता तो तेरा नाम भी ब्लौग की टी.आर.पी रेटिंग में होता ना.

देखो जूता महोदय …ना तो मैं हिट्स के लिये लिखता हूं ना ही किसी रेटिंग …

उसने मेरी बात को अनसुनी करते हुए कहा ..और तो और अब तेरे को अप्रगतिशील साहित्य की श्रेणी में भी डाल दिया जायेगा… तो क्या तू भी अब मेरे को छोड़ , कुत्ते पे लिखेगा ??  मेरा मजाक सा उड़ाते हुए आवाज आयी.

मेरे को कुछ भी समझ ही नहीं आ रहा था कि जूता महोदय क्या बोल रहे हैं किंतु उन्होने बोलना जारी रखा ..इस बार मजाक उड़ाने की नहीं बल्कि समझाने वाले अंदाज में ..

देखो चपड़गंजू तुम अभी ब्लौग-जगत में नये नये आये हो ..यहां भी फिल्मी जगत की तरह पहले से ही अमिताभ और शाहरुख बैठे हैं जिनके सिर्फ नाम से ही फिल्में बिकती हैं .तुम भी कुछ दिन यहां रहो अपना काम अच्छा करो ..फिर जब काम अच्छा होगा तो नाम भी होगा ..फिर लोग तुम्हें भी पढ़ेंगे..

उनकी बात अब कुछ कुछ समझ आने लगी थी…उसी समय एक कहानी भी याद आयी लेकिन वो बाद में ..अभी तो अपने वार्तालाप को ही आगे बढ़ाते हैं.

लेकिन आपकी दुकान कैसे चल निकली ..क्या आपकी जूती जी से सुलह हो गयी ..

सुलह ..अरे कलह हुआ ही कहाँ था जो सुलह होती..

लेकिन उस दिन तो आपका झगड़ा हो रहा था ना…

अरे किस पति पत्नी में झगड़ा नहीं होता .और फिर हम भारतीय पति-पत्नियों की यही तो खासियत है ना कि हम कितना भी झगड़ें ज्यादा देर एक दूसरे से अलग नहीं रह सकते ..

लेकिन वो आपकी प्रेमिका वाली बात पता चल गयी थी ना ..

हाँ उसको लेकर झगड़ा तो हुआ था पर हमने अपनी गलती मान ली और कान पकड़ लिये कि आगे से ऎसा नहीं होगा और जूती ने भी एक अच्छी भारतीय पत्नी की तरह हमें माफ कर दिया…बल्कि इस घटना के बाद तो हमारे रिश्ते और भी अच्छे हो गये हैं ..इसीलिये तो मैं शुरु में गाना गा रहा था ..का गजब हुआ….

ओ..इसलिये गा रहे थे ..हमने तो सोचा था…

..और हां जूती ने एक बात तेरे लिये भी बोली है कि तू अब सैंडल की बात नहीं मानेगा ….

मतलब…!!

मतलब ये कि ..तू ये जो मोटी-मोटी किताबें लेकर हमारा इतिहास-भूगोल खंगाल रहा है अब वह इतिहास नहीं लिखने का ..

अरे ..लेकिन मैने ये जो जानकारी जमा की है उसका क्या …

वो तो तू फिर कभी यूज कर लेना अभी तो इस एपिसोड को खतम कर…

ठीक है ठीक है ..लेकिन एक बात बताओ यार ( अब मैं थोड़ा खुल गया था ) तुम्हें तो अपने इतिहास के बारे में पता है ना…

ज्यादा तो नहीं ..बस इतना ही …कि हमारे जन्मदाता कोई आदिदास जी थे..

आप कहीं संत रैदास की बात तो नहीं कर रहे ना..

ना ..ना…वो आदिदास ..कहीं अंग्रेजी में पढ़ा था ..ADIDAS…

मेरे समझ में बात आ गयी और मैं मन ही मन हँसा और फिर मैने जूते महोदय से विदा ली…..

तो क्या करूं दोस्तो अब चुंकि वादा किया है इसलिये अब जूते का इतिहास तो फिर कभी लिखुंगा …अभी इतना ही …

Joota

सर की सूजन से कुछ आराम मिला ही था कि अचानक फिर सर बज उठा . हम सोचे ..कि अब क्यों सैंडल रानी हम पर बजी पर देखा तो सैंडल रानी नहीं बल्कि जूता महाशय थे …हमने उनसे पूछा कि भाई अब आपको क्या आपत्ति है .तो वो बोले कल आपने “जूते की प्रेमिका सैंडल रानी” क्यों लिखा अपने चिट्ठे पर .हमने कहा कि अरे ये तो जग जाहिर ही है कि….

वो बोले ये तुम्हारी दुनिया में जग जाहिर होगा हमारी दुनिया में नहीं .

हम बोले…लेकिन वो तुम्हारी प्रेमिका तो हैं ना ..

हाँ हैं लेकिन यह हमारी पत्नी जूती को नहीं ना मालूम ..

अब तो जैसे हमें सारी बात समझ में आ गयी ..हमने हाथ जोड़कर माफी मांगते हुए पूछा लेकिन ये बात तो बहुतों को नहीं पता कि जूती आपकी पत्नी हैं और फिर आपको कभी जूती के साथ देखा भी नहीं .

कैसे देखोगे!!… अक्सर लोग प्रेमिकाओं के साथ ही देखे जाते हैं. पत्नियों को तो घर की रसोई से ही फुरसत नहीं . इसीलिये तो आजकल कुछ प्रगतिशील महिलाओं द्वारा रसोई को घर से बाहर निकालने का अप्रगतिशील आंदोलन खड़ा किया जा रहा है .

हमने दिखने और विचारों में युवा किंतु उम्र में 12-13 साल बड़े ब्लौगर की तरह चिंता जताई. अरे रसोई बाहर हो जाएगी तो फिर घर में रस ही नहीं रहेगा .

भाड़ में जाओ तुम और तुम्हारा रस ..पीछे से आती ये आवाज जूती महोदया की थी.अरे क्या हम औरतें घर में रहकर सजने संवरने में ही दिन बिताऎं और तुम आदमी लोग फुरसत से ब्लौग पे ब्लौग लिखो वो भी इतने लंबे लंबे ..अरे अब हम लोगों ने भी सोचा है कि हम भी ब्लौग लिखेंगे.. पर क्या करें कहां से लायें समय ..इसीलिये बच्चों और पतियों के टिफिन के साथ छोटी छोटी कविताऎं ही पैक कर पाते है ..हम तो वोट देने जाते हैं तो भी बच्चों को ले के जाना पड़ता है..

हम जब तक रवीन्द्र नाथ टैगोर के किसी अंग्रेजी लेख का हिन्दी तर्जुमा सोचते वो फिर बोल उठी..

तुम लोग घर से बाहर निकल कर ना जाने कहां कहां मटरगस्तियां करते फिरते हो और हमें कभी घर से बाहर भी नहीं ले जाते ..ये नहीं कि कभी कोई पिक्चर ही दिखा दो . अब हमने भी पिलान बनाया है कि हम भी उ नई पिक्चर प्रोवोक्ड देखेंगी और उससे कुछ प्रेरणा लेंगी ….

हम लिखने तो बैठे थे जूते का भूत यानि इतिहास पर अब हमें जूते का (उज्जवल?) भविष्य नजर आने लगा. ..आगे क्या हुआ ..ये बताएगे बाद में… अभी तो चले ऑफिस ..

जूतमबाजी जारी है..कोई सिले जूते की भाषा सुनते सुनते इतना पक गया है कि कहता है जूते की सुनो वो तुम्हारी सुनेगा कोई फटे जूते की व्यथा कथा कहते नहीं थक रहा. . लेकिन मजे की बात यह है कि ये तो कोई बता ही नहीं रहा जूते का इतिहास ,भूगोल ( आप चाहें तो और विषय भी जोड़ लें ) क्या है ? आज के युग में जूतमबाजी का क्या महत्व है ?… .जूता बिरादरी के अन्य सदस्य मसलन जूते की प्रेमिका सैंडल रानी , छोटी बहिन चप्पल और भी अन्य सदस्य जैसे जूती , बूट इत्यादि नाराज हैं कि ये भेदभाव क्यों ..अब कल ही सैंडल रानियों से पाला पड़ गया ..कैसे पड़ा ये तो बाद में बताऊंगा लेकिन उन्होने भी कल मेरे सर में अपनी छाप छोड़ने के बाद  ढेर सारा उपदेश दे डाला और सर का तबला कुछ ज्यादा ही देर तक बजाया ..मेरे विरोध करने पर कहने लगी कि तुम चिट्ठाकार केवल जूते की ही बात क्यों करते हो मैं इतनी सुंदर , सुशील ,स्लिम एंड ट्रिम हूं मेरे बारे में क्यों नही लिखते .हम गिड़गिड़ाकर बोले अरे अपन तो अभी इस ‘लाईन’ में नये नये आये हैं बहनजी ..आप शायद नही जानती कि जूतमबाजी के दंगल में उतरे दोनों खिलाड़ी धुरंधर खिलाड़ी हैं ..एक फुरसत से लिख्नने वाले इंसान हैं (उनके पास बहुत फुरसत है)  दूसरे इंडी-ब्लौग पुरस्कार प्राप्त … बात को काटकर फिर से सर में बजते हुए वो बोलीं कि फिर क्यों नारा लगाये फिरते हो कि “हम भी हैं लाईन में”....जब लाईन में हो तो लिखो हम पर ..और हाँ… हमारी हिस्ट्री पर भी लिखियो .. उन से ये वादा कर कि जरूर एक चिट्ठा लिखेंगे हम किसी तरह जान बचाकर भागे…तो पेश है ये चिट्ठा.. 

पर पहले ये तो बता दें कि कैसे हम सैंडल रानी के चुंगुल में फंस गये..

जब हमने चिट्ठाकारिता शुरू की तो कुछ ‘शुरुआती झटके’ लगे …. हुआ यूं कि हम इतने बड़े जुरासिक पार्क में पहली बार आये थे और एक साथ इतने सारे बड़े-बड़े लोगों को देख घबराहट में “ढैंचू- ढैंचू” चिल्लाने लगे .. ‘भाई’ लोग (कुछ दस्यु सुन्दरियां भी ) अपन को समझाये कि

” ढैंचू- ढैंचू ना चिल्लाओ ,

पढ़ो पढ़ाओ ,लाईफ बनाओ “

फिर एक भाई ने तो धमकी ही दे डाली कि नहीं सुनोगे तो ‘धूमकेतु” बना दिये जाओगे .हम तो पहले बहुत खुश हुए की चलो अब हम भी “धूम-2” , “धूम-3″ की तरह धूम-केतू” बन कर इतिहास में जगह पा जाऎंगे पर जब असलियत समझ में आयी तो सारी ‘अभिलाषाऎं’ बहते पानी की तरह बह गयी और हम होश में आ गये जैसे एक बार हॉस्टल में पूरी तरह टल्ली होने के बाद जब सामने से प्रिंसिपल को आता देखा था तो सारी की सारी ‘ओल्ड मोंक”  पुराने  सन्यासी (ओल्ड मोंक) की तरह गायब हो गयी थी. होश में आने के बाद जब देखा तो ठाना .. कि अब तो बस हम चिट्ठों को पढ़ेंगे और उनसे अच्छे बच्चों की तरह अच्छी- बातें सीखेंगे …वैसे भी हिन्दी में अच्छी चीजों के ब्लौग उपलब्ध भी हैं.

फिर क्या था हम पढ़ने लगे और गुनने लगे.. 

अब हमने पढ़ा कि तू मेरी पीठ खुजा मैं तेरी पीठ खुजाऊं ..वो भी एक सुंदरी से.. तो भय्या बात गांठ बांध ली .. कल अपन जब बस स्टेंड पर खड़े होकर मरफी के नियमों से दो चार हो रहे थे तो अचानक पीठ में खुजली सी हुई ..अब पीठ को खुजली खुद तो दूर कर नहीं सकते थे तो पढ़ी हुई बात याद आ गयी और सामने खड़ी सुंदरी की पीठ खुजाने लगे इस आशा में कि वो हमारी पीठ खुजा देगी ..पर ये क्या उसने तो खुजाने की जगह हमारा सर बजा दिया…. ये थी हमारी सैंडल रानी से पहली मुलाकात ..

अब कसम खायी कि बातों को अक्ष:रक्ष ना समझ कर उनमें निहित अर्थ को समझेंगे ..और उसी पोस्ट को फिर से पढ़ा तो पता चला कि आजकल कि नयी पृथा के अनुसार सुन्दरियां “टिप्पणीयों” (कमेंटस)  से बहुत खुश होती हैं ..शाम को घर लौटते समय फिर एक बस स्टेंड पर एक सुन्दरी को देखा और उस को खुश करने की ठानी ..और कमेंट्स पर कमेंट्स देने शुरु किये ..वो पहले तो  सुनती रही ..हम सोचे कि खुश हो रही है अचानक वो घूमी और उसने भी हमारा सर बजा दिया…

अब तो हम को कुछ भी सूझना बंद हो गया और हमारे सर का सूजना शुरू हो गया…बात पल्ले नहीं पड़ी अब क्या गलती हो गयी हमसे ..आप को समझ आये तो बुझाना..    

लो हम भी बातों बातों में कहां आ गये.. अभी ज्यादा फुरसत नहीं है ..कल फिर लिखेंगें .. नहीं तो सैंडल रानी फिर बज गयी तो…

अभी तो आप ये सुनिये…

एक ग्राहक (फोटोग्राफर से)-  क्या आप मेरा ‘पासपोर्ट साइज’ का फोटो खींच सकते हैं, जिसमें मेंरा सिर और जूता दोनों नजर आए।

फोटोग्राफर- क्यों नहीं साहब, बस आप अपने जूते सर पर रखकर बैठ जाएँ।

बांकी कल…जरूर आईयेगा..


ब्लौग की दुनिया बड़ी निराली है . जब आप विवादित हों तो आपको हिट्स भी मिलती हैं और प्रतिक्रियायें भी . जब आप एक भाव पूर्ण कविता लिखो तो आप को कोई नही पूछ्ता -हां गिरिराज जी प्रशंसा करते हुए नाम के आगे प्रश्नचिन्ह जरूर लगा देते हैं . अनामदास जी कहते हैं कि “ब्लौग” को उलटा करो तो “ग्लोब” जैसा कुछ बनता है . तो क्या ब्लौग हमारी दुनिया या समाज का आइना है जहां जो “बिकता है वो दिखता है” ? अब हमने (संजय भाई ने कहा है .. कि हास्य व्यंग्य में ‘हम’ चलता है ‘मैं’ नहीं) भी सोचा कि बेजी जी ने जब लिखा पत्रकार क्यूँ बने ब्लौगर ?? तो उन्हें खूब हिट्स मिले और उसी प्रश्न को जब यहां उठाया गया तो बहुत प्रतिक्रियायें भी आ गयीं …. तो हम भी कुछ लिख डालें ताकि हमें हिट्स भी मिलें और प्रतिक्रियायें भी ( अब नीरज भाई आप फिर से ‘परिचर्चा‘ का रास्ता ना दिखायें …लोगों को करने दें प्रतिक्रियायें ) . तो हमने भी उसी यक्ष प्रश्न को अपने अंदाज में टटोला तो ये पाया.

पढ़िये ‘ सेवन रीजन्स फोर बिकमिंग हाईली इफेक्टिव पत्रकार-ब्लौगर ‘

1.काम की कमी : पत्रकारों के पास काम की निहायत ही कमी होती है. कभी कभी तो इस कमी से मानसिक तनाव तक हो जाता है . इसी तनाव से उबरने के लिये ये लोग ब्लौग का रास्ता अपना लेते हैं.

2.कमेंट्स पर भी अपने कमेंट्स : हम जैसे ‘नॉन पत्रकार” को एक चिट्ठा लिखना भी भारी पड़ता है या फिर कोई विषय नहीं मिलता और ये लोग काम की कमी के मानसिक तनाव की वजह से कमेंट्स पर भी अपने कमेंट्स देकर अपना चिट्ठा बना लेते हैं .

3.पाप पुण्य और पैसा : पत्रकार को पाप पुण्य का बहुत ज्ञान होता है वो जानता है कि यदि कुछ पाप हो भी गया तो उसे कैसे दूर करना है … .इस लिये वो ढेरों पाप करता है (ब्रेकिंग न्यूज के लिये) –“बिना पाप पैसा कहां”- और फिर कहता है “पाप से नही स्नान से डरो” .. वैसे भी टी. वी. पत्रकार जिसका थोबड़ा भी टी. वी. में आता है उसे सुन्दर दिखने के लिये हर रोज नहाना पड़ता है (कभी कभी तो सर्दियों में ठंडे पानी से भी) तो वो तो वैसे भी स्नान से डरता ही है .

4.खाक छानता पत्रकार : पत्रकार को न्यूज के लिये जगह जगह की खाक छाननी पड़ती है .इसलिये जब वो ब्लौग लिखने के लिये बिना खाक छाने कोई न्यूज लिखता है तो उस माहोल को ‘मिस’ करता है इसीलिये उनके ब्लौग्स के नाम होते हैं ‘मोहल्ला’ ,‘कस्बा’ , ‘दिल्ली-दरभंगा’ … वैसे आगे आने वाले पत्रकारों के लिये ‘गली’ , ‘बाजार’ , ‘शहर’ , ‘राज्य’ , ‘नुक्कड़’ , ‘गुमटी’ ,’रतलाम-मोतिहारी’ जैसे नाम सुरक्षित हैं

5.टाइपिंग की टीस : टाइपिंग और पत्रकारिता का चोली दामन का साथ है . जैसे कि अनामदास जी कहते हैं कि “कीबोर्ड की खाता हूँ, उसके बिना मन नहीं लगता. हर काम आराम से करता हूँ, बस धीरे-धीरे टाइप नहीं कर सकता”. हमारे यहां तो उल्टा ही है “ बीबी की खाता हूँ (डांट) , उसके बिना मन नहीं लगता. हर काम तेज-तेज करता हूँ , बस तेज-तेज टाइप नहीं कर सकता”. इसलिये पत्रकार फटाफ़ट चिट्ठे लिखें तो क्या अचरज.

6.चक्कर चालीस से चौदह का : पत्रकारों के शौक बड़े निराले होते हैं. शराब और सिगरेट इनके अच्छे साथी होते हैं (ये मैं नही कह रहा अनामदास जी ने कहा “बाक़ी कुढ़ते हैं या शराब में बूड़ते हैं” ). लेकिन कभी कभी कोई गलती से पीना छोड़ भी दे (थोड़ॆ दिनों के लिये ) तो वो उस पर भी चिट्ठा लिख डालता है और पहुंच जाता है सीधे दौड़कर चालीस से चौदह में..!

7.महान बनने का शौक : य़े बात तो सही है कि पत्रकारों के पास एक बहुत बड़ा बाजार है लेकिन वो जानते हैं कि “बाज़ार केवल धनवान बना सकता है, महान नहीं !” . इसी महान बनने के चक्कर में वो लोग ब्लौग लिखते हैं..कि शायद… .( अब इस से कोई ये मतलब ना निकाल ले कि ब्लौग लिखने वाला महान होता है..)

डिसक्लेमर : ये सारा चिट्ठा मैं अपने पूरे होशोहवाश में लिख रहा हूं ..यहां किसी व्यक्ति विशेष की ना तो आलोचना है ना सराहना .इसलिये कृपया चप्पल , जूते ना मारें . मारने का इतना ही शौक है …तो फिर कमेंटस मार लें.

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