हास्य व्यंग्य


Akshargram Anugunj

नौ-दो-ग्यारह रहने वाले यदि सुबह के भूले की तरह शाम को घर आकर “अनुगूंज बाइस” करें तो क्या हो ? किसी नये ब्लॉगर ने चुपके से मेरे कान में सवाल पूछा. अब हम भी कोई पुराने ब्लॉगर तो थे नहीं कि अपनी फुरसत का उपयोग, कुछ नया ना लिख पाने की हताशा में, अपने पुराने संस्मरणों को लिखने के लिये करने लगते 🙂 और ना ही इतने नये कि आज से 90 साल बाद के हिन्दुस्तान की झलक ही दिखला देते. तो पहले तो हम चुप ही रहे लेकिन जब एक नयी नयी ब्लॉगरनि (महिला ब्लॉगर) ने यही सवाल किया तो हमें भी अपना ब्लॉगज्ञान बधारने कि खुजली सी महसूस हुई. हमने उन दोनों को समझाया और कहा देखिये जब वन डे के खिलाड़ी को टैस्ट में खिलाया जाय तो उसे थोड़ी याद रहेगा कि वो किस इनिंग्स में खेल रहा है ..वो तो केवल ओवरों के आंकड़े रखता है या रन रेट के;वो भी पूरे डीटेल में…. उसी तरह जब टेलीग्राम लिखने वाला चिट्ठी लिखने लगे वो भी ई-मेल के जमाने में तो ऎसी गलतियां होना लाजमी है ना..

दोनों के चेहरे पर मुस्कुराहट के सवाल थे और जानने की जिज्ञासा..पर हम चालू थे सत्यनाराय़ण कथा बाचने वाले पंडित जी की तरह.. अब हिन्दुस्तान अमरीका बने इसमें किस को क्या एतराज हो सकता है आज नहीं तो कल बन ही जायेगा शायद 90 साल का इंतजार भी ना करना पड़े पर तब अमरीका क्या होगा ?..इस पर तो कोई चर्चा ही नहीं है… अब हम हिन्दुस्तानी बड़े आशावादी हैं जब कोई कहता है “हिन्दुस्तान अमरीका बन जाये” तो यह मान ही लेते हैं कि इसका मतलब “अमरीका हिन्दुस्तान हो जायेगा”.. हो सकता है जब तक हिन्दुस्तान अमरीका बने तक अमरीका “सुपर-अमरीका” बन जाये… 40 रुपये का डालर 400 रुपये का हो जाये .. लेकिन ऎसा मानना हमारे देश के प्रति अन्याय होगा वो भी साठोत्तर स्वातंत्र्य वाले वर्ष में.. इसलिये हम अपनी पसंद के हिसाब से जो भी हो माने जाते हैं….माने भी क्यों ना जब अनुगुंज 22 दूसरी बार होगी तो ऎसा ही तो होगा ना … संजय भाई भी चुप हैं जो पहले भी अनुगूंज 22 करवा चुके हैं…तरुण जी भी अमरीका में अपने कंट्रोल पैनल के पेंच खुलवा रहे;होंगे समीर जी के स्क्रूड्राइवर से कि ये क्या हो गया 23 के बाद 22 कैसे आ गया..खैर ये तो अक्षरग्राम चौपाल के पंच जाने ..हम तो अभी पांच जबर्दस्त पंच तलाश रहे है कि इस बार कि अनुगूंज (नम्बर में क्या जी..) में क्या लिखें…  

गहन विचार करते करते;हम गहन निद्रा में विलीन हो गये,जैसे संसद में संसद सदस्य हो जाते हैं…और देखते क्या हैं कि हिन्दुस्तान सचमुच अमरीका हो गया… आपको ये शायद बहुत खुशी की बात लग रही हो लेकिन हम बहुत दुखी हैं… आई. टी. के आदमी हैं ना..लास्ट फ्राइडे को ही हमको पिंक स्लिप पकड़ा दी गयी… यानि हम को नौकरी से निकाल दिया गया..क्योकि जो काम हम करते थे वो सारा काम अब एक छोटे से अफ्रीकन देश जिंगाड़ा मे आउटसोर्स कर दिया गया है… जिस काम के हम को महीने में 20 हजार मिलते थे उसी काम को जिंगाडू 500 रुपये महीने में करने के लिये तैयार है ..क्योकि वहां की मुद्रा जुगाड़ी एक रुपये में 40 के आसपास मिलती है …

बहुत से जिंगाड़ू आजकल भारत में भी आ रहे हैं… सुना गया है कि जिंगाड़ा में भारत का वीजा लेने के लिये लाइने लगती हैं…भारत का बिहार राज्य भी आजकल तरक्की पर है क्योंकि अधिकतर जिंगाड़ू बिहार में बस रहे हैं… उन्हे बिहार में अपने देश की जैसी अनुभुति होती है…जिंगाड़ूओं को आकर्षित करने के लिये भारत सरकार ने भी कई नयी नयी योजनाऎं बनायी हैं..वीजा की संख्या भी इस साल बढ़ायी जा रही है…

भारत की युनिवर्सिटियों मे भी जिंगाड़ू उच्च शिक्षा ग्रहण करने आ रहे हैं ..पिछ्ले “पूस सैसन” में 2 लाख जिंगाड़ूओं के भारत आने का समाचार है ..ज्ञात रहे भारत मे अभी युनिवर्सिटी मे चार सैसन होते है .. जेठ सैसन,सावन सैसन,पूस सैसन और बसंत सैसन ..सरकार एक नया सैसन भादो सैसन चालू करवाने पर भी विचार कर रही है…

पिछले दिनों जब हमारा  कंपूटरवा खराब हुआ और हमने “सहायता सेवा” में फोन किया तो एक महिला ने कहा “कहिये श्रीमान जी मैं रजनी आप की किया सहायिता कर सकती हूँ… “..और भी बहुत कुछ वो बोलीं….उनकी हिन्दी समझने के लिये मुझे शब्दकोष का सहारा लेना पड़ा…. मैं उसे अपने कंपूटर की समस्या बता रहा था वो शायद कहीं से देख के मेरे ब्लड प्रेसर के आंकड़े बता रही थी…. किसी ने बताया कि आजकल सारी सहायता सेवा जिंग़ाड़ा से संचालित होती हैं… जिंगाड़ा गये कुछ लोगों ने बताया कि वहां गली गली में हिन्दी सिखाने वाले इंस्टीट्यूट खुल गये हैं… जहां अलग अलग ऎक्सैंट में हिन्दी सिखायी जाते है ..जैसे भोजपुरी हिन्दी , मराठी हिन्दी , बंगाली हिन्दी, पंजाबी हिन्दी आदि… 

भारत के प्रमुख पेय चाय ,लस्सी और सत्तू आजकल जिंगाड़ा में बहुत प्रसिद्ध हैं …वहां हर पार्टी में लोग कत्थक और भरतनाट्यम की धुन पर नाचते हैं और इन पेयों का आनंद लेते हैं… इन पेयों की रेसिपी भी वहां के लोग अपने अपने ब्लॉग मे बता रहे हैं… भारत में आने वाले जिंगाड़ू भी अब भारत की फ्लाइट में बैठते ही चाय या सत्तू की मांग करने लगते हैं.. हाँलाकि उनकी पत्नियों थोड़ी चितित भी रहती हैं और उन्हे मना भी करती हैं पर जिंगाड़ी पुरुष मानते थोड़े हैं… उसी तरह से बीड़ी भी जिंगाड़ा में बहुत फेमस है ..भारत से भी कई चीजों का निर्यात पिछ्ले कुछ सालों में बढ़ा है ..इनमे ‘बिपाशा छाप बीड़ी’ और ‘राखी सावंत छाप यूज मी डस्टबिन’ प्रमुख हैं….  

भारत के कई त्यौहार भी भारत से ज्यादा जिंगाड़ा में मनाये जाते हैं… दिवाली , होली , ईद सभी जिंगाड़ा में लोकप्रिय हुए हैं..यहां तक कि वहां के लोग जिंगाड़ियन त्योहार भले ही भूल गये हों लेकिन भारतीय त्योहारों को पूरे उत्साह से मनाते हैं… जनम दिन पर दिया जलाके मिठाई भी बांटते हैं… ये और बात है कि भारत में अधिकतर लोग अभी भी मोमबत्ती बुझा के केक काट रहे हैं…

उधर जिंगाड़ा प्रगति पर है इधर हम अपनी नौकरी को रो रहे हैं..पहले ही आरक्षण की मार से नौकरियों का अकाल था अब जिंगाडूओं के आने से कंपटीशन और बढ़ गया है…. ये लोग इतने सस्ते में सारे काम कर डालते हैं कि भारतीयों को कोई पूछ्ता ही नहीं है… हम भी परेशान हैं सोचते हैं जितने रुपये हैं उनसे जिंगाड़ा में कोई बढिया सा फार्म हाउस खरीदें और वहीं बस जायें…. काश हिन्दुस्तान अमरीका ना होकर हिन्दुस्तान ही रहता….

यही सोचते सोचते आंख खुल गयी…उफ नींद भी ना …!! तब ही आती है जब इतनी महत्वपूर्ण चीज सोच रहे होते हैं….अब क्या करें??? कब सोचें पंच लाइन अनूगूंज के लिये और आज तो पंच अगस्त भी हो गया जी..यानि लास्ट डेट..चलो छोड़ो अब अगली अनूगूंज में ही लिखेंगे…. उसका जो भी नम्बर हो ..हम अपना नम्बर तो लगा ही देंगे….

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कल जब मित्र समीरलाल जी ने “मोटों की महिमा” छापी तो अपने मोटापे पर आती जाती शरम फिर गायब हो गयी और एक पुरानी पढी कविता याद आ गयी.. लीजिये कविता प्रस्तुत है…

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आराम करो

आराम करो

एक मित्र मिले, बोले, “लाला, तुम किस चक्की का खाते हो?
इस डेढ़ छँटाक के राशन में भी तोंद बढ़ाए जाते हो।

क्या रक्खा है माँस बढ़ाने में, मनहूस, अक्ल से काम करो।
संक्रान्ति-काल की बेला है, मर मिटो, जगत में नाम करो।”
हम बोले, “रहने दो लेक्चर, पुरुषों को मत बदनाम करो।
इस दौड़-धूप में क्या रक्खा, आराम करो, आराम करो।

आराम ज़िन्दगी की कुंजी, इससे न तपेदिक होती है।
आराम सुधा की एक बूंद, तन का दुबलापन खोती है।
आराम शब्द में ‘राम’ छिपा जो भव-बंधन को खोता है।
आराम शब्द का ज्ञाता तो विरला ही योगी होता है।
इसलिए तुम्हें समझाता हूँ, मेरे अनुभव से काम करो।
ये जीवन, यौवन क्षणभंगुर, आराम करो, आराम करो।

यदि करना ही कुछ पड़ जाए तो अधिक न तुम उत्पात करो।
अपने घर में बैठे-बैठे बस लंबी-लंबी बात करो।

करने-धरने में क्या रक्खा जो रक्खा बात बनाने में।
जो ओठ हिलाने में रस है, वह कभी न हाथ हिलाने में।
तुम मुझसे पूछो बतलाऊँ — है मज़ा मूर्ख कहलाने में।
जीवन-जागृति में क्या रक्खा जो रक्खा है सो जाने में।

मैं यही सोचकर पास अक्ल के, कम ही जाया करता हूँ।
जो बुद्धिमान जन होते हैं, उनसे कतराया करता हूँ।
दीए जलने के पहले ही घर में आ जाया करता हूँ।
जो मिलता है, खा लेता हूँ, चुपके सो जाया करता हूँ।

मेरी गीता में लिखा हुआ — सच्चे योगी जो होते हैं,
वे कम-से-कम बारह घंटे तो बेफ़िक्री से सोते हैं।

अदवायन खिंची खाट में जो पड़ते ही आनंद आता है।
वह सात स्वर्ग, अपवर्ग, मोक्ष से भी ऊँचा उठ जाता है।
जब ‘सुख की नींद’ कढ़ा तकिया, इस सर के नीचे आता है,
तो सच कहता हूँ इस सर में, इंजन जैसा लग जाता है।

मैं मेल ट्रेन हो जाता हूँ, बुद्धि भी फक-फक करती है।
भावों का रश हो जाता है, कविता सब उमड़ी पड़ती है।

मैं औरों की तो नहीं, बात पहले अपनी ही लेता हूँ।
मैं पड़ा खाट पर बूटों को ऊँटों की उपमा देता हूँ।

मैं खटरागी हूँ मुझको तो खटिया में गीत फूटते हैं।
छत की कड़ियाँ गिनते-गिनते छंदों के बंध टूटते हैं।

मैं इसीलिए तो कहता हूँ मेरे अनुभव से काम करो।
यह खाट बिछा लो आँगन में, लेटो, बैठो, आराम करो।

– गोपालप्रसाद व्यास

ये तो आपको मालूम ही है कि हिन्दी ब्लॉग की दुनिया के एकमात्र पंगेबाज ने 6 जुलाई को संन्यास लेने की घोषणा की थी.ये एक बड़ी घटना थी कम से कम उन लोगों के लिये जो पंगेबाज के पंगों से परिचित थे.हर एक ब्लॉगर से पंगे लेने वाला बन्दा  ऎसा कैसे कर सकता है.हमने तुरंत काकेश ब्यूरो ऑफ इंवेस्टिगेसन (KBI) के कुछ जाबांज सिपाहियों को काम पर लगा दिया कि वो पता कर के आयें कि आखिर बात क्या है.उन्होने जो रपट भेजी उसी के आधार पर प्रस्तुत है ये विशेष रिपोर्ट एक्सक्लूसिबली इसी ब्लॉग पर. आइए उस पूरे घटनाक्रम पर नजर डालें…लेकिन पंगेबाज वापस लौटे या नहीं ये हम आपको बतायेंगे एक छोटे से नॉन कॉमर्शियल ब्रेक के बाद. अभी आप पूरी घटना पर एक नजर डालें.

जब पंगेबाज ने अपना पोस्ट लिखा तब वो बहुत बैचैन थे ..अब वह भले ही कहते हों कि उन्होने केवल नारद से जाने का फैसला लिया है लेकिन उनकी पोस्ट देखिये क्या कहती है…

ब्लोग की दुनिया के दोस्तो को पंगेबाज का नमस्कार
दोस्तो,ब्लोग बनाते समय मजाक मजाक मे ले लिया गया नाम एक पहचान बन जायेगा,एक मजाक से शुरु हुई पंगेबाज की ये यात्रा इतना खुबसूरत मोड लेकर यहा पहुचेगी कभी सोचा ना था,पर हुआ .आप सब लोगो का असीम प्यार का हकदार बना मै.आज दिनांक ६ जुलाई को मै पंगेबाज आप सब को अलविदा कहते हुये आप सब से विदा ले रहा हू.
आप सब से मिले प्यार दुलार का बहुत बहुत धन्यवाद,शुक्रिया,
आपका
पंगेबाज

यानि वो ब्लौग की दुनिया से जाने का मन बना चुके थे ..उस समय उन्होने अपनी नारद वाली चिट्ठी भी नहीं चिपकायी थी… हमारी आदत है कि हम सुबह सुबह बिना किसी ऎग्रीग्रेटर की मदद लिये कुछ चुनिंदा ब्लौग जरूर खोल के देखते है .. उनका ब्लॉग देखा तो वो एक संन्यासी की तरह सब कुछ छोड़ छाड़ कर जाने की घोषणा कर चुके थे…तुरंत लगा कि या तो वो नाटक कर रहें हैं या फिर रात की अभी तक उतरी नहीं ..इसिलिये हम तो टिपिया भी दिये.. लेकिन उधर से कोई जबाब आता नहीं दिखायी दिया… तो तुरंत फोन लगाया गया कि आखिर बात क्या है…??

उनकी आवाज सुनके ही लगा कि चोट कहीं गहरी लगी है.. वही निर्विकार भाव और वही बच्चों जैसी बातें….कि नहीं रहना मुझे यहां .. क्या होगा ये सब ब्लॉग लिख कर … फालतू की बातें करते हैं सब… एक दूसरे को गाली देने के अलावा कुछ काम ही नहीं रह गया है …..क्या समझता है वो @#$ अपने आपको …

हम ध्यान पूर्वक उनको सुनते रहे …ये तो साफ हो गया कि रात कि चढ़ी हुई तो नहीं ही है…. कुछ और बात है …वो बदस्तूर जारी थे..

मैं अपने काम में मन लगाउंगा ..ये करुंगा वो करुंगा …सारी की सारी पोस्टे डिलीट कर दुंगा…

हमने उन्हें समझाया …जैसे शराबी फिल्म में अमिताभ बच्चन को उनके छोटे भाई समझाते हैं… कि भैया पोस्ट डिलीट करके क्या होगा..उलटा आपकी पोस्ट को कोई कॉपी कर लेगा (कुछ लोग इसमें बहुत माहिर हैं) ..फिर अपने ब्लॉग पर छापकर अपनी हिटास बुझायेगा…. अब तो लोगों की चिट्ठा जगत के सक्रियता क्रम पर भी नजर है भाई …

तो उस समय तो मान गये कि नहीं वो पोस्ट डिलीट नहीं करेंगे …हम अपनी सफलता पर वैसे ही  खुश नजर आये जैसे माननीय प्रतिभा पाटिल को देख के शिव सेना वाले खुश होते हैं…. लेकिन मन तो खिन्न था ही कि आखिर क्या हो रहा है हिन्दी चिट्ठा जगत को….तुरंत एक पोस्ट चढ़ायी जिसको शुरु तो किया था अपनी यात्रा के बारे में बताने के लिये पर उसके बीच में ही हमने भी इन सब झमेलों से दूर रहने की घोषणा कर दी….  

पंगेबाज से दिन में फिर वार्तालाप का दूसरा राउंड हुआ ..हमने उनसे कहा कि आप भले ही पंगेबाज नाम से ना लिखें या फिर ब्लॉग ही ना लिखें पर लिखना बन्द मत करें …माशाअल्लाह अच्छा लिखते हैं…!! अब अपनी तारीफ सुनकर नाग भी काटना छोड़कर नाचना शुरु कर देता है ..वो भी पिघल ही गये … 🙂 बोले नहीं नहीं लिखना बन्द नहीं करेंगे ….क्यों करेंगे इन @#$@ के लिये ..??? हम लिखेंगे और तुमको दे देंगे…तुम अपने ब्लॉग पर छाप देना….

हमने मन ही मन सोचा कि इतना अच्छा भी नहीं लिखते कि हम अपने ब्लॉग पर छाप दें.. 🙂 पर इनसे कहा ….नहीं नहीं इसकी क्या जरूरत है ..हम आपके लिये एक नया ब्लॉग बना देंगे .. और ये ब्लॉग बना भी दिया…

कल अपनी पोस्ट चढ़ायी  और फिर इन्हें फोन लगाया और जनाब इनको पूरे 35 मिनट झेला..अब तक सारा सीन बदल चुका था ..वे घोषणा कर चुके थे ….

तो भाइ जी हम,हम है कह दिया तो कह दिया,हम पंगेबाज पर ही है और चिट्ठा जगत,ब्लोगवाणी तथा हिंदी ब्लोग पर भी होगे पर नारद पर नही परसो सुबह शायद ..अगर आप मिलना चाहे तो आ जाईयेगा

और फिर हमारी 11 सड़ी हुई कविताओं के बदले उन्होने पूरी की पूरी 12 अच्छी कविताऎं भी टिप्पणी में डाल दी…लीजिये वो भी देखिये….

धड़-धड़-धड़-धड़,
बम बम बम बम,
काहे लडें हम,
मौका देखा,
रणछोड़ चले हम.

आबाद करेंगे हम जहा नया,
ये यहा बरबाद करेंगे.
निपटा लेगे जब ये सब को
सब भस्मासुर को
याद करेंगे,

हर दम लेना तू,
ऐसे ही पंगा हमसे,
जवाब मिलेगे
पूरे दम से.

भाड़ में जाये,
तेरी दुनिया
तेरी उलझन
तेरी पलटन,
हम तो हैं,
भइ मन के राजा
जहा बैठ गये
वही पे मधुबन.

हम तो चले यहा से बच्चे
अब तू है और तेरे चच्चे
गली गली में नाला बहता,
बदबू से चाहे सर फटता,
पर कीड़ों की मौज हुई है,
गूंगा कहता,बहरा सुनता.

आओ राजा, आओ रानी,
सुन लो, सुन लो, नयी कहानी,
एक गली में कुत्ता बोला,
मेरी ब्लोगिंग बडी पुरानी.

धाक धिनक धिन,
ताक तिनक तिन,
इस्को भोकू,उस्को काटू
प्लानिंग मे
कट जाये दिन.

अब तो कर ले,
अपने मन की.
जल्द ही होगा सारा चौपट,
तू तो है ही घोषित सनकी.

लगा रहेगा
जाना जाना,
ऐसे ही बस कसते रहना
हाथ मे लेकर के तू पाना

आग लगाई
भागो ज्ञानी
नारद की बस
यही कहानी

इस जंग से तू,
क्या पायेगा,
खाली टप्पर
रह जायेगा,

बिन सोचे तू
लेता पंगे
फ़िसल पडे
तो हर हर गंगे

पंगेबाज

यानि वो वापस आने का मन बना चुके थे …और अभी अभी सूत्रों से पता चला है कि वो फिर आ रहे हैं …नहीं जी आ गये हैं……


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

कल आपकी टिप्पणीयों से कुछ तो साहस मिला कि कुछ भी लिखें पर लिखना चाहिये…वैसे मेरा भी मानना यही रहा है कि किसी भी चीज को छोड़ के भागने की प्रवृति ठीक नहीं है ..इसलिये अभी पंगेबाज जी को भी मनाने में लगे हैं कि वो भी वापस आ ही जायें… देखिये मान जायें तो आप तक खबर पहुंचायी जायेगी….

इधर बाल कविताओं का सीजन चल रहा है ..अभय जी ने इब्नबतूता फिर हल्लम हल्लम हौदा कविता चढ़ायी ..और और आज देवाषीश जी भी कविता कर बचपन को याद करने लगे … उसी के देखा देखी कुछ बड़े बच्चों के लिये कविता हमने भी लिखने की सोची … पर कविता तो आती ही नहीं लिखनी ..इसलिये कुछ तो बना ..क्या बना पता नहीं ..आप ही बताइये….

धड़-धड़-धड़-धड़,
बम बम बम बम,
चलो लड़ें हम,
काहे का गम.

आबाद करें ना,
बरबाद करेंगे.
भस्मासुर को
याद करेंगे,

ना लेना तू,
पंगा हमसे,
हम ठनके हैं
पूरे सर से.

भाड़ में जाये,
तेरी उलझन,
हम तो हैं,
थाली के बैगन.

गली गली में नाला बहता,
बदबू से चाहे सर फटता,
पर कीड़ों की मौज हुई है,
ना ये सुनता ना वो सुनता.

आओ राजा, आओ रानी,
सुन लो, सुन लो, नयी कहानी,
एक गली में कुत्ता बोला,
बिल्ली रानी बड़ी सयानी.

धाक धिनक धिन,
ताक तिनक तिन,
चूं, चूं, चूं  में
कट जाये दिन.

कर ले कर ले,
अपने मन की.
चेला चौपट,
गुरु जी सनकी.

लगी रहेगी
आनी जानी,
ले आओ बस
थोड़ा पानी.

आग बुझा के
पानी पीलो,
छोटी जिनगी
पूरी जी लो,

इस जग से तू,
क्या पायेगा,
खाली खप्पर
रह जायेगा,

कैसी लगी ये लाइनें ..बताना जरूर ..मेरे हुजूर !!

कल प्रमोद दद्दा पूछे कि “आप लिंक्ड है कि नहीं” हम सोचे ई का हो गया ….दद्दा सकाले सकाले का पूछ रहे हैं …वो भी सार्वजनिक रूप से . अब हम कैसे बतायें कि हम लिंक्ड है कि नहीं..वो भी सबके सामने…..घर में एक अदद बीबी भी है ना…. फिर जब पोस्ट में पढ़े तो उ तो एक नयी ही बात बताये कि लिंक करने से क्या क्या होता है… तो हम भी सार्वजनिक रूप से लोक लाज की फिकर किये बिना कह दिये … अरे इ बड़े काम का बात बताये हैं… हम को तो इस लिकिंत कलंकित के बारे में पता ही नहीं था..वरना पहले ही तकादा करने आये होते ..कि हमरा लिंक काहे नहीं दिये ..चलिये तब ना सही अब कर देते हैं..लगा दीजिये ना जी एक ठो हमार भी लिंक …कर दीजिये ना हमको भी लिंकित ..हमको बहूत अच्छा लगेगा जी …वैसे मालुम है कि आप लिंकित तो ना ही करेंगे पर तकादा करने में क्या हरज …वैसे भी हम लेडी नहीं लेडा हूँ…” हम सोचे कि कहां हम भरभण्‍ड के चक्‍कर में पड़ रहा हूं ..लिंकित तो ना ही होंगे …लेकिन सांझ को देखा तो हम भी लिंकित थे… तब रात को खूब सूतल…. और सपने देखने लगे और बड़बड़ाने लगे…

“लिंक न होने से लिंकन की स्थिति बेहतर है”.हमरा सौभाग्य है कि हम “अ”,”अ”,”अ” के एक “अ” से तो लिंक हो ही गये.. आपको शायद मालूम हो हिन्दी चिट्ठाजगत के अमर,अकबर और अन्थोनी (एंथोनी इंगलिश में होता है) के बारे में …क्या कहा नहीं मालूम !!..ये लो जी ..इतना भी नहीं मालूम. ये तीन है “अ” हैं अभय ,अजदक और अनामदास.अक्सर साथ साथ ही पाये जाते हैं….हाँलांकि वो कहते हैं “लेखक हमेशा अकेला होता है, संघी नहीं” ..लेकिन जो दिखता है हम तो वही बोले… वैसे इनके साथ छोटी लाईन से सफर करने वाले एक “अ” और हैं…कोई सिदो हैमबर्गर हैम्ब्रम टाईप .. लेकिन वो अभी ट्रेनिंग ले रहे हैं…किसी छोटे शहर से आये हैं ..इसलिये नींद में बड़बड़ाकर उपन्यास लिखने की प्रैक्टिस कर रहे हैं… इस बात से इनकी पत्नी बहुत परेशान हैं… आप पूछेंगे वो कैसे ..वो होता क्या है ..ये नींद में बड़बड़ाते हैं और उनकी पत्नी हाथ में कॉपी,पैन लेकर बैठी रहती हैं कि जैसे ही ये बोलें वो नोट कर लें…. इनको किसी ने बता दिया कि ब्लॉग एक डॉट कॉम होता है…तब से हर नंगे और भूखे को खोज रहे हैं कि भला ये कौन सी नयी कौम आ गयी..जिस दिन इनको वो कौम मिल जायेगी उस दिन ये भी छोटी लाईन से बड़ी लाईन में आकर लाईन मारने लगेंगे…
pyar kee pahalee awasthaa
अब हम अपने लिंकन के बारे में बता रहे थे.. हमारे लिंकन की तीन अवस्था हैं जो हर लिंक्ड के जीवन में आती ही हैं .. जब कोई नया नया लिंक्ड होके प्यार की पहली अवस्था को प्राप्त होता है तो वो स्थिति सबसे सुखद और बेहतर होती है…. आपको अपने लिंकित के प्रति अगाध श्रद्धा होती है… उसकी काँव काँव भी कोयल की कूक लगती है… आप उसके कांटो को भी पुराण की भाँति बांचते हैं.. दुनिया में उसके सिवा कोई नहीं होता ..सिर्फ आप और आपका लिंकित … आपको “लिंकित” होकर “कलंकित” होने का कोई डर नहीं होता .. आप हवा में उड़ने लगते हैं ..आपके पास सारी दुनिया से लड़ने की ताकत आ जाती है…आप और आपका लिंकित अक्सर ये सोचते हैं ..कि काश ऎसे ही जिन्दगी की शाम हो जाये… कल रात तक हमारी भी ऎसी ही स्थिति थी ..जब हम लिंकन की पहली अवस्था में थे …चित्र एक देखें … सिर्फ हम और हमारा लिंकित …

Pyar kee doosaree awasthaa

फिर जब आप हवा से जमीन की ओर कदम बढ़ाने लगते हैं …तो आपको जिन्दगी की कुछ कुछ हकीकत मालूम होती जाती है….समझ में आता है कि “और भी लिंक हैं जमाने में इसके सिवा” .. तो फिर “पुराण” “कांटे” में परिवर्तित हो जाता है ..पूछ्ने पर पता चलता है अब इन्हें “ज्ञानदत का ज्ञान” प्राप्त हो रहा है ..बुरा हो इस “ज्ञान” का जो हमारे बीच में आ गया . चित्र 2 देखें … इसी “ज्ञान” के कारण सारा झमेला हो गया.. लेकिन फिर भी मन में संतोष की चलो कोई बात नहीं चला लेंगे .थोड़ा बहुत टाइम तो मिलेगा ही ना लिंकित का….चला लेंगे जी वैसे भी ज्ञान प्राप्त होना अच्छी बात है… लोग तो अपनी बीबी बच्चे कि छोड़ कर ज्ञान की तलाश करने भाग जाते हैं ..इन्हें तो घर बैठे ही ज्ञान प्राप्त हो गया….

Pyar kee teesari awasthaa

ये दुनिया का नियम है कि यहां परिवर्तन के अलावा कुछ भी स्थायी नहीं ..परिवर्तन ही पृकृति का नियम है… यही प्यार की तीसरी अवस्था होती है… जब आप पूरी तरह जमीन में आ चुके होते हो तब आपको पता लगता है असली जिन्दगी का स्वाद ..आप नून तेल लकड़ी के चक्कर में पड़ जाते हैं ..आप का लिंकित दुनिया के झमेलों के बीच कहीं छूट सा जाता है… चित्र 3 देखें…यही है असल जिन्दगी जहां आप जीवन की धमाचौकड़ी में केवल एक लिंकन से काम नहीं चला सकते… आपको कई जगह लिंक बनाने होते है.. “बिना लिंक सब सून” वाली अवस्था है…. जितने ज्यादा लिंक उतना ज्यादा नाम और दाम … अब ये बात हमारे भी समझ में आ गयी इसलिये हमें कोई ऎतराज नहीं ..हम तो खुश हैं कि हम लिंकित हैं……

** एक चीज और देखियेगा …पहले अंतरंग तीन थे अब सिर्फ दो ..ये क्या माजरा है…ये तो भाई अजदक ही जानें…

kartoon.jpg
आज बात करते हैं हिन्दी के कुछ चिट्ठाकारों के साथ हुए मेरे अनुभवों की ..

कल लंच के समय बाहर निकला ही थी कि हिन्दी के एक चिट्ठाकार मिल गये.टीका-वीका लगाये थे और इतनी गर्मी में भी फ्रैश फ्रैश लग रहे थे … रिलांयस फ्रैश की तरह….लगता था जैसे अभी अभी हिल स्टेशन घूम के आये हों. कोई व्यक्ति जब परिवार के साथ किसी धाम की यात्रा करके आता है …विशेषकर बद्रीनाथ,केदारनाथ की …तो कुछ दिनों बड़ा ही आध्यात्मिक सा बना घूमता रहता है …वैसे ही वह भी घूम रहे थे.हमें देख वैसे तो गाली देने का मन कर रहा होगा (प्रोफेशनल राइवैलरी जनाब!! ) लेकिन अच्छी अच्छी बातें करने लगे.अरे आप तो कभी मिलते ही नहीं… मिलिये ना कभी कहीं….हमने कहा ….अरे अभी नहीं कुछ दिनों रुक जाइये… थोड़ा नाम वाम हो जाने दीजिये … फिर आयेंगे ताकि ज्यादा नहीं तो कुछ गोपियां तो हमारा भी इंतजार करते मिलें…

अरे नहीं जी आपका नाम तो हो ही गया ….कल ही हम तीन चार हिन्दी चिट्ठाकार मिले थे तो आपकी ही चर्चा कर रहे थे.

हाँ चर्चा तो कर ही रहे होंगे…. पीठ पीछे गाली देने का अवसर कौन जाने देना चाहेगा….

अरे नहीं जी वहां तो ये चर्चा हो रही थी कि आप कितना अच्छा लिखते हैं.

हम समझ गये कि ये पक्का बद्रीनाथ,केदारनाथ का असर है वरना हम यदि चर्चा में ही होते तो क्या टाइम्स मैगजीन में जगह ना पाते.अरे चिट्ठाजगत की टाइम्स मैगजीन फुरसतिया टाइम्स. लेकिन वो चढ़ाते रहे और हम चढ़ते रहे चने के झाड़ पर.

उनसे तो किसी तरह पीछा छुड़ाया लेकिन फिर हम सोचने लगे “चने के झाड़ पर चढ़ने-चढ़ाने” के बारे में.इसकी चर्चा बाद में ….पहले आपको एक और घटना के बारे में बता दें.

पिछ्ले दिनो जब गधों और घोड़ों का बोलबाला था तब एक दिन कुछ घोड़े मिल गये.घोड़े वैसे ही गधों से दोस्ती करना पसंद नहीं करते.. इसीलिये शायद वो हम से नहीं बोले लेकिन आपस में कुछ गहन वार्तालाप सा करते प्रतीत हुए . हम ध्यान लगाकर उनका वार्तालाप सुनने की कोशिश करने लगे.

अरे हमें सरकार से इस बाबत बात करनी चाहिये…

हाँ हाँ ..क्यों नहीं ये तो हमारी इंटेल्क्चुअल प्रोपर्टी है…

हमारे दिमाग में बात समझ में नहीं आयी..दो विद्वानों की बातचीत के बीच में घुसने वाले मूर्ख को वैसे भी कोई बात समझ नहीं आती.. तो हमने पूछ ही लिया कि क्या बात है…

पहले तो एक युवा घोड़े ने हमें अपनी आक्रामक नजरों से घूरा …जैसे कोई तथाकथित धर्मरक्षक किसी नग्न पेंटिंग बनाने वाले चन्द्रमोहन को घूर रहा हो… फिर जब उसने परख लिया कि इस बंदे में भी मनमोहन सिंह की तरह कोई दम नहीं है तो वो बोला…अरे हमें एम एफ हुसैन और बहुत सी कंपनियों के खिलाफ आन्दोलन छेड़ना है …क्यों भाई .. अरे हुसैन साहब हम घोड़ों पर पेंटिग बनाते हैं और हमें रॉंयल्टी भी नहीं देते .. कनाडा वाले हमारे ऊपर पूरी की पूरी पोस्ट लिखते हैं ..खूब टिप्पणी भी पाते हैं पर हमें कुछ नहीं देते.. खुद कॉकटेल पी-पीकर मुटा रहे हैं … हिन्दुस्तान में जितनी भी शक्तिवर्धक दवायें बनती हैं उन में भी हमारी फोटो होती है .. लेकिन कोई हमें रॉयल्टी नहीं देता बल्कि हमें जेल डाला जा रहा है.. और तो और सारी मशीनों की रेटिंग भी घोड़ा-पावर यानि हौर्श-पावर में होती है…. उसके लिये भी हमें कुछ नहीं मिलता … उनकी बात में दम तो था….इसलिये हम चुप हो गये … लेकिन उन्होने अपना डिसकसन जारी रखा …

अरे यार आजकल तो मनुष्य अपनी बातों में भी गधो के साथ साथ हमें शामिल कर रहा है….

क्या बोलते हो बॉस!! एक छुटभैये “तोड़ देंगे फोड़ देंगे” नेता-टाइप घोड़े ने कहा.

हाँ !! कल दो तीन मनुष्य बात कर रहे थे …कंप्यूटर इन्ड्स्ट्री में देखो ना सारे गधे-घोड़े घुसे जा रहे हैं. आधे से ज्यादा तो इसमें गधे हैं और जो घोड़े भी थे उनसे भी गधों की तरह काम लिया जा रहा है…

तो क्या हम गधों के साथ मिलकर कोई मोर्चा खोलें… आजकल वैसे भी कई गधे विभिन्न मुद्दों पर कई शहरों में अपना मोर्चा खोल रहे हैं….

अरे वो ” मोर्चा अगेंस्ट खर्चा “वाले भी गधे ही हैं क्या … एक युवा उत्साही घोड़े ने पूछा…

चुप रहो यार सीरियस बात में भी बिना कुछ समझे बूझे कूद पड़ते हो यार ..हिन्दी चिट्ठाकार की तरह….

अब बहुत ज्यादा गालियां हम से सहन नहीं हुई ….वो लोग अपनी बात कर रहे थे पर हम वहां से सरक लिये …..

अब बतायें आपको चने के झाड़ वाली बात. चने के झाड़ की बात भी घोड़ों से ही सबंधित है. “चने के झाड़ पर चढ़ाना” एक मुहावरा है जो तब प्रयोग में लाया जात जब किसी भी व्यक्ति को ये झूठा अहसास दिलाना होता है कि वो श्रेष्ठ है. इसलिये उसे चने के झाड़ पर चढ़ाया जाता है कि बेटा तू अभी कुछ भी नहीं कर सकता चल पहले इस झाड़ पर चढ़ कुछ चने खा..थोड़ी ताकत वाकत बना घोड़े जैसी फिर तू कुछ कर पायेगा.अभी तो तू फिसड्डी है , बेकार है तुझे चने की सख्त जरूरत है.. इसीलिये हमारे वो चिट्ठाकार हमें कल चने की झाड़ पर चढ़ा रहे थे.

तो आपको बात समझ में आ ही गयी होगी ..

कल महिला सशक्तीकरण के विषय में हमारा बहुत ज्ञान बढ़ा जब कहा गया ” महिला सशक्तीकरण के चक्कर में पड़ने वाले बहुत जल्दी किसी भी किस्म की शक्ति से वंचित हो जाते हैं।” शायद इसीलिये बेचारे मनमोहन सोनिया जी के सशक्तीकरण के चक्कर में शक्ति से वंचित हो गये …

एक और चिट्ठाकर टिप्पणीओफोबिया से ग्रस्त हैं और कह रहे हैं “कोई बचाओ मुझे इस टिप्पणीओफोबिया से” हम तो उनको ये ज्ञान दे आये

आओ आओ ना घबराओ..
हाथ खोल के हाथ दिखाओ
टिपियासा के मारे हम भी
थोड़ा आके तुम टिपियाओ

देखना है कि वो आज आते हैं कि

बस एक बात और …. कल शाम एक चिट्ठाकार ने कुछ अच्छे अच्छे गाने सुनवाये …गाने बहुत अच्छे थे ..मैलोडियस ..हमने भी तारीफ कर दी ..कि हां जी अच्छा लगा गाने सुनकर ..पर ये क्या वो जेब से एक छोटी सी डायरी निकाल लिये ..बोले यहां लिख कर दीजिये ..हमने कहा क्यों? बोले …अरे सबको दिखायेंगे ना कि आपको अच्छा लगा..वो भी टिपियासा से ग्रस्त एक चिट्ठाकार थे….

आजकल हमारी कंपनी , जिसमें मैं काम करता हूँ, में इंक्रीमेंट (वेतन बढ़ोत्तरी) का सीजन है…आमतौर पर अधिकतर कंपनियों में ये सीजन मार्च-अप्रेल के दौरान प्रारम्भ हो जाता है…इसकी शुरुआत होती है एक विशेष रंग में रंगे फॉर्म से (फॉर्म का रंग प्रत्येक कंपनी का अपना होता है लेकिन मेरे अनुभव के अनुसार अधिकतर कंपनियों में ये रंग नीला या हरा होता है) ..इस फॉर्म को “अप्रेजल” या “ऎप्रेजल फॉर्म” कहते हैं..आपका ऎप्रेजल आपका बॉस करता है…यानि कि आपकी परफॉर्मेंस का मूल्यांकन का काम आपके बॉस के हाथ में होता है… कहने को तो इस फॉर्म को आपके बॉस को आपके साथ बैठकर भरना होता है और आपके पिछ्ले पूरे वर्ष के काम के आधार पर आपको मूल्याकिंत करना होता है जो आपके इंक्रीमेंट का आधार बनता है पर आमतौर पर इसे आपका बॉस अकेले ही भर लेता है और इसका आधार साल भर में आपके द्वारा किये गये काम नहीं वरन आपके अपने बॉस के साथ तात्कालिक रिश्ते होते हैं …यानि इंक्रीमेंट सीजन में आप अपने बॉस के कितने करीब हैं उस पर ये निर्भर करता है ..इसीलिये इस सीजन में बहुत से लोग अपने बॉस के साथ मधुर संबंध बनाने का भरसक प्रयत्न करते हैं.. जिसे आम भाषा में चमचागिरी या तेल लगाना भी कहते हैं …

हाँ तो मैं कह रहा था कि हमारी कंपनी में भी अभी ये सीजन है ….कुछ विभागों में इंक्रीमेंट हो गये हैं कुछ में होने बाकी हैं … इसी विषय पर कल एक अनाम साथी ने एक रोमन अंग्रेजी में एक मेल भेजा .. जिसमें इंक्रीमेंट के बाद एक बॉस द्वारा अपने अधीन काम करने वाले को दिया गया ज्ञान है….. आजकल ऎसा ही ज्ञान ज्ञानदत्त जी भी दिया करते हैं…इसीलिये मैने अपने हिसाब से इसे देवनागिरी में परिवर्तित कर दिया है …आप भी ये ज्ञान ले लें….और बदले में कॉमेंट्स दे दें….

Geeta Gyan

हे पार्थ !! (कर्मचारी),

इनक्रीमेंट अच्छा नहीं हुआ, बुरा हुआ…
इनसेंटिव नहीं मिला, ये भी बुरा हुआ…
वेतन में कटौती हो रही है बुरा हो रहा है, …..

तुम पिछले इनसेंटिव ना मिलने का पश्चाताप ना करो,
तुम अगले इनसेंटिव की चिंता भी मत करो,
बस अपने वेतन में संतुष्ट रहो….

तुम्हारी जेब से क्या गया,जो रोते हो?
जो आया था सब यहीं से आया था …

तुम जब नही थे, तब भी ये कंपनी चल रही थी,
तुम जब नहीं होगे, तब भी चलेगी,
तुम कुछ भी लेकर यहां नहीं आए थे..
जो अनुभव मिला यहीं मिला…
जो भी काम किया वो कंपनी के लिए किया,
डिग़्री लेकर आए थे, अनुभव लेकर जाओगे….

जो कंप्यूटर आज तुम्हारा है,
वह कल किसी और का था….
कल किसी और का होगा और परसों किसी और का होगा..
तुम इसे अपना समझ कर क्यों मगन हो ..क्यों खुश हो…
यही खुशी तुम्हारी समस्त परेशानियों का मूल कारण है…
क्यो तुम व्यर्थ चिंता करते हो, किससे व्यर्थ डरते हो,
कौन तुम्हें निकाल सकता है… ?

सतत “नियम-परिवर्तन” कंपनी का नियम है…
जिसे तुम “नियम-परिवर्तन” कहते हो, वही तो चाल है…
एक पल में तुम बैस्ट परफॉर्मर और हीरो नम्बर वन या सुपर स्टार हो,
दूसरे पल में तुम वर्स्ट परफॉर्मर बन जाते हो ओर टारगेट अचीव नहीं कर पाते हो..

ऎप्रेजल,इनसेंटिव ये सब अपने मन से हटा दो,
अपने विचार से मिटा दो,
फिर कंपनी तुम्हारी है और तुम कंपनी के…..
ना ये इन्क्रीमेंट वगैरह तुम्हारे लिए हैं
ना तुम इसके लिये हो,

परंतु तुम्हारा जॉब सुरक्षित है
फिर तुम परेशान क्यों होते हो……..?
तुम अपने आप को कंपनी को अर्पित कर दो,
मत करो इनक्रीमेंट की चिंता…बस मन लगाकर अपना कर्म किये जाओ…
यही सबसे बड़ा गोल्डन रूल है
जो इस गोल्डन रूल को जानता है..वो ही सुखी है…..
वोह इन रिव्यू, इनसेंटिव ,ऎप्रेजल,रिटायरमेंट आदि के बंधन से सदा के लिए मुक्त हो जाता है….
तो तुम भी मुक्त होने का प्रयास करो और खुश रहो…..

तुम्हारा बॉस कृष्ण …

ये सुनकर तो हम तो शांत हो गये…आपका क्या विचार है……

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मेरा ऎलान :ये मेरी व्‍यक्तिगत रुचि-अरुचि से जुड़ी हुई मौज है- आप इस पर या तो प्रशंसा भाव से (टिप्पणी) लिखें, या आलोचना की एक ग्राह्य शैली में ही अपनी (टिप्पणी) बात रखें. लेकिन जो भी करें …करें जरूर.

अभी आज ही जब हमने इतना अच्छा गाना गाया तो लोगों ने सुना ही नहीं (अभी भी सुन लीजिये भाई) ….. बस कुछ लोग आदतन आये और पीठ थपथपा के निकल लिये… हमारे भेजे में ये बात ही नहीं आयी कि ऎसा आखिर क्यों कर हुआ …हम सिर पकड़ कर बैठ गये कि कुछ शोर सा हुआ …फिर ध्यान से सुना तो कुछ आवाजें सुनायी दी…आवाजें पड़ोस से ही आ रहीं थी.

बाहर निकले..जैसे जैसे नजदीक बढ़ते गये शोर बढ़ता गया….

एक : मैं तुम्हारे सामाजिक दायित्वबोध से खुश नहीं हूँ.

दो : लेकिन मेरी दाल-भात…

इस शोर गुल के बीच हम मौकाए वारदात पर पहुंचे… पास जाकर देखा तो अपने ही पड़ोस के दो दुकानदार थे जो आपस में लड़ रहे थे. हमने बीच बचाव करते हुए एक से पूछा …जो ज्यादा हल्ला मचा रहा था और ऊंची ऊंची आवाज में बोल रहा था….

भाई आखिर बात क्या है…किस बात की लड़ाई है….

एक : अरे ये जो पंडित जी है ना…
हम : कौन पंडित जी…???
तभी हमारी नजर गुलाबी गमछा-धारी सज्जन पर पड़ी… इतनी गरमा गरमी से माथे पर पसीने की बूदें चुहचुहा रहीं थी… माथे का पसीना गमछे से पोंछ्ते हुए बोले..
दो : देखिये मेरी यहां पर एक दुकान है …जिसमें मैं खुद दाल-भात बनाता हूँ… खुद भी खाता हूँ और लोगों को भी खिलाता हूँ….
तो …!!! हमने पूछा …
एक : अरे यहीं हमरी भी एक दुकान है….
हम : और … आप क्या बेचते हैं….????
एक : हम सभी कुछ बेचते हैं …. बिरयानी…. नमक मिर्च लगा के चिकन…मटन.. .मच्छी…
पंडित जी : छी: ..छी: ..छी: ..छी: ….. नाक भों सिकोड़ कर पंडित जी बोले.
हमारा : तो आप पूरी तरह शाकाहारी है .
एक : शाकाहारी..!!…. ये जनाब तो प्याज लहसुन भी नहीं खाते….
हम : तो इसीलिये इनको …आपसे प्रोब्लम है….
एक : अरे प्रोब्लम इनको हमसे नहीं ….हमको इनसे है…
हम : वो क्यों….???
एक : अरे आजकल लोग इनकी दाल-भात को हमारी बिरयानी से ज्यादा पसंद कर रहे हैं…
हम : लेकिन लोग तो पहले वो नमक मिर्च वाला …चिकन …मटन ….
दो : खाते थे…लेकिन जब साफ-सुथरा,स्वादिष्ट,स्वास्थवर्धक भोजन इतने कम दामों में मिले तो लोग वो क्यों लें ये ना लें…
हम : मान गये भाई पंडित जी …
पं : किसे…..
हम : आपकी पारखी नजर और आपके दाल भात को….
एक : लेकिन इससे मैं तो नहीं मानुंगा ना….
हम : क्यों…??
एक : अरे मेरा नुकसान हुआ जा रहा है और आप….

अब “एक” तैश में आ गये थे. हमने उनसे पूछा …क्या आप भी खाना खुद ही बनाते हैं ??
एक : कोशिश तो करता हूँ ..पर मुझसे ढंग का खाना बनता ही नहीं..इसलिये ज्यादा नहीं बनाता ..

तो क्या करते हैं ??
एक : मैं तो दूसरों के बनाये खाने को अपनी दुकान में सजाता हूँ …हाँ खाना कैसा भी हो,किसी ने भी बनाया हो उसे नमक मिर्च लगा के सजाने का काम मैं ही करता हूँ और अपने मन माफिक परोसता हूँ …

वो ठीक है … लेकिन आपको दूसरों के दुकान के खाने से क्या मतलब…?? कोई बिरयानी खाये-खिलाये या दाल भात ..क्या फरक पड़ता है….?????

एक : नहीं जी .. फरक कैसे नहीं पड़ता ..यदि किसी की दाल भात की दुकान चल निकली तो मेरे लजीज व्यंजनों का क्या होगा…?
हम : लेकिन व्यंजन तो आपको लजीज लगते हैं …हो सकता है लोगों को वो पसंद ना हों…
एक : अरे पसंद करना पड़ेगा … कैसे नहीं करेंगे …??? जब ये अपनी दुकान में दाल-भात रखेंगे ही नहीं तो फिर उसे खायेगा ही कौन….? भूखा आदमी इधर ही आयेगा ना …!! उनके होंठों पर कुटिल मुस्कान थी….
उनकी बात सुनकर पंडित जी भड़क उठे ..अरे ये क्या बात हुई … मेरी दुकान है… मैं निर्धारित करुंगा कि मुझे क्या बेचना है…

तभी पीछे खड़े और अभी तक चुपचाप सारा माजरा देखने वाले चूहा नुमा एक व्यक्ति सामने आये और बोले….(उन को ठीक से हिन्दी भी नहीं बोलनी आ रही थी…गले से आवाज नहीं निकल रही थी….पर फिर भी बोले….)

आप इतना भड़कीये मत पंडित जी की यहां पर आपका जो मन करेगा वही माल बेचेंगे…!!! …नहीं…. आपका एक सामाजिक जीवन है और ताक़त के षडयंत्र को समझने सोचने वाले लोग बहुत नहीं हैं इसलिए आप जैसे ही लोगों से उम्मीद की जाती है तभी कोई बात कही जाती है और कोई वाद और गुट का मामला नही है हम लोगों को एक बेहतरीन समाज बनाने के क्रम मे कई भावुक और परंपरागत बातों को छोड़कर अपने आप में भी बदलाव लाना होगा. बेचारों का विकास होते रहना चाहिए ताकि भाई…. चारा बरक़रार रह सके.

अब वो भाई कौन से चारे की बात कर रहे थे ये तो हमें समझ में आया नहीं. हमने फिर बीच बचाव करते हुए उनसे कहा….देखिये महोदय आप चुप रहिये…और “एक” से बोले…

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अरे पंडित जी को लगा लेने दो ना जिस भोजन की दुकान लगाना चाहते हैं ..आप क्यों बेकार की बहस में पढ़ते हैं.

देखिये ये एक सार्वजनिक स्‍पेस में अपने भोजन को ला रहे हैं- इसलिए उस पर बात-बहस तो होगी।

लेकिन हम तो सिर्फ भोजन ही बेच रहे हैं ..हमें दाल भात अच्छा लगता है इसलिये वही बनाते,खाते खिलाते हैं……पंडित जी थोड़ा भावुक होकर बोले….

एक : सार्वजनिक संवाद में इस कदर भावुक होंगे, तो काम नहीं चलेगा।
पंडित जी : तो क्या करूं .. लड़ूं आपसे …!!
एक : नहीं ….हमारा समर्थन कीजिये…
पंडित जी : जी नहीं ..मैं आपका समर्थन नहीं करता ..
एक : तो आप हमारा विरोध करते हैं…!!
पंडित जी : जी नहीं ..मैं आपका विरोध भी नहीं करता ..
एक : ये क्या कुछ तो करना ही पड़ेगा ही ना…
हम : अरे ये तो वही बात हो गयी … हम तो डूबेंगे सनम तुमको भी ले डूबेंगे.
पंडित जी : कहने तो ये भी कह सकते हैं … आप डूबे बामना , ले डूबे जजमान

अब जो भी है इस किस्से को यहीं खतम करो ना यार…हमारी बात सुन कर वो लोग थोड़े संभले…

अब रात ज्यादा गहरा रही थी…दोनों अपने अपने पक्ष में कुछ और तर्क जुटाने ,थोड़ी और भीड़ बढ़ाने के इरादे से अपनी अपनी राह चल दिये…

हम दोनों को जाते देर तक देखते रहे…फिर हम भी घर की ओर चल दिये….

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अरूण भाई ने कल जब अपनी करुण कहानी सुनायी तो हमने सोचा कि अरूण भाई से दोस्ती निभा ही लें (वैसे दोस्ती नहीं निभानी थी..हमें तो डर था कि कहीं हमसे ही पंगा ना ले लें) और उसी भावावेश में लिख दिया.

अरे अपने बिरादरी के लोगों से कैसा घबराना,
जरूरत पड़े तो हमें भी ले जाना ,
बहुत दिनों से भाई लोगों से बाते नहीं हुई,
चलो फिर मिल गया मिलने का बहाना.

हमने तो सच्ची मुच्ची इसलिये लिखा था कि पंगेबाज वैसे ही सबसे पंगा लेते रहते हैं कहीं फिर रास्ते में किसी मोहल्ले में…….खैर जाने दीजिये…..इसीलिये सोचा कि अपने सुरक्षा दस्ते के साथ हम भी चले चलेंगे इसी बहाने भाई लोगों से भी मुलाकात हो जायेगी. (जब से हमें कनाडा वाले नामी-गिरामी-ईनामी गदहा लेखक का पता चला तब से हम डर के मारे सारे गदर्भों को भाई कहने लगे हैं).

हमने अपना सुरक्षा दस्ता एडवांस में पंगेबाज जी के घर भेज दिया और खुद चुपचाप सजने संवरने में लग गये…..भला हो इस कनाडा वाली उड़नतस्तरी का ..न जाने उसको सारी बातें कैसे पता लग जाती हैं !!….अरे पता क्यों ना चले ….खुद चिट्ठा चर्चा का जिम्मा किसी और को पकड़ाकर इधर उधर घूम घूम कर टिपियाते रहते हैं.

उनके इस तरह टिपियाने की कला को देख कर किसी ने ठीक ही कहा है….

जहां ना पहुंचे रवि (रतलामी),वहां पहुंचे कवि (समीर-नामी)

खैर जब पता ही लग गया तो हमने सोचा कि चलो हम भी बता दें अपनी ‘गधा मिलन’ की दास्तान ……

लेकिन पहले हम अरुण भाई से एक शिकायत कर लें…आप हमसे इतना बड़ा पंगा काहे लिये भइया …कल आपने क्या लिखा था

“उन्होने हमें कल शाम तक की छूट दी है कि हम कल शाम को गधों की बस्ती में जाकर समस्त गधों के सामने श्री गर्दभ राज जी से बात करेंगे और माफ़ी भी मागेंगे …….”

अब क्या आप को मालूम नहीं हम दिमाग से थोड़ा पैदल हैं …हम नहीं समझ पाये आपके शब्दों को …हमको क्या मालूम था कि वो गधों की बस्ती नोयडा सेक्टर १६ अ में हैऔर आप वहां जाकर समस्त गधों के सामने श्री गर्दभ राज जी से बात करेंगे… और आज जब आपने लिखा

“कई सारी छोरियां उन्हें ऐसे पूछ रही थी जैसे हम हम ना हुये, उनके सेक्रेटरी हो और उनके आने से पहले मौका मुआयना पर आये हो”

तब हमारा माथा ठनका …अरे नोयडा की छोकरियों को उड़न तस्तरी से क्या वास्ता …फिर जब उनके गदहा लेखक वाली छवि दिमाग में आयी तो सब कुछ साफ हो गया.. अरे “सारी (गदर्भ) छोरियां ” क्यों ना पूछें उड़न तस्तरी के बारे में …. आपको याद नहीं ….जब उधौ गोकुल पहुंचे थे तो कैसे सारी की सारी गोपियों ने उन्हें घेर लिया था.

अंखिया हरि दरसन की प्यासी।
देख्यो चाहतिं कमलनैन कों निसि दिन रहतिं उदासी॥
आए ऊधौ फिरि गए आंगन डारि गए गर फांसी।

वो ये भी कहती हैं कि उनका एक ही तो दिल था जो समीर श्याम संग कनाडा मथुरा चला गया

ऊधौ मन न भए दस-बीस।
एक हुतो सो गयो स्याम संग को अवराधै ईस॥
इंद्री सिथिल भई केसव बिनु ज्यों देही बिनु सीस।

तो हमें तो सारा राज समझ आ गया …. लेकिन अब समझ में आके भी क्या फायदा तब तो आया नहीं समझ में और हम चल दिये गधा मिलन समारोह के लिये… ये गाना गाते गाते …..

गधा मिलन को जाना, हाँ गधा मिलन को जाना
जग की लाज……., मन की मौज…….., दोनों को निभाना…..
गधा मिलन को जाना, हाँ गधा मिलन को जाना

ढेंचू ढेंचू सीख ले, पंगा लेना छोड़ दे -2
खुद के लिये तू सीख ले -2
हर चिट्ठे पे टिपियाना …..गधा मिलन को जाना

उड़न-थाली का नाम है, सबको फंसाना काम है
आदत बड़ी बदनाम है..-2
धीरे-धीरे ,हौले-हौले
दबे पांव चले आना….. गधा मिलन को जाना

ओले पड़े हैं आज, आंधी का भी है साथ – २
कैसे कटे कठिन बाट – २
चल के आज़माना, गधा मिलन को जाना
हां गधा मिलन को जाना, जाना
गधा मिलन को जाना, जाना
गधा मिलन को जाना, हां
गधा मिलन को जाना

अब मीटिंग में क्या हुआ ये तो बतायेंगे कल….आज इतना ही..

(इस पोस्ट को साइबर कैफे से ऑनलाइन हिन्दिनी औजार का प्रयोग कर लिख रहा हूँ . इसलिये कुछ मात्रा की गलतियाँ हैँ जो कल ही सुधार पाऊँगा . आप मन ही मन सुधार लेँ . एक दिन उधार दें.)

आजकल कवियों पर शोध करने का फैशन चल निकला है . कोई कवि और कविता को नापने के चक्कर में पड़ा है ..तो कोई कवि की खोली झोली में झाँक रहा है.

कोई कवियों की शैली और कार्यों कि तुलना कर रहा है तो कोई कविता चर्चा में व्यस्त है.एक ओर कविता कोष में २००० पन्ने जोड़े जा चुके है और दूसरी ओर कवि तो कवि ,कविता-पाठकों तक को पुरुस्कार मिल रहे है . यानि पूरा का पूरा माहौल ही ‘कवितामय’ है . घुघुती जी की पड़ोसी ‘कविता’ तो फूले नही समा रही होगी .

अब कविता को नापने के चक्कर में हमारा क्या हाल हुआ था ….ये तो आप जान ही चुके हैं.

” सुबह आप की तरह मैं भी कविता को नापना चाहता था तो मिली नहीं ……. आप ने याद दिलाया और कहा कि पड़ोस वाली कविता को नापो तो उसकी माँ तो नहीं मिली पापा मिल गये ..आप ने कहा था माँ से पूछ लेना पापा का जिक्र तो था नहीं तो हम बिना पूछे नापने लगे. और जो झन्नाटेदार झांपड़ पड़ा कि घूम गये. आप भी ना …क्या क्या सलाह देती हैं…बू हू हू…. ”

कल सदी की महान मँत्र कविता को पढ़ने का भी सौभाग्य मिला . सचमुच मन गदगदा उठा ….. और मन गदा उठाकर भागना ही चाहता था कि उसे समझाया , धमकाया और उसे किसी तरह रास्ते पर लाया .

वैसे कुछ लोग आजकल प्रेरणा लेने के चक्कर मे भी पड़े हैँ … तो हमने सोचा कि हम भी प्रेरणा ले ही लेँ. अब जब खालिस,भावुक और सुन्दर कविता लिखने वाली घुघुती जी इतना अच्छा व्यँग्य लिख सकती हैँ तो अपन कविता मे हाथ क्यों नही आजमा सकते.

तो हमने भी लिख डाली सदी की महान ‘बिना मात्रा वाली’ कविता

चपल मन थम !!
मत मचल,
जतन कर,
हरदम अनबन ,
जखम, कनक-सम,
कसक तम,
चपल मन थम.

चल अचल,
बन मरहम, हरदम,
बन मत, तक्षक
न उगल गरल,
बन, मत-तक्षक,
बस संभल,
रहम कर,

खटर पटर ,
जमघट,
हट !! ,
बम-गरम, हमदम,
मचमच मत कर,
नटखट,
बदल !! ,
सब घर,
न डर,

बरस जलज सम,
कर अरपन,
नयन,चरन पर,

गलत मत कर,
खतम कर,
अब,
सब,
चपल मन थम !!

और कहते कहते मन को थाम ही लिया …. लेकिन इस महान बिना मात्रा की कविता से मन थम तो गया पर मन भरा नहीं . तो सोचा कि क्यों ना सदी की सबसे बरबाद कविता भी लिख डालेँ .

तो लीजिये वो भी हाजिर है .


झाँपड़ है, तमाचा है, कँटाप है,
बाबा जी की झोली में साँप है.

लिट्टी है चोखा है,
स्वाद ये अनोखा है. *
मूड़ी है झाल है, **
अंटी में माल है.

धांय किड़ी किड़ी,धांय किड़ी किड़ी, *!
सिगरेट को छोड़ जलाले एक बीड़ी.

घास की ओस,
बेटा है खरगोस,
तिनके वाली दूब,
अब सजेगी खूब.

फ्रीं फ्रां ध्रीग ध्रांग,
भ्रूम भाँ भ्रूम भाँ,
भों भों , काँव काँव,
आ गये अब चुनाव.

शोर है शराब है,
सत्ता का गलियारा है,
मार मत और इसे,
बेचारा दुखियारा है.

पेट में आंत है,
शेरनी के दांत है,
गाँवों की जीत है,
आज सभी मीत हैं.

सटर पटर ,
गटर गटर ,
तड़्क भड़्क,
कहाँ सड़क ?
कौन कड़क !!
मत हड़क ,
मत भड़क .

बाप ने कमाया है ,
बेटे ने लुटाया है .

झूठा है, झूठा है, झूठा है,
लूटा है, लूटा है, लूटा है,
टूटा है, टूटा है, टूटा है

खाया है, खाया है, खाया है,
भाया है, भाया है, भाया है,
माया है, माया है, माया है.

बरबाद कर,
स्वीकार कर,
जुलम कर,
जालिम बन,

अर्थ है, *(धन के अर्थ में)
अनर्थ है,
समर्थ है,
व्यर्थ है.

बिजली है ?
पानी है ?
बिटिया है ,
सयानी है .

खूँ खाँ खूँ खाँ ,
खून खराबा ,
कूँ काँ क़ूँ काँ ,
काके दा ढाबा ,

मान कर,
मानकर,
अपमान कर,
ध्यान कर ,
चल निकल,
सटक तू,
मत अटक तू,
गलहार है,
तैयार है,
आ बैठ ,
कुर्सी पर ,

अब इस सदी की सबसे बरबाद कविता का अर्थ कोई हम से ना पूछे .

अभय जी से पूछ ले.

हम तो चले..

* (ये प्रमोद जी की एक टिप्पणी से लिया है.लिट्टी-चोखा बिहार के प्रमुख व्यंजनो में है)
** (झाल-मूड़ी बंगाल में बहुत प्रसिद्ध है,भेल पूरी या लैया-चना जैसा)
*! (उड़ीसा में बोलचाल में प्रयुक्त होता है)

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