यूं ही


आप कितना भी कमाने लगो आपकी इच्छाओं या कहें जरुरतों और जेब का अंतर बराबर ही रहता है.एक तरफ लगता है कि चीजें अब पहुंच में आ जायेंगी लेकिन नहीं आती दूसरी तरफ लगता कि हम किन चीजों के पीछे भाग रहे हैं और क्यों भाग रहे हैं? ऎसे विचार इसलिये मन मे आलोड़न विलोड़न करने लगते हैं जब देखता हूँ कि दुनिया में कितनी असमानता है. क्या ये असमानता हमेशा से थी ? क्या ये असमानता हमेशा रहेगी ? तो क्या पूंजीवाद सही में खराब है ? तो क्या साम्यवाद सही है?

चलिये दो घटनाओं से आपका परिचय करवाता हूँ.कल एक व्यक्ति से, जिनसे कभी कभी बात होती रहती है लेकिन जिनको मित्र की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता,बात हो रही थी.उन्होने बताया कि अभी हाल ही में उन्होने नया फ्लैट बुक करवाया है. वो अभी खुद के फ्लैट में ही रहते है और एक नया फ्लैट इनवैस्टमेंट के तौर पर लिया है. कीमत एक करोड़ से ऊपर की है. कितनी ये उन्होने नहीं बताया. वह सज्जन कहीं नौकरी भी नहीं करते. केवल बी.कॉम पास हैं.क्या करते हैं ये तो मेरे को नहीं मालूम लेकिन जब ऑफिस के लिये निकलता हूँ सुबह तो सोसायटी के लॉन में बैठे नजर आते हैं और शाम को लौटता हूँ तो अक्सर वहीं घूमते,गपियाते मिल जाते हैं. क्या करते हैं नहीं मालूम. कोई कहता है कि शेयर का काम करते हैं,कोई कहता है कि प्रॉपर्टी का काम करते हैं. तो फिर वो पैसा कहाँ से कमाते हैं? उनके पास दो दो गाड़ियाँ भी हैं…और उनका घर देखो (हाँलाकि मैं कभी गया नहीं पर पत्नी ने बताया) लगता है फाइव स्टार होटल है. तीन कमरों में प्लाज्मा टीवी, हॉल में होम थियेटर, तरह तरह की पेंटिंग्स. एक पेंटिंग की कीमत लाख से ऊपर है, ऎसा उनकी पत्नी ने मेरी पत्नी को बताया… और फिर एक करोड़ से ऊपर का फ्लैट भी बुक करा दिया.

आज सुबह अपनी मधुशाला वाली पोस्ट पूरी की तो थोड़ी निराशा सी थी मन में. उमर खैयाम की रुबाइयों में एक तरह का दर्द है जो जीवन को नश्वर बता कर अंदर तक झकखोर देता है. निराशा और बढ़ी जब इतनी मेहनत से लिखी पोस्ट पर कॉमेंट नहीं आये. सोचने लगा कि इतनी मेहनत ‘उमर’ पर करूँ या किसी और विषय़ पर. खैर वो अलग बात है लेकिन आज एक समाचार पढ़ने में आया. बिहार में ‘गया’ नामक स्थान इसलिये प्रसिद्ध है क्योकि यहां पितृ आत्माओं के लिये श्राद्ध किये जाते हैं. अभी चल रहे पितृ दिवस में यहाँ पांव रखने की भी जगह नहीं रहती. लोग आत्माओं की शाति के लिये पिंड दान करते हैं.इन पिंडों को पानी में बहाने या गाय को खिलाने का चलन है. लेकिन गया में बहुत से लोग ऎसे है जो इन पिंडो को उठा लेते हैं और इनको सुखाकर,पीसकर खाते हैं और अपनी उदर तृप्ति करते हैं.समाचार के अनुसार इन पिंडों से इन लोगों के 2-3 महीने का खाना चल जाता है.

कैसी विडम्बना है ..एक ओर तो हम मृत आत्माओं की उदरपूर्ति के लिये श्राद्ध कर रहे हैं और यहां जीवित आत्माऎं भोजन की तलाश में भटक रही हैं.

समाचार : दैनिक जागरण

पितृपक्ष मेले में पिंडदान के लिए आए लोगों की तलाश में लगी कई महिलाओं और बच्चों को देखा जा सकता है। ये वह लोग हैं जो अपने पेट की आग बुझाने के लिए दान किए गए पिंड ढूंढते फिरते हैं। पिंडों को लेकर अक्सर इनमें झगड़ा भी होता रहता है। गया में इन दिनों यह दृश्य आम है। प्रमुख पिंडवेदी स्थल विष्णुपद, अक्षयवट एवं सीताकुंड आदि जगहों पर कई महिलाएं और बच्चियां अर्पित पिंड बीनती रहती हैं पिंड जौ के आटे, चावल और तिल के मिश्रण से बनता है। इसे वैदिक मंत्रोच्चारण के बाद पूर्वजों की आत्माओं को समर्पित किया जाता है। विधान यह भी है कि पिंड को जल में प्रवाहित कर दिया जाए या गाय को खिला दिया जाए। हालांकि आम तौर पर ऐसा नहीं होता। यही वजह है कि धार्मिक विधानों को तोड़ गरीब, वेदी के आसपास पिंड बटोरने को जुटे रहते हैं। पिंड बटोरने वाले बताते हैं-वह इसे धूप में सुखाने के बाद कूट और चाल कर रोटी बनाते हैं। इससे उनका दो-तीन महीने तक काम चल जाता है। इस तरह कई परिवार पलते हैं। इन लोगों को पितृपक्ष का बेसब्री से इंतजार रहता है। गरीबी उन्मूलन की योजनाओं के बारे में ये लोग बहुत कुछ नहीं जानते, लेकिन इतना जरूर कहते हैं कि अगर उन्हें गेहूं-चावल मिलता तो पिंड चुनने की जरूरत ही नहीं पड़ती।

दरअसल ब्लॉग की शुरुआत एक दैनिन्दिनी या डायरी के रूप में ही हुई थी. लोगो ने इसे अपनी डायरी का ही एक हिस्सा माना. ऎसी डायरी जो सार्वजनिक थी.इसी कारण अधिकतर लोगों ने छ्द्म नामों से लिखना प्रारम्भ किया.लेकिन आज ब्लॉग का स्वरूप बदल रहा है. लोग इसे वैकल्पिक पत्रकारिता या साहित्य लेखन से जोड़ने लगे है.इस चिट्ठे पर अब कुछ व्यक्तिगत से मुद्दों पर लिखने का विचार है.कम से कम सप्ताह में एक बार. हाँलाकि अब मैं नये चिट्ठे पर लिखने लगा हूँ. लेकिन वहाँ पर कोशिश है कि कुछ साहित्यिक टाइप (?) का लेखन करूँ.

किताबों से मुझे सदा से ही बहुत प्यार रहा है.बचपन से ही किताबें पढने का शौक रहा है. तब पढ़ने का समय होता था पर तब पैसे नहीं होते थे कि किताब खरीद सकें. अब पैसे हैं तो किताब पढ़ने का समय सिमटता जा रहा है. उन दिनों पुस्तकालय में जाके किताबें पढ़ता था. पर इस तरह पढ़ने से एक ही नुकसान होता है कि जब आप समय के साथ पढ़े हुए को भूलने लगते हैं और आपको फिर से उसी किताब को पढ़ने की इच्छा होती है तो आप कुछ नहीं कर पाते.कभी किसी किताब में पढ़े हुए को सन्दर्भ के रूप में प्रयोग करना हो भी आप मुश्किल में पढ़ जाते हैं. पिछ्ले दिनों प्रगति मैदान में एक छोटा सा पुस्तक मेला लगा था. मैं भी गया और कई किताबें खरीद डाली. उनकी चर्चा अपने मुख्य ब्लॉग पर कभी करुंगा.

हिन्दी ब्लॉग लेखन से कम से कम मुझे एक लाभ हुआ है कि हिन्दी किताबों में रुचि फिर से बढ़ने लगी है. जब से प्राइवेट सैक्टर में नौकरी प्रारम्भ की तब से अधिकतर काम अंग्रेजी में ही होता है इसलिये अंग्रेजी ज्यादा रास आने लगी थी…और फिर अंग्रेजी किताबें पढ़ने का सिलसिला भी चालू हुआ. हिन्दी किताबें छूटती ही जा रहीं थी.हाँलाकि रस्म अदायगी के तौर पर हिन्दी किताबें कम से कम साल में एक बार खरीदता रहा लेकिन सब किताबें पढ़ी जायें ये संभव नहीं हो पाया. अब ब्लॉग लेखन के बाद हिन्दी की किताबों में दिलचस्पी फिर से बढ़ी है.इसीलिये कुछ नयी किताबें खरीद रहा हूँ कुछ पुरानी पढ़ रहा हूँ. राजकमल की ‘पुस्तक मित्र योजना’ का भी सदस्य बन गया हूँ.

कुछ पत्रिकाऎं भी नियमित रूप से मँगा रहा हूँ. ‘कथादेश’ अविनाश जी के लेख के लिये नियमित पढ़्ता हूँ. ‘आलोचना’ और ‘वाक’ भी मंगा रखी हैं. ‘लफ्ज’ का भी ग्राहक बन रहा हूँ. कल भी श्री राम सैंटर से कुछ किताबें खरीद लाया. कितनी पढ़ी जायेंगी मालूम नहीं..

ये सब क्यों कर रहा हूँ या क्यो हो रहा है पता नहीं…पर जो भी है…मैं मानता हूँ कि अच्छा ही है…

थैक्यू ब्लॉगिंग.

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अभी हाल ही में जो लिखा दूसरे चिट्ठे पर. उमर खैयाम की रुबाइयों पर एक विशेष श्रंखला प्रारम्भ की है.

1. खैयाम की मधुशाला..

2. उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद..

3. मधुशाला में विराम..टिप्पणी चर्चा के लिये
4. उमर की रुबाइयों के अनुवाद भारतीय भाषाओं में

  कुछ व्यंग्य जो पिछ्ले दिनों लिखे.

1. एक व्यंग्य पुस्तक का विमोचन

2. एक ग्रेट फादर का बर्थडे…[ यह बहुत पसंद किया गया.न पढ़ा हो तो कृपया पढ़ लें]

3. सपना मेरा मनी मनी !!

4. एस.एम.एस.प्यार ( SMS Love) [ यह भी हिट रहा]

5. चकाचक प्रगति का फंडा

6. शांति की बेरोजगारी

बहस / मेरे विचार

1.नो सॉरी ..नो थैंक्यू !!

2. क्या चिट्ठाकार बढ़ने से फायदा हुआ है?

सूचना टाइप

1. ऑटो/टैक्सी के लिये मोलभाव गलत है ? !

2. प्रिंट में छ्पते चिट्ठाकार

हिन्दी चिट्ठाजगत की दुनिया आजकल शोधमय भी है और हिटास के प्रति जागरूक भी.कोई हिट होना सिखा रहा है तो कोई हिट करना.हिट पर आधारित सभी चीजें हिट हैं.हिट की हीट का ये असर है कि लोग हिट की चाह में लेखन कर रहे हैं.भले ही आप कहें कि हिट के लिये न लिखो खुद के लिये लिखो लेकिन इसका परोक्ष लाभ भी है कि हिन्दी में ‘कुछ’ लिखा जा रहा है. सारा लिखा स्तरीय ना भी हो तो कूड़ा भी नहीं है.

विषयों की विविधता भी बढ़ी है. विविधता चुनाव का अवसर देती है और बने बनाये परिवार या गुट से अलग होने का अवसर भी. वो दिन धीरे धीरे खतम हो रहे हैं जब आपको किसी भी लेख को पढ़कर ना चाहते हुए भी “अच्छा है अच्छा है” कहना पड़ता था. अभी आप “पीठ खुजाने” के बोरिंग काम से ऊपर उठकर विमर्श के लिये तैयार हो पाते है या हो पायेंगे. टिप्पणीयों में विमर्श हो या लेखों में विमर्श किसी भी तरह का काम हिन्दी के लिये अच्छा ही है. हाल में हुए विवादों ने भले ही किसी के लिये व्यक्तिगत रूप से भला किया हो या ना हो हिन्दी और हिन्दी चिट्ठाजगत का जरूर भला किया है.लोग अपने विचार खुलकर रखने लगे है. चाहे उसकी परिणति भड़ास के रूप में हो या परिवर्तित पंगेबाज के रूप में.

ये परिवर्तन मैने भी खुद में भी महसूस किया है.मेरा भी हिन्दा चिट्ठाजगत से पारिवारिक मोह भंग हुआ है और मेरी अन्य विषयों के प्रति सोच विस्तृत हुई है. पहले मैं सोचा करता था कि शायद में किसी चिट्ठाकार से ना मिलूं या उससे बातें ना करूँ ..गुमनाम रहकर ही लिखते रहूँ ऎसी सोच थी..यह मेरे अन्दर के भय के कारण था या मेरे अंतर्मुखी व्यक्तित्व के कारण ..नहीं मालूम ..पर अब वो सोच नहीं रही.. प्रमोद जी ने मेरे किसी लेख पर अपनी टिप्पणी में कहा था कि “डरो मत अब बड़े हो गये हो”…मुझे लगता है कि मैं सचमुच बड़ा हो गया हूँ..ये अहसास मुझे दूसरों को समझने के लिये उकसाता है.. फालतू की बातों में उलझ कर समय व्यर्थ ना करूं ऎसी सोच देता है.. इसलिये मैं इसे चिट्ठाजगत की उपलब्धि मानता हूँ …कम से कम अपने लिये…

नये फीड संयोजको का आना शुभ संकेत है आने वाले समय इनकी जरूरत और भी महसूस की जायेगी..इनका स्वरूप भी बदलेगा और इनसे होने वाली अपेक्षाऎं भी ..

आशा करें हम हिन्दी का रोना रोने वाले लोग हिन्दी के नाम पर खुश भी हो सकेंगे..

पिछ्ले कुछ दिनों से दिल्ली से बाहर था..इस शोर शराबे,भीड़ भड़ाके से दूर.. शांत पहाड़ की वादियों में. एक वरिष्ठ चिट्ठाकार ने भी वादा किया था कि वे जुलाई के प्रथम सप्ताह में मेरे साथ पहाड़ आयेंगे उसी हिसाब से सारा कार्यक्रम बनाया था पर फिर वो नहीं आये..फिर मैं ही अपने परिवार को लेके चल पड़ा ..कुछ  दिन हल्द्वानी रहा फिर मेरे अपने शहर अल्मोड़ा में भी जाना हुआ. वही अल्मोड़ा जो मेरे बचपन का साक्षी रहा है.वही अल्मोड़ा जिसने मुझे जीवन की आपाधापी से जूझना सिखाया..वहीं जहां मैने सुनहले भविष्य के सपने देखे..जिसकी पटाल वाली बाजार में दोस्तों के साथ घूमा ..जहां गोलू देवता,भोलेनाथ और नंदादेवी को वहां की मान्यताओं के हिसाब से पूजा. .. अभी कई सालों बाद वहां गया तो पाया कि कितना बदल गया है मेरा अल्मोड़ा… पटाल वाली बाजार के सारे पत्थर बदल दिये गये हैं  कोई नये पत्थर लगाये गये हैं. ..जो पहले जैसी शोभा नहीं देते.. नये नये मकान बन गये हैं कई नये होटल खुल गये हैं… और भी बहुत कुछ बदल गया है इस शहर में…

इधर हिन्दी चिट्ठाजगत में भी बहुत कुछ घट गया है …घट रहा है…अभी पंगेबाज ने अलविदा कहा.. पहले धुरविरोधी अलविदा कह चुके हैं… मेरा मन भी पिछ्ले कुछ विवादों से बोझिल सा हो गया है… कुछ लोग होते हैं इस चिट्ठाकारी में… जो केवल खुद ही लिखते हैं बिना इस बात की परवाह किये हुए कि उनके आसपास क्या हो रहा है ..कौन क्या कर रहा है.. मैने हमेशा से ही अपने आसपास के विषयों को छुआ ..इसी कारण मेरी दूसरी ही पोस्ट विवादों में घिर गयी… मुझे खुद के लेखन से ज्यादा दूसरों का लेखन प्रभावित करता रहा है..इसलिये उन्ही सब से प्रेरणा ले के लिखता रहा हूँ.. जब से ये “नारद विवाद” हुआ तब से लिखने की इच्छा खतम सी हो गयी .. ना मालूम  किस बात का कोई गलत मतलब निकाल ले….

लेकिन ना तो मैं अलविदा कह रहा हूँ ना ही चिट्ठा बन्द करने की धमकी दे रहा हूँ.. 🙂 बस अभी कुछ दिनों से जो कर रहा हूँ वही करुंगा ..यनि सिर्फ चिट्ठों को पढ़ुंगा और टिपियाउंगा…

इधर ब्लॉगवाणी भी अवतरित हुई है… पहला प्रारूप काफी अच्छा लगता है …हांलांकि वो कह रहे हैं कि अभी परीक्षण चल रहा है ..पर परीक्षण भी काफी अच्छा है… आगे देखिये और क्या क्या होता है….

कहीं कुछ दरक गया लगता है,
कोई थक के लुढ़क गया लगता है.
साहिलों के करीब ही था मेरा माझी,
लेकिन तूफान फिर लिपट गया लगता है.

बदलते रास्ते हैं, फिर भी जिन्दा हैं,
टूटे अहसास हैं , फिर भी जिन्दा हैं,
आप समझो इसे या ना समझो.
हम तो आज तलक शर्मिन्दा हैं.

राह से तेरी नहीं गुजरना अब,
वक्त मेरा बदलने वाला है.
रात काली जरूर थी मेरे हमदम,
अब तो सूरज निकलने वाला है…

काकेश


आज कई दिन बाद फिर से अवतरित हुआ हूँ इस ब्लौग में… इस बीच ना जाने कितने नये ब्लौग आ चुके होंगे और नयी पोस्ट तो और भी ज्यादा होंगी ..लेकिन मैं कुछ भी पोस्ट करने का साहस नहीं जुटा पा रहा था ..एक तो समय की कमी और दूसरी मन में ब्लौग को लेकर चलती उधेड़बुन.. पिछ्ली पोस्ट लिखी तो ज्ञानदत्त जी ने उसे ऑर्गेनिक कैमस्ट्री का नाम दिया था ..तब बात समझ नहीं आयी लेकिन उन्होने अपनी पोस्ट में उसे स्पष्ट करने का प्रयास भी किया . उन्होने कहा कि “काकेश; लगता हैं बड़े मंजे ब्लॉगर हैं। ” [इससे हमें आपत्ति है ..क्योकि पहले तो हम खुद को खिलाड़ी कहकर खिलाड़ियों का अपमान नहीं करना चाहते … हाँ भारतीय टीम के क्रिकेट खिलाड़ी कहते तब भी ठीक था और फिर मँजे हुए … मँजने के बाद ही धुलने का नम्बर आता है ..तो अब हमारी धुलाई होने वाली है उस बात से थोड़ा घबरा भी गये 🙂 ] …फिर जब उन्होने अपने जुनून की बात की तब टिप्पणीयों के द्वारा पता चला कि चिट्ठाकारी का कोई उद्देश्य भी होना चाहिये … हम तो यूँ ही चिट्ठाकारी करने में लगे थे कि मन हुआ तो कुछ लिख दिया नहीं तो पढ़ते रहो… टिपियाते रहो…लेकिन अब कोई कह रहा है कि कोई उद्देश्य भी होना चाहिये .. तो हम जैसे उद्देश्यहीन व्यक्ति क्या करें … ब्लौग लिखें या नहीं….??

फिर कुछ दिन पहले एक चिट्ठाकार से बात हुई तो यूँ ही जब उन्हे हमारी उम्र पता लगी तो कहने लगे ..अरे आप इतने बड़े हैं आपके लेखन से तो लगता था कि आप कोई 20-25 साल के ही होंगे… अब इसमें वैसे खुश होने की बात तो थी नहीं कि मेरे चेहरे से मेरी उम्र का पता ही नहीं चलता टाइप … क्योंकि उनसे तो सिर्फ वर्चुअल मुलाकात हुई थी … हम सोचे कि हम इतना घटिया लिखते हैं इसीलिए इन महाशय को लगा होगा कि कोई पढ़ा-लिखा समझदार परिपक्व आदमी तो ऎसा लिख ही नहीं सकता ..वैसे यहां ये भी बता दें कि हम पढ़े,लिखे,समझदार,परिपक्व हैं भी नहीं … इसलिये कोई विशेष अनुभूति नहीं हुई..उलटे अच्छा ही लगा …

फिर जब निर्मलानंद जी से मिले तो वो बोले अरे आप तो इतनी कम उम्र के हैं ..हम तो आपको ..खैर उन्होने जो भी कहा वो उसका बिल्कुल उलटा था जो पहले चिट्ठाकार ने कहा था… मेरी उधेड़बुन और बढ़ गयी .. आजकल प्रमोद भाई अपने को पहचानने की बात करने लगे हैं… और आज ज्ञानदत्त जी ने भी एक तरह की पहचान की बात छेड़ दी …मेरा तो कनफ्यूजन बढता ही जा रहा है … मैं अनेक सवालों से दो चार हो रहा हूँ ..क्या मेरा लेखन (ही) मेरी पहचान नहीं है ? क्या किसी के लेखन से उसकी उम्र और उसके व्यक्तित्व का पता चलता है ..या फिर चलना भी चाहिये क्या ?? क्या एक ही तरह का लेखन दो अलग अलग व्यक्तियों को दो अलग अलग अर्थ दे सकता है ? यदि हाँ तो क्या इसमें लेखक का दोष है या फिर पढने वाले का या कि किसी का नहीं… क्या व्यक्ति के विचार समझने के लिये व्यक्ति को जानना आवश्यक है .. ?? ज्ञानदत्त जी ने कहा ” लोग ब्लॉग पर अपने प्रोफाइल में आत्मकथ्य के रूप में हाइपरबोल में लपेट-लपेट कर न लिखें. अपने बारे में तथ्यात्मक विवरण दें. अपने को न तो महिमामण्डित करें और न डीरेट ” वो लोग जिंन्होने अपने प्रोफाइल में कुछ नहीं लिखा या बढ़ा चढ़ा कर लिखा है तो उससे उनका लेखन अच्छा या बुरा हो सकता है ..??

मैं इन्ही प्रश्नों से दो चार होता हूं ..आप कुछ सुझायें ताकि हम कुछ नया लेकर आपके सामने आयें…

आजकल हमारी कंपनी , जिसमें मैं काम करता हूँ, में इंक्रीमेंट (वेतन बढ़ोत्तरी) का सीजन है…आमतौर पर अधिकतर कंपनियों में ये सीजन मार्च-अप्रेल के दौरान प्रारम्भ हो जाता है…इसकी शुरुआत होती है एक विशेष रंग में रंगे फॉर्म से (फॉर्म का रंग प्रत्येक कंपनी का अपना होता है लेकिन मेरे अनुभव के अनुसार अधिकतर कंपनियों में ये रंग नीला या हरा होता है) ..इस फॉर्म को “अप्रेजल” या “ऎप्रेजल फॉर्म” कहते हैं..आपका ऎप्रेजल आपका बॉस करता है…यानि कि आपकी परफॉर्मेंस का मूल्यांकन का काम आपके बॉस के हाथ में होता है… कहने को तो इस फॉर्म को आपके बॉस को आपके साथ बैठकर भरना होता है और आपके पिछ्ले पूरे वर्ष के काम के आधार पर आपको मूल्याकिंत करना होता है जो आपके इंक्रीमेंट का आधार बनता है पर आमतौर पर इसे आपका बॉस अकेले ही भर लेता है और इसका आधार साल भर में आपके द्वारा किये गये काम नहीं वरन आपके अपने बॉस के साथ तात्कालिक रिश्ते होते हैं …यानि इंक्रीमेंट सीजन में आप अपने बॉस के कितने करीब हैं उस पर ये निर्भर करता है ..इसीलिये इस सीजन में बहुत से लोग अपने बॉस के साथ मधुर संबंध बनाने का भरसक प्रयत्न करते हैं.. जिसे आम भाषा में चमचागिरी या तेल लगाना भी कहते हैं …

हाँ तो मैं कह रहा था कि हमारी कंपनी में भी अभी ये सीजन है ….कुछ विभागों में इंक्रीमेंट हो गये हैं कुछ में होने बाकी हैं … इसी विषय पर कल एक अनाम साथी ने एक रोमन अंग्रेजी में एक मेल भेजा .. जिसमें इंक्रीमेंट के बाद एक बॉस द्वारा अपने अधीन काम करने वाले को दिया गया ज्ञान है….. आजकल ऎसा ही ज्ञान ज्ञानदत्त जी भी दिया करते हैं…इसीलिये मैने अपने हिसाब से इसे देवनागिरी में परिवर्तित कर दिया है …आप भी ये ज्ञान ले लें….और बदले में कॉमेंट्स दे दें….

Geeta Gyan

हे पार्थ !! (कर्मचारी),

इनक्रीमेंट अच्छा नहीं हुआ, बुरा हुआ…
इनसेंटिव नहीं मिला, ये भी बुरा हुआ…
वेतन में कटौती हो रही है बुरा हो रहा है, …..

तुम पिछले इनसेंटिव ना मिलने का पश्चाताप ना करो,
तुम अगले इनसेंटिव की चिंता भी मत करो,
बस अपने वेतन में संतुष्ट रहो….

तुम्हारी जेब से क्या गया,जो रोते हो?
जो आया था सब यहीं से आया था …

तुम जब नही थे, तब भी ये कंपनी चल रही थी,
तुम जब नहीं होगे, तब भी चलेगी,
तुम कुछ भी लेकर यहां नहीं आए थे..
जो अनुभव मिला यहीं मिला…
जो भी काम किया वो कंपनी के लिए किया,
डिग़्री लेकर आए थे, अनुभव लेकर जाओगे….

जो कंप्यूटर आज तुम्हारा है,
वह कल किसी और का था….
कल किसी और का होगा और परसों किसी और का होगा..
तुम इसे अपना समझ कर क्यों मगन हो ..क्यों खुश हो…
यही खुशी तुम्हारी समस्त परेशानियों का मूल कारण है…
क्यो तुम व्यर्थ चिंता करते हो, किससे व्यर्थ डरते हो,
कौन तुम्हें निकाल सकता है… ?

सतत “नियम-परिवर्तन” कंपनी का नियम है…
जिसे तुम “नियम-परिवर्तन” कहते हो, वही तो चाल है…
एक पल में तुम बैस्ट परफॉर्मर और हीरो नम्बर वन या सुपर स्टार हो,
दूसरे पल में तुम वर्स्ट परफॉर्मर बन जाते हो ओर टारगेट अचीव नहीं कर पाते हो..

ऎप्रेजल,इनसेंटिव ये सब अपने मन से हटा दो,
अपने विचार से मिटा दो,
फिर कंपनी तुम्हारी है और तुम कंपनी के…..
ना ये इन्क्रीमेंट वगैरह तुम्हारे लिए हैं
ना तुम इसके लिये हो,

परंतु तुम्हारा जॉब सुरक्षित है
फिर तुम परेशान क्यों होते हो……..?
तुम अपने आप को कंपनी को अर्पित कर दो,
मत करो इनक्रीमेंट की चिंता…बस मन लगाकर अपना कर्म किये जाओ…
यही सबसे बड़ा गोल्डन रूल है
जो इस गोल्डन रूल को जानता है..वो ही सुखी है…..
वोह इन रिव्यू, इनसेंटिव ,ऎप्रेजल,रिटायरमेंट आदि के बंधन से सदा के लिए मुक्त हो जाता है….
तो तुम भी मुक्त होने का प्रयास करो और खुश रहो…..

तुम्हारा बॉस कृष्ण …

ये सुनकर तो हम तो शांत हो गये…आपका क्या विचार है……

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आपने जिम और डेला की कहानी तो पढ़ी ही होगी…यदि नहीं पढ़ी तो थोड़ा इसके बारे में भी बता दूं..

ये कहानी ओ हैनरी ने लिखी थी. ..कहानी का नाम था “The Gift of the Magi”

जिम और डेला नाम के दो दम्पति अमरीका के न्यूयार्क शहर में रहते थे. दोनों बहुत गरीब थे लेकिन एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे. जिम के पास एक घड़ी है लेकिन उसकी चेन उसके पास नहीं है .जिम के पास इतने पैसे भी नहीं हैं कि वो नयी चेन खरीद सके.डेला के बाल बहुत ही घने ,लंबे और सुन्दर हैं.जिम को भी डेला के बाल बहुत अच्छे लगते हैं. जिम को अपनी घड़ी और डेला को अपने बालों से बहुत प्यार है. क्रिसमस बस अब एक ही दिन दूर था. डेला के पास सिर्फ कुछ ही पैसे थे …लगभग 1 रुपये 87 पैसे … पर वह जिम को एक अच्छा सा क्रिसमस का उपहार,उसकी घड़ी के लिये एक चेन, देना चाहती थी.डेला जब चेन खरीदने गयी तो उसे पता चला कि चेन का दाम 21 रुपये था. डेला सोच में पड़ गयी और उसने एक बिग बनाने वाली को अपने बालों को बेचने का निर्णय लिया. इस तरह उसने 20 रुपये कमाए और एक अच्छी से चेन खरीद कर,बढ़िया सा खाना बनाकर वह जिम की प्रतीक्षा करने लगी.. वह खुश थी और इस बात की कल्पना कर थी कि कैसे जिम इस चेन को देख कर चौंक जायेगा.हाँलांकि वो थोड़ा डर भी रही थी कि कहीं उसके कटे हुए बालों को देखकर जिम नाराज ना हो जाये.

जब जिम वापस लौटा तो वो चकित ही रह गया लेकिन डेला के छोटे,कटे हुए बालों को देखकर.उसने डेला को भयभीत कर देने वाली नजरों से घूरा.डेला ने डरते डरते बताया कि कैसे उसने जिम के लिये घड़ी की चेन लेने के खतिर अपने बालों को बेच डाला. जिम ने उसे समझाया कि उसे डरने की आवश्यकता नहीं है क्योकि उसका प्यार इन छोटी छोटी बातों से कम नहीं होगा लेकिन वह भी डेला के लिये एक क्रिसमस का उपहार लाया था और ऎसा कहके उसने अपने हाथ का लिफाफा डेला के हाथ में पकड़ा दिया. डेला ने जब लिफाफा खोला तो उसमें डेला के लिये वो खूबसूरत कंघे थे जो वह खरीदना चाहती थी पर मँहगे होने के कारण खरीद नहीं पायी थी. डेला ने भी अपना उपहार यानि की घड़ी की चेन जिम को दी और कहा कि वह उसे घड़ी में लगा कर पहने..जिम के उत्तर से डेला और भी चौंक गयी क्योकि उन खूबसूरत कंघों को खरीदने के लिये जिम ने अपनी घड़ी बेच दी थी.

तो ये तो थी ओ हैनरी साहब की कहानी जो कभी बचपन में पढ़ी थी…वैसे यदि आप ये पूरी कहानी अंग्रेजी में पढ़ें तो और भी मजा आयेगा …. अब इसी से मिलती जुलती दो घटनाऎं जो मेरे सामने ही घटीं मेरे मित्र के साथ….एक दूसरे को सरप्राईज करने के चक्कर में ….आप भी देखिये……

जब मेरे मित्र का प्रेम प्रसंग चल रहा था तो उनकी तब की प्रेमिका और अभी की पत्नी कॉलेज में पढ़ा करतीं थीं…. मित्र का ऑफिस का रास्ता और उनकी प्रेमिका जी का रास्ता एक ही था पर फिर भी वो लोग एक दूसरे को देख भी नहीं पाते थे…क्योकि मित्र साढ़े आठ बजे के आसपास ऑफिस के लिये निकलते थे और प्रेजी साढ़े दस बजे के आसपास .. तो सारा वार्तालाप फोन तक ही सीमित था…. एक दिन प्रेजी को कॉलेज जल्दी जाना था ….करीब नौ बजे… तो वो मित्र को बोली कि आप कल थोड़ा सा देर से चले जाना ताकि रास्ते में हम एक दूसरे को देख सकें … वो अभी तक दुनिया के सामने एक दूसरे को देखने तक ही सीमित थे…. मित्र ने कहा नहीं मैं तो साढ़े आठ बजे ही जा पाउंगा क्योकि मुझे तो नौ बजे ऑफिस पहुंच जाना होता है .. तुम थोड़ा जल्दी आ जाओ ..प्रेजी बोली नहीं इतनी जल्दी मैं घर में क्या बोलकर निकलुंगी … तो अंत:त ये हुआ कि चलो फिर कभी ऎसे मौके की तलाश की जायेगी आज जाने दें…..

लेकिन अब प्रेजी ने सोचा चलो मित्र को चकित करते हैं …. तो प्रेजी घर से किसी तरह बहाने बनाकर सुबह साढ़े आठ बजे निकल दीं…इधर मित्र चकित होने नहीं चकित करने के मूड में थे ….वो ये सोच कर थोड़ा रुक गये…चलो नौ बजे निकलते हैं ताकि प्रेजी के दर्शन हो जांये … दोनो एक दूसरे को चकित करने के चक्कर में एक दूसरे के दर्शन नहीं कर पाये….

दूसरी घटना उन्हीं मित्र के साथ कल हुई …. वह प्रेजी अब पजी हैं …यानि उनकी पत्नी जी हैं….

मेरे मित्र को कुछ कपड़े लेने थे … उन्होने मुझसे कहा कि यार आज शाम को ऑफिस के बाद चलो ..कपड़े ले लेते हैं …मैने उन्हें सलाह दी (और अपना पीछा छुड़ाना चाहा) कि यार अब तो कपड़े भाभी की पसंद के ही लिया करो …शाम को चले जाओ भाभी के साथ… वो बोले यार अब बच्चों के साथ उसको कहाँ इतनी फुरसत रहती है …चलो फिर भी तू कहता है तो एक बार बात करता हूँ….उन्होने फोन किया और अनुरोध किया (शादी के बाद पति सिर्फ अनुरोध ही कर सकता है) कि वो शाम को उनके ऑफिस के पास चले आये …वो ड्राइवर को गाड़ी ले के भेज देंगे …. तो पजी ने जबाब दिया कि घर में इतने सारे काम पड़े हैं और फिर इतने छोटे छोटे बच्चों के साथ मार्केट जा पाना संभव नहीं है … साथ ही ये नसीहत भी दे डाली कि अपने कपड़े भी खुद नहीं खरीद सकते.. अरे कुछ काम तो खुद कर लिया करो… फिर आदेश जैसा दिया कि आज शाम को जल्दी घर आ जाना ..मित्र का मूड तो ऑफ हो ही चुका था ..वो बोले ….नहीं आज जल्दी नहीं आ सकता.. ऑफिस में आज बहुत काम है…..और फोन रख दिया …..

लेकिन घटना यहाँ खतम नहीं हुई …फोन रखने के बाद मित्र ने सोचा कि चलो यार आज चले ही जाते हैं घर जल्दी …रास्ते से कपड़े भी ले लेंगे …और कर देंगे पजी को सरप्राईज वो भी तो देखे कि हम अपना काम खुद भी कर सकते हैं …और सारा कामधाम निपटा के 4 बजे ही ऑफिस से निकल गये (बांकी दिन 6.30 बजे तक निकलते थे) … धूप और गर्मी में पार्किंग में पहुंचे तो देखा गाड़ी तो थी ही नहीं … ड्राइवर को फोन किया तो वो बोला कि वो अभी गाड़ी ले के कहीं गया है … पूछ्ने पे कि कहाँ गया है ?…वो बोला ‘सरप्राईज’ है.. … गुस्सा तो बहुत आया होगा मित्र को ..इसी गुस्से में घर फोन किया गया पजी को पूछ्ने के लिये कहीं उसने तो ड्राइवर को कहीं नहीं भेज दिया …. तो पता चला कि पजी ने ड्राईवर को घर बुलाया था …तकि पजी गाड़ी में ऑफिस आ सकें और शाम को मित्र के लिये कपड़े खरीद सके….मित्र का गुस्सा और बढ़ गया ..और वो बोले अभी कहीं नहीं जाना है ..पत्नी बोलती ही रह गयी …पर मित्र ने फोन काट दिया….. और मुँह लटका के धूप में ऑटो का इंतजार करने लगे……घर जाने के लिये…..

तो ये था सरप्राईज का कमाल ….तो आप इस तरह से सरप्राईज करने कराने से बचियेगा…..

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घुघुती जी का ‘आदेश’ हुआ की आप कौवों को फरमान भेजिये कि वो उनके घर के आस पास जायें क्योकि वो पिछ्ले सात साल से कौवों को घुघुतिया नहीं खिला पा रही हैं. वैसे अब तो घुघुतिया अगले साल आयेगा लेकिन हमने सोचा कि चलो हम तो अपना काम कर ही दें . तो हम जुट गये फरमान की तैयारी करने में . इधर हम फरमान की तैयारी में व्यस्त थे और उधर कुछ घटनायें हो गयी .एक तो मुहल्ले में ‘कुत्तों का आतंक’ फैल गया और उस आतंक को दूर करने की कवायदें शुरु हो गयी . कुछ बोले कि ‘मुहल्ले में गंदगी’ है इसलिये शायद कुत्ते आये हों ( पर हमारा ‘कुत्ता ज्ञान’ कहता है कि गंदगी के कारण कुत्ते नहीं आते वरन कुत्तों के कारण गंदगी आती है ) कुछ ने कहा कि ‘मुहल्ले में किसी ने ऊंची दुकान खोली’ है जहर बेचने की ….शायद इसलिये कुत्ते… पर ये तो कोई बड़ी घटना नहीं है आजकल जगह जगह इस तरह की जहर बेचने वाली दुकानें खुली हैं कुछ खुले आम बेचते हैं कुछ अच्छी पैकेजिंग कर.. और दूसरी घटना ये कि हमारे ही राज्य के कुछ कौवे एक शादी में व्यस्त हो गये इस आशा में कि इतनी बड़ी शादी है तो कुछ ना कुछ जूठन तो मिल ही जायेगी और फिर कुछ दिन आराम से कटेंगे … काम नहीं करना पड़ेगा .. इस चक्कर में कौवों के कई गुट रात रात भर विवाह ‘जलसाघर’ के आगे डेरा डाले ‘प्रतीक्षा’ करते रहे कि शायद कोई डाल दे थोड़ी सी जूठन पर निराशा ही हाथ लगी. … बाद में खबर आयी की पूरी जूठन तो क्या उन्हें तो एक आद जूठन-बाईट भी नहीं मिली.

खैर ये तो वो कारण रहे जिनकी वजह से फरमान भेजने में देरी हुई . अब आप भी सुनिये ये फरमान …

मेरी प्रजा के कौवो ,

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वैसे तो आपको मालूम ही होगा कि हमारी संख्या निरंतर कम होते जा रही है . इसमें हमारा दोष नहीं है ये तो एक पर्यावरणीय समस्या है .लेकिन हमारा होना या ना होना उन लोगों को भी कहीं ना कहीं प्रभावित करता ही है जो हमारी इस घटती जनसंख्य़ा के लिये जिम्मेवार हैं . मनुष्य ने बड़ी तादाद में जंगल काटे हैं ऎसे में हमारी जनसंख़्या ही नही वरन अन्य पशु – पक्षियों की जनसंख्या में भी लगातार कमी हो रही है . प्राचीन काल से भारत देश में सभी पशु – पक्षियों को बड़े सम्मान की नजर से देखा जाता था. आपको पंचतंत्र के हमारे पूर्वज लघुपतनक कौवे की याद तो होगी ही .

अब आपको क्या बतायें . कुछ लोग हमें मूरख समझते हैं कहते हैं कि हम कोकिलों की संतानो को पालते हैं . लेकिन उन्हें शायद ये नहीं मालूम कि हमको तो पता रहता ही है कि ये कोयल की ही संतान है वही कोयल.. जो बहुत मीठा बोलती है. कोयल की मीठी बोली के कारण ही अधिकतर लोग कोयल को ज्यादा महत्व देते हैं लेकिन उन्हें क्या मालूम कि जो मीठा बोलता है उसका दिल भी मीठा हो कोई जरूरी तो नहीं . कोयल तो चार दिन की चांदनी है हम तो सदाबहार हैं. हम तो साफ दिल के हैं इसलिये सब कुछ जानने के वावजूद भी पाल लेते हैं उन बच्चों को और फिर बच्चे तो बच्चे होते हैं . हम मूरख नहीं वरन “ अनाथों के नाथ “ हैं.

वैसे पिछ्ले कुछ समय से हमें उस तरह का सम्मान नहीं दिया जाता जो पहले दिया जाता था. हम तो रामायण के काल में थे “कागभुसंडी के रूप में . उस समय तो भगवान कुछ भी देने को तैयार हो गये थे.

‘काकभुसुंडि मागु बर अति प्रसन्न मोहि जानि।
अनिमादिक सिधि अपर रिधि मोच्छ सकल सुख खानि’

( हे काकभुशुण्डि ! तू मुझे अत्यन्त प्रसन्न जानकर वर माँग. अणिमा आदि अष्ट सिद्धियाँ, दूसरी ऋद्धियाँ तथा सम्पूर्ण सुखों की खान मोक्ष )

पर हमने मांगा क्या …सिर्फ भक्ति ….

‘भगत कल्पतरु प्रनत हित कृपा सिंधु सुख धाम।
सोइ निज भगति मोहि प्रभु देहु दया करि राम ‘

( हे भक्तों के कल्पवृक्ष ! हे शरणागतके हितकारी ! हे कृपा सागर ! हे सुखधाम श्रीरामजी ! दया करके मुझे अपनी वही भक्ति दीजिये )

ये थी हमारे पूर्वजों की महानता ….और कृष्ण जी के तो हम सखा ही रहे हैं . उनसे तो खिलवाड़ चलता ही था…

‘ काग के भाग बड़े सजनी, हरि हाथ सों ले गयो माखन रोटी ‘

पुरानी बातें और थी.तब हम समाज का एक हिस्सा थे. हमें तो पहले बच्चों को मनाने के लिये भी बुलाया जाता था.

‘करिया कउंआ आजा रे,
बुधवा कउंआ आजा रे ।
जंगाय हे मुन्ना राजा रे,
ए पँवरा ला खाजा रे ॥’

( काले कौए आ जाओ,
विद्वान कौए आ जाओ
मुन्ना राजा नाराज है,
इस ग्रास को खा जाओ )

और मकर संक्रांति पर तो हमारी बहार थी. बागेश्वर ( उत्तराखंड में एक जगह ) में उतरैणी मेला लगता था. घर में तरह तरह के व्यंजन बनाये जाते थे. मीठे आटे से अलग-अलग आकृतियां जैसे घुघुतिया , शकरपारे (खजूरे) , डमरू , तलवार , मेंचुला , दाणिम का फूल आदि बनाकर घी/तेल में तल ली जाती थीं और फिर घुघुती की माला बनाई जाती थी जिसमें बीच में संतरे रहता था और उसके चारों और पूरी , बड़ा ( एक पहाड़ी पकवान) , और सारी आकृतियां लगाकर माला बना दी जाते थी. इसके पीछे तर्क ये है कि संतरा सूर्य का प्रतीक है और बाकी सारी चीजै बाँकी ग्रहों के प्रतीक . ये त्योहार सर्दी के समाप्त होने और गर्मी के आगमन का प्रतीक है . अगले दिन सारे बच्चे और बड़े भी हमें बुलाते हैं और कहते थे.

काले कौवा काले , घुघुती मौवा खाले।
ले कौवा पूरी , मुकु दिजा सुनै-की चूरी ।
ले कौवा बड़ा , मुकु दिजा सुनै-को घड़ा ।
ले कौवा तलवार , मुकु दिजा भॉल भॉल परिवार ।

( काले कौए आ जाओ , घुघुती की माला खा जाओ ,
ले जा कौवा पूड़ी ,मुझे दे जा सोने की चूड़ी
ले जा कौवा बड़ा ,मुझे दे जा सोने का घड़ा
ले जा कौवा तलवार ,मुझे दे जा अच्छा सा परिवार )

और जब कौवा नहीं दिखायी देता तो उसे प्रेम-मिश्रित डाँट भी मिलती थी.

‘ले कौवा मेचुलो , नि आले आज तो तेरा गालड़ थेचुलों’
( आ जा कौवा आजा यार , आज ना आया तो खायेगा मार)

इतनी प्यार से हमें बुलाया जाता था जैसे पंडित को जीमने के लिये बुला रहे हों तब हम आते थे बड़े ही आदर के साथ. आजकल तो लोग इतने व्यस्त हो गये हैं कि इन सभी रीति रिवाजों को बेकार मानने लगे हैं .

हमको तो बुद्धिमान भी खूब माना जाता था . बच्चो को ये कविता पढ़ाई जाती थी.

“तेज धूप से कौवा प्यासा , पानी की थी कहीं ना आशा”

ये कहानी तो मेरे को मेरे नाना ने सुनाई थी. गरमी का मौसम था ….. सभी नदियाँ, तालाब , कुँए सूख गये थे. पानी का नामोनिशान तक ना था. तेज धूप से मुझे बहुत प्यास लग गयी थी , पानी की तलाश में इधर-उधर उड़ता रहा . थक-हार कर एक पेड़ पर जा बैठा तो मुझे एक घड़ा दिखाई दिया . घड़े में पानी बहुत नीचे था और मेरी चोंच पानी तक नहीं पहुँच पा रही थी . मैं आसपास बिखरे पड़े कंकड़-पत्थर चोंच से ला-लाकर घड़े में डालने लगा बस क्या था ! पानी धीरे-धीरे घड़े के मुँह तक आ गया । मैंने पानी पीकर अपनी प्यास बुझायी और उड़ गया .

सुबह-सुबह घर की मुंडेर पर कौए का बोलना शुभ माना जाता है .ऎसा विश्वास है कि यदि कौआ बोले, तो उस दिन परदेश गये किसी अपने का घर आगमन होता है. इसीलिये पहले नायिकाऎं कहती थी.

‘ मोरी अटरिया पे कागा बोले जिया डोले मेरा कोई आ रहा है ’

‘ माई नि माई मुंडेर पे मेरे बोल रहा है कागा ‘

या फिर …..

‘पैजनी गढ़ाई चोंच सोन में मढ़ाइ दैहौं
कर पर लाई पर रुचि सुधिरहौं ।
कहे कवि तोष छिन अटक न लैहौं कवौ
कंचन कटोरे अटा खीर भरि धरिहौं ।
ए रे काग तेरे सगुन संजोग आजु
मेरे पति आवैं तो वचन ते न टरिहौ ।
करती करार तौन पहिले करौंगी सब
अपने पिया को फिरि पाछे अंक भरिहों । ‘

अब कोई सुन्दरी हमारी चोंच सोने मे मढ़ाने को तैयार हो सोने के कटोरे में खीर भर कर रख दे और पति के आने पर पति को छोड़ अपन को अपनी बाँहों में भरने को तैयार हो तो भला कौन नहीं आयेगा .

अमीर खुसरो के जमाने में भी कुछ ऎसा कहा जाता था .

परदेसी बालम धन अकेली , मेरा बिदेसी घर आवना.
बिर का दुख बहुत कठिन है , प्रीतम अब आ जावना.
इस पार जमुना उस पार गंगा , बीच चंदन का पेड़ ना.
इस पेड़ ऊपर कागा बोले , कागा का बचन सुहावना.

तो कौए के वचन को सुहावना बोला जाता था . अब कोई इतनी मान मनुहार करे तो हम क्यों ना आयें भला. आज तो कौए के बोलने को केवल ‘कोरी काँव काँव’ ही माना जाता है.

अब देखिये मैने आपके पक्ष की सारी बातें इस फरमान में रख दी क्योंकि मैं समझ सकता हूँ आपकी परेशानियां पर इस लोकतंत्रीय सत्ता में परेशानियां समझना एक बात है उनका समाधान ढूँढना दूसरी बात.

लेकिन फिर भी मेरा आप लोगों से निवेदन है कि आप इन बातों के बावजूद भी घुघुती जी के घर जायें और उनके दु:ख भरी पैरोडी की लाज रख लें.

आपका राजा — काकेश
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