आप कितना भी कमाने लगो आपकी इच्छाओं या कहें जरुरतों और जेब का अंतर बराबर ही रहता है.एक तरफ लगता है कि चीजें अब पहुंच में आ जायेंगी लेकिन नहीं आती दूसरी तरफ लगता कि हम किन चीजों के पीछे भाग रहे हैं और क्यों भाग रहे हैं? ऎसे विचार इसलिये मन मे आलोड़न विलोड़न करने लगते हैं जब देखता हूँ कि दुनिया में कितनी असमानता है. क्या ये असमानता हमेशा से थी ? क्या ये असमानता हमेशा रहेगी ? तो क्या पूंजीवाद सही में खराब है ? तो क्या साम्यवाद सही है?

चलिये दो घटनाओं से आपका परिचय करवाता हूँ.कल एक व्यक्ति से, जिनसे कभी कभी बात होती रहती है लेकिन जिनको मित्र की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता,बात हो रही थी.उन्होने बताया कि अभी हाल ही में उन्होने नया फ्लैट बुक करवाया है. वो अभी खुद के फ्लैट में ही रहते है और एक नया फ्लैट इनवैस्टमेंट के तौर पर लिया है. कीमत एक करोड़ से ऊपर की है. कितनी ये उन्होने नहीं बताया. वह सज्जन कहीं नौकरी भी नहीं करते. केवल बी.कॉम पास हैं.क्या करते हैं ये तो मेरे को नहीं मालूम लेकिन जब ऑफिस के लिये निकलता हूँ सुबह तो सोसायटी के लॉन में बैठे नजर आते हैं और शाम को लौटता हूँ तो अक्सर वहीं घूमते,गपियाते मिल जाते हैं. क्या करते हैं नहीं मालूम. कोई कहता है कि शेयर का काम करते हैं,कोई कहता है कि प्रॉपर्टी का काम करते हैं. तो फिर वो पैसा कहाँ से कमाते हैं? उनके पास दो दो गाड़ियाँ भी हैं…और उनका घर देखो (हाँलाकि मैं कभी गया नहीं पर पत्नी ने बताया) लगता है फाइव स्टार होटल है. तीन कमरों में प्लाज्मा टीवी, हॉल में होम थियेटर, तरह तरह की पेंटिंग्स. एक पेंटिंग की कीमत लाख से ऊपर है, ऎसा उनकी पत्नी ने मेरी पत्नी को बताया… और फिर एक करोड़ से ऊपर का फ्लैट भी बुक करा दिया.

आज सुबह अपनी मधुशाला वाली पोस्ट पूरी की तो थोड़ी निराशा सी थी मन में. उमर खैयाम की रुबाइयों में एक तरह का दर्द है जो जीवन को नश्वर बता कर अंदर तक झकखोर देता है. निराशा और बढ़ी जब इतनी मेहनत से लिखी पोस्ट पर कॉमेंट नहीं आये. सोचने लगा कि इतनी मेहनत ‘उमर’ पर करूँ या किसी और विषय़ पर. खैर वो अलग बात है लेकिन आज एक समाचार पढ़ने में आया. बिहार में ‘गया’ नामक स्थान इसलिये प्रसिद्ध है क्योकि यहां पितृ आत्माओं के लिये श्राद्ध किये जाते हैं. अभी चल रहे पितृ दिवस में यहाँ पांव रखने की भी जगह नहीं रहती. लोग आत्माओं की शाति के लिये पिंड दान करते हैं.इन पिंडों को पानी में बहाने या गाय को खिलाने का चलन है. लेकिन गया में बहुत से लोग ऎसे है जो इन पिंडो को उठा लेते हैं और इनको सुखाकर,पीसकर खाते हैं और अपनी उदर तृप्ति करते हैं.समाचार के अनुसार इन पिंडों से इन लोगों के 2-3 महीने का खाना चल जाता है.

कैसी विडम्बना है ..एक ओर तो हम मृत आत्माओं की उदरपूर्ति के लिये श्राद्ध कर रहे हैं और यहां जीवित आत्माऎं भोजन की तलाश में भटक रही हैं.

समाचार : दैनिक जागरण

पितृपक्ष मेले में पिंडदान के लिए आए लोगों की तलाश में लगी कई महिलाओं और बच्चों को देखा जा सकता है। ये वह लोग हैं जो अपने पेट की आग बुझाने के लिए दान किए गए पिंड ढूंढते फिरते हैं। पिंडों को लेकर अक्सर इनमें झगड़ा भी होता रहता है। गया में इन दिनों यह दृश्य आम है। प्रमुख पिंडवेदी स्थल विष्णुपद, अक्षयवट एवं सीताकुंड आदि जगहों पर कई महिलाएं और बच्चियां अर्पित पिंड बीनती रहती हैं पिंड जौ के आटे, चावल और तिल के मिश्रण से बनता है। इसे वैदिक मंत्रोच्चारण के बाद पूर्वजों की आत्माओं को समर्पित किया जाता है। विधान यह भी है कि पिंड को जल में प्रवाहित कर दिया जाए या गाय को खिला दिया जाए। हालांकि आम तौर पर ऐसा नहीं होता। यही वजह है कि धार्मिक विधानों को तोड़ गरीब, वेदी के आसपास पिंड बटोरने को जुटे रहते हैं। पिंड बटोरने वाले बताते हैं-वह इसे धूप में सुखाने के बाद कूट और चाल कर रोटी बनाते हैं। इससे उनका दो-तीन महीने तक काम चल जाता है। इस तरह कई परिवार पलते हैं। इन लोगों को पितृपक्ष का बेसब्री से इंतजार रहता है। गरीबी उन्मूलन की योजनाओं के बारे में ये लोग बहुत कुछ नहीं जानते, लेकिन इतना जरूर कहते हैं कि अगर उन्हें गेहूं-चावल मिलता तो पिंड चुनने की जरूरत ही नहीं पड़ती।

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