जुलाई 2007


पिछ्ली पोस्ट में आपको समकाल में छपे लेख के बारे में बताया था. बहुत से लोगों ने उसे पढ़ा या पढ़ने की कोशिश की. लेकिन शिकायत यह रही कि रिजोल्यूशन ठीक ना होने के कारण बहुत से लोग पढ़ नहीं पाये. इधर इस लेख के मूल लेखक संजय तिवारी जी ने मुझसे संपर्क किया और उन्होने इस लेख को मेरे को भेज दिया. तो प्रस्तुत है ये लेख आप सभी के लिये.इसके लिये संजय जी धन्यवाद के पात्र है. आशा है अब सब लोग पढ़ पायेंगे. एक भूल सुधार …यह पत्रिका दिल्ली से ही निकलती है.

ब्लाग की दुनिया

संजय तिवारी

सोमवार 21 अप्रैल 2003. समय रात के 10 बजकर 21 मिनट . इसी दिन और इसी समय सूचना संचार जगत में हिन्दी का पहला ब्लाग कम्प्यूटर पर अवतरित हुआ था. इसका नाम था 9.2.11 डॉट ब्लागस्पाट डॉट काम . इसे बनानेवाले आलोक कुमार ने पहली बार पोस्टिंग करते हुए लिखा है- “चलिए अब ब्लाग बना लिया तो कुछ लिखा जाए. वैसे ब्लाग की हिन्दी क्या होगी , पता नहीं.” इन शब्दों से शुरू हुआ हिन्दी ब्लागिंग का सफर चार साल बाद कई बाधाएं पार करते हुए लगातार आगे बढ़ रहा है. देश -विदेश में ऐसे 700 ब्लागर हैं जो हिन्दी में काम कर रहे हैं. कहानी-कविता और धर्म आध्यात्म से लेकर निवेश सलाह तक सबकुछ धीरे -धीरे हिन्दी ब्लागिंग के दायरे में आता जा रहा है. भाषा की सबसे बड़ी समस्या अभी भी पूरी तरह से हल नहीं हो सकी है लेकिन माइक्रोसाफ्ट और सर्च इंजन गूगल के अपने स्तर पर किये जा रहे प्रयासों का परिणाम है कि आज इंटरनेट पर हिन्दी में काम करना मुश्किल नहीं है . हिन्दी का पहला ब्लाग बनाने वाले आलोक कुमार अब भाषा विकास के काम में लग गये हैं और अब एक पूरी जमात खड़ी हो गयी है जो अपने-अपने स्तर से ब्लागिंग की दुनिया में हिन्दी को स्थापित कर रहे हैं . लेकिन सवाल यह है कि क्या ब्लाग उस रास्ते पर है जिसपर उसे होना चाहिए ?

यह बात सही है कि अब ब्लाग हिन्दी के स्पर्श से चिट्ठा बन गया है. और हिन्दी में ब्लाग लिखनेवाले चिट्ठाकार के नाम से सुशोभित किये जाते हैं. लेकिन चिट्ठाकारिता की इस नयी शब्दावली ने अभी तक वह कमाल नहीं किया है जिसकी उम्मीद उससे की जा सकती है. हिन्दी फान्ट के आविष्कारकों में से एक मैथिली गुप्त दिल्ली में रहते हैं और फिलहाल वे हिन्दी ब्लागरों की संख्या बढ़ाने के अभियान पर काम कर रहे हैं . उनका कहना है कि “एक लिहाज से यह दुनिया अभी बहुत छोटी है. औसत 100 नयी रचनाएं प्रतिदिन हिन्दी में कम्प्यूटर पर उभरते हैं . और लगभग 300 लोग ही हैं जिन्हें हम सक्रिय चिट्ठाकार कह सकते हैं. इस लिहाज से अभी तुरंत आवश्यकता यह है कि ज्यादा से ज्यादा लोग इस माध्यम को जानें और इसका उपयोग करें .” नये चिट्ठाकारों के सामने सबसे बड़ी समस्या आज भी तकनीकि की है. हालांकि वीकिपीडिया, केफे हिन्दी , ई-पंडित, जैसी कुछ साईट हैं जहां हिन्दी में काम करने के लिए आवश्यक जानकारी और सहयोग मिल जाता है फिर भी तकनीकि की जटिलता , हिन्दी की-बोर्ड और शब्दावली का नयापन नये हिन्दी ब्लागरों की राह में सबसे बड़ी बाधा है.

इंटरनेट की दुनिया में ब्लाग की शुरूआत हुई अगस्त 1999 में जब सैन फ्रांसिस्को में पीरा लैब्स के तीन दोस्तों ने इस नयी विधा का परीक्षण शुरू किया जो लेखक को पाठक से जोड़ता था . यानी लिखे हुए को आप अपनी सहमति-असहमति से अवगत करा सकते थे. अपना स्वतंत्र पृष्ठ बना सकते थे और वेब बनाने की झंझटो में पड़े बिना आप अपना इंटरनेट का पन्ना संचालित कर सकते थे . थोड़े दिनों तक यह कंपनी अपने सीमित संसाधनों से लोगों को इंटररेक्टिव वेब की सुविधा मुहैया कराती रही और इसका दायरा अमरीका के बाहर नहीं था. लेकिन 2002 में अचानक ही इस विधि को नया आयाम मिल गया. इंटरनेट जगत के जाने पहचाने नाम गूगल ने ब्लागर कंपनी को खरीदने का प्रस्ताव कर दिया. भला इन तीनों को क्या ऐतराज हो सकता था . इसके बाद ब्लागर गूगल का एक हिस्सा हो गया और दुनियाभर में इसकी सेवाओं के साथ जोड़ दिया गया. ब्लागर आज दुनिया की 36 भाषाओं में लिखने-पढ़ने की सुविधा देता है. इसके लिए गूगल में एक अलग विभाग बना दिया गया है जो इन सेवाओं को नियमित अपडेट रखता है .

ब्लागर के अलावा वर्डप्रेस डॉट काम दूसरी ऐसी बड़ी सर्विस प्रोवाईडर है जो हिन्दी में ब्लाग बनाने की सुविधा प्रदान करता है. वर्डप्रेस डाटकॉम नये आगन्तुक को 50 एमबी की जगह मुहैया कराता है और अगर आपको इससे अधिक जगह की जरूरत है तो आप वर्डप्रेस से सस्ते में खरीद सकते हैं. वैसे भारत में सुलेखा डॉट काम भी ब्लाग की सुविधा मुहैया कराता है लेकिन वह हिन्दी के लिहाज से उपयुक्त स्थान नहीं है . अंग्रेजी ब्लागरों के लिए सुलेखा उत्तम स्थान है. कई सारी डॉट-काम कंपनियां अपनी साईट पर ब्लाग की सुविधा दे रही हैं जहां आप मुफ्त में अपना वेब पेज बना सकते हैं वैसे ही जैसे आप अपना ई -मेल एकाउण्ट बनाते और चलाते हैं. खुद माइक्रोसाफ्ट कारपोरेशन ने माई-स्पेसेश के नाम से अपनी वेबसाईट पर ब्लाग की सुविधा दी है जो हाटमेल के ई -मेल अकाउण्ट से चालू किया जा सकता है. लेकिन दो समस्याएं हैं. पहली भाषा और की बोर्ड की और दूसरी पाठकों की .

इस समस्या का समाधान भी कुछ हिन्दी प्रेमियों ने ही खोज निकाला. कुवैत में निजी व्यवसाय करनेवाले जीतेन्द्र चौधरी और उनके कुछ भारतीय मित्रों ने मिलकर एक ऐसी वेबसाईट की कल्पना की जो हिन्दी में लिखे जा रहे चिट्ठों को एक जगह पर प्रदर्शित करे . इस वेबसाईट का नाम रखा गया- नारद. इंटरनेट की शब्दावली में इस तरह की वेबसाईट को फीड-एग्रीगेटर कहा जाता है जिसका मतलब है कि अगर आप नारद के सदस्य हैं तो आप अपने चिट्ठे पर जो कुछ लिखते हैं थोड़ी ही देर में वह उस साईट पर दिखने लगता है. उस एग्रीगेटर पर एक लिंक होता है जिसपर क्लिक करने से आप सीधे उस ब्लाग पर पहुंच जाते हैं जिसका लिंक नारद पर आपने देखा था . इस विधि ने चिट्ठाकारों को बहुत मदद की क्योंकि अब किसी नये पाठक को एक वेबसाईट का पता बताते हैं और वह चिट्ठासंसार का चक्कर लगा आता है. नारद की तरह कई और उन्नत फीड एग्रीगेटर अब वेबसाईट पर उपलब्ध हैं . मसलन हिन्दीं में पहला चिट्ठा लिखनेवाले आलोक कुमार ने अपने दो मित्रों के साथ मिलकर एक नये फीड एग्रीगेटर की शुरूआत की है जिसका नाम है – चिट्ठाजगत . इसके अलावा अलग-अलग प्रकार के ब्लाग्स के लिए हिन्दी ब्लाग्स डॉट काम है जो प्रतीक पाण्डेय चलाते हैं. अमेरिका में रहनेवाले देवाशीष हिन्दी ब्लाग्स डॉट आर्ग के कर्ता -धर्ता हैं. एक और फीड-एग्रीगेटर ब्लागवाणी आने की तैयारी में है जिसके विकास में मैथिली गुप्त लगे हुए हैं .

वैसे इंटरेक्टिव वेबसाईट आज सहज-सुलभ है. इसके पीछे काम करनेवाली तकनीकि कोई दुर्लभ चीज नहीं है. डाटकाम कंपनियों के लिए भी यह तकनीकि काम की है क्योंकि इससे पाठकों का सीधा रिश्ता सर्विस आपरेटर के साथ जुड़ता है . कई ऐसी सोशल नेटवर्किंग साईट धड़ल्ले से चल रही हैं जो आपको इंटरनेट पर आपको एक प्लेटफार्म देती हैं. रूपर्ट मर्डोक की माई स्पेश 16 अरब डॉलर बाजार मूल्य की कंपनी बन गयी है क्योंकि इससे 8 करोड़ लोग जुड़े हुए हैं. गूगल की सोशल नेवर्किंग साईट आर्कुट भी खासी चर्चा में रहता है . लेकिन अभी यहां भाषा बड़ी बाधा है. जहां हिन्दीवालों की जमात से आपकी मुलाकात हो सकती है वह ब्लागर और वर्डप्रेस ही हैं. मतलब साफ है कि हिन्दी में ब्लाग की यह नयी दुनिया तेजी से लोगों को आकर्षित कर रही है . रोज नये-नये ब्लाग अस्तित्व में आ रहे हैं. और जैसा हर काम के शुरूआत में होता है यहां भी कुछ लोग हिन्दी साहित्यवाली राजनीति , विचारधारा की गाली-गलौज आदि करते रहते हैं. हिन्दी के एक ब्लागर अरुण कहते हैं ” यह अभी शैशवकाल है. धीरे-धीरे इसमें बदलाव आयेगा.” मैथिली गुप्त भी अनुमान लगाते हैं कि “जैसे ही यह संख्या तीन-चार हजार पार करेगी तो उससे एक प्रतिस्पर्धा का निर्माण हो जाएगा. इसके बाद ब्लागजगत में सुधार अपने -आप दिखने लगेंगे.”

बड़ा सवाल यह है कि क्या ब्लाग वैकल्पिक मीडिया बन सकता है? जवाब है हां. यहां आप अपने काम को लेकर स्वतंत्र हैं . और इसके लिए आपको कुछ भी पूंजी-निवेश नहीं चाहिए. थोड़ा सा तकनीकि ज्ञान और मन में लिखने-पढ़ने की लगन . जब यह दौर शुरू होगा, सही मायने में इसके बाद ही हिन्दी ब्लाग जगत का असली लाभ लोगों को मिलेगा. फिलहाल तो यह प्रयोगों के दौर में है , जैसे-जैसे इंटरनेट का विस्तार होगा, और नये लोग जुड़ते जाएंगे, इस विधा में निखार आयेगा .

बाक्स

कैसे बनाएं अपना हिन्दी ब्लाग

सबसे पहले अगर आपके पास जी-मेल का एकाउण्ट है तो आप सीधे ब्लागर से जुड़ सकते हैं. आपको ब्लागर का एक रजिस्ट्रेशन करना होता है जहां आपका ई -मेल ही आपकी कुंजी है.

अगर आपके पास जी-मेल नहीं है तो आप वर्ड-प्रेस पर हिन्दी में अपना ब्लाग बना सकते हैं.

अब आपको अपने कम्प्यूटर पर विन्डोज एक्सपी में रीजनल लैग्वैंज और सेटिंग्स में हिन्दी को शुरू करना चाहिए जिसके बाद आप इंटरनेट पर हिन्दी में काम कर सकते हैं.

ध्यान रहे आपको नये तरह के की-बोर्ड पर काम करना होगा जिसे फ्योनिटिक की-बोर्ड कहते हैं. इसका आविष्कार भारत सरकार की सी -डैक नामक कंपनी ने किया है और हिन्दी लिखने के लिए यही की-बोर्ड पूरी दुनिया में प्रयुक्त हो रहा है क्योंकि माइक्रोसाफ्ट ने भी यही की -बोर्ड स्वीकार किया है.

अगर आपके पास अपना कम्प्यूटर नहीं है और ब्लाग लिखना चाहते हैं तो आप ब्लागर के साथ जुड़िये. यह आपको रोमन लिपी में लिखने की सुविधा देता है और अपनेआप उसे हिन्दी में बदल देता है .

किसी भी तरह की मदद के लिए हिन्दी वीकिपीडिया, अक्षरग्राम, ई-पंडित, देवनागरी, हिन्दी कैफे आदि के वेबपेजों का अवलोकन किया जा सकता है.

संजय तिवारी
www.visfot.com

संजय जी को पुन: धन्यवाद.

आजकल चिट्टाकारी की चर्चा प्रिंट मीडिया में जोरों पर है. कुछ दिनों पहले हिन्दी की प्रतिष्ठित पत्रिका कादम्बिनी की आवरण कथा भी हिन्दी चिट्ठाकारी पर थी. जिसमें अविनाश जी ने भी अपना योगदान दिया था. अविनाश जी कथादेश में हिन्दी चिट्ठाकारी पर नियमित लिखते रहे हैं. पिछ्ले दिनों मुम्बई से निकलने वाली पत्रिका समकाल में भी  हिन्दी ब्लॉगिंग पर एक लेख छ्पा था. जिसे लिखा था विस्फोट चिट्ठा चलाने वाले संजय तिवारी ने. इसमें जीतू जी , अरुण जी , मैथिली जी ,आलोक जी,प्रतीक पांडे के नाम भी शामिल हैं.

आप भी पढ़ें. (बड़ा करने के लिये चटका लगायें).बहुत से लोगों ने शिकायत की है कि वो इसे नहीं पढ़ पा रहे हैं इसलिये यह लेख यहां पर डाल दिया गया है.

blog

एक मिठाई खाने वाली खबर ये है कि हिन्दी चिट्ठाजगत में व्यंग्य के सुपरस्टार और हमारे सह ब्लॉगर आलोक पुराणिक की पुस्तक का आज विमोचन हुआ. आप सोच रहे होंगे कि पक्का कोई “प्रपंच तंत्र” टाईप व्यंग्य-पुस्तक होगी. यही सोच रहे हैं ना ..आप सोचिये ..सोचने में क्या है ..हम भी कुछ दिनों पहले राष्ट्रपति बनने की सोच ही रहे थे ना.. जी नहीं यह कोई व्यंग्य पुस्तक नहीं है… यह पुस्तक है आर्थिक-पत्रकारिता पर. 

लीजिये पेश है एक रिपोर्ट –एक्सक्लूसिवली फॉर हिन्दी चिट्ठाजगत…

kitab -vimochan

पुस्तक विमोचन

मैथिलीशरण गुप्त बजट की बहस कविता में करते थे

23 जुलाई, 2007 सोमवार को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आलोक पुराणिक की पुस्तक-आर्थिक पत्रकारिता का विमोचन हुआ, इसमें तमाम रोचक जानकारियों के साथ यह तथ्य भी प्रकाश में आया कि प्रख्यात कवि मैथिलीशरण गुप्त संसद में बजट की बहस में अपना पक्ष कविता के जरिये ही रखते थे। प्रभात प्रकाशन दिल्ली द्वारा प्रकाशित यह किताब आजादी के बाद हिंदी की आर्थिक पत्रकारिता को देखने –परखने का प्रयास करती है। आजादी के बाद के करीब साठ सालों की यात्रा में बहुत कुछ बदला है, पर पर बहुत कुछ ऐसा भी है, जो नहीं बदला है। किताब यह रेखांकित करने की कोशिश करती है कि आजादी के बाद के वर्षों में आर्थिक पत्रकारिता की मुख्य प्रवृत्तियां क्या रही हैं। आजादी के ठीक पहले हिंदी अखबारों में उद्योगों, कृषि मंडियों और बाजारों की रिपोर्टें, सर्राफा बाजार की रिपोर्टों होती थीं। इसके अलावा भारत-ब्रिटिश आर्थिक संबंधों पर लेख भी हिंदी अखबारों में दिखायी पड़ते थे। खाद्यान्न से जुड़े मसलों को खासा महत्व दिया जाता था। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक पर समाचार लेख छापे जाते थे। आजादी के बाद के एक दशक में परिदश्य कुछ बदला।

1947 से 1956 की अवधि में हिदी की आर्थिक पत्रकारिता की व्याख्यात्मक भूमिका सामने आयी। अर्थव्यवस्था से जुड़े नये –नये कानून बन रहे थे। नये नियम आ रहे थे, उनकी व्याख्या करने का काम भी अखबार कर रहे थे। बजट कवरेज में आम आदमी से जुड़े आइटमों की चिंता लगातार की जाती थी। खाद्यान्न से जुड़े मसलों पर अखबार बहुत संवेदनशील थे। योजना से जुड़े मसलों पर कौतूहल का भाव तो था ही, साथ ही इसका विश्लेषण भी लगातार चल रहा था। समाजवाद, निजी उपक्रम बनाम सार्वजनिक उपक्रम जैसी बहसों की शुरुआत इस दशक में हुई। 1

इस दौर की हिंदी पत्रकारिता में ठेठ हिंदी के ठाठ भी देखने में आते थे। उदाहरण के लिए -हिंदुस्तान 7 मार्च, 1956 पहला पेज दो कालम की खबर है, जिसमें प्रख्यात कवि मैथिलीशरण गुप्त ने कवितामय अंदाज में बजट से जुड़े सवाल पूछे हैं-

आह कराह न उठने दे जो शल्य वैद्य है वही समर्थराष्ट्रकवि की दृष्टि में बजट- हमारे संवाददाता द्वारा नई दिल्ली 6 मार्च, राज्य सभा में साधारण बजट पर चर्चा में भाग लेते हुए राष्ट्रकवि श्री मैथिलीशरण गुप्त ने निम्नलिखित कविता पढ़ी-

धन्यवाद हे धन मंत्री को करें चाय सुख से प्रस्थान,

हम सब पानी ही पी लेंगे, किंतु खान पहले फिर पान 

मिटे मद्य कर लोभ आपका अधिक आय का वह अभिशाप ,

दे देकर मद मोह स्वयं ही फिर प्रबोध देते हैं आप।

कर लेते हैं आप , आपके गण लेते हैं धन युत मान,

थाने क्या निज न्यायालय ही जाकर देखें दया निधान।

खोलें एक विभाग आप तो यह धर्षण हो जाये ध्वस्त,

जांच करे अधिकारी वर्ग की गुप्त भाव से वह विश्वस्त।

पहले ही था कठिन डाक से ग्रंथों द्वारा ज्ञान प्रसार,

पंजीकरण शुल्क बढ़ाकर अब रोक न दें विद्या का द्वार।

किन्तु नहीं पोथी की विद्या पर कर गत धन सी अनुदार,

साधु, साधु, श्रुति पंरपरा का आप कर रहे हैं उद्धार।

सुनते थे उन्नत देशों में कुछ जन नंगे रहते हैं,

स्वस्थ तथा स्वाभाविक जीवन वे इसको ही कहते हैं।

नया वस्त्र कर देता है यदि आज वही संकेत हमें,

तो हम कृतज्ञता पूर्वक ही उसे किसी विधि सहते हैं।

मक्खन लीज छाछ छोड़िए देश भक्ति यह सह लेगी,

पारण बिना किन्तु जनता क्या व्रत करके ही रह लेगी।

यह यथार्थ है यत्न आपके हैं हम लोगों के ही अर्थ,

आह कराह न उठने दे, जो शल्य वैद्य है वही समर्थ।

लोगों की चिंता थी जाने जीवन पर भी कर न लगे,

मर कर भी कर जी कर भी कर, डर कर कोई कहां भगे।

एक जन्म कर ही ऐसा है, जिस पर कुछ कुछ प्यार पगे,

और नहीं तो जन संख्या ही संभले, संयम भाव जगे।

कवि की कविता का जवाब भी कविता में मिला है, इसे भी हिंदुस्तान ने अपनी रिपोर्ट में दर्ज किया है।

हिंदुस्तान 9 मार्च, 1956 पहले पेज पर सिंगल कालम खबर

वित्तमंत्री का नया तराना

हमारे विशेष संवाददाता द्वारा

नई दिल्ली-राज्य सभा में साधारण बजट पर हुई बहस का उत्तर देते हुए वित्त मंत्री श्री चिंतामन देशमुख ने राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के कवितामय भाषण का कविता में ही जवाब दिया, जो इस प्रकार है-

भारत भू के कायाकल्प का

आज सजा है पावन याग

स्नेह भरे कर लगा कमर को

बांध पटसे ले कवि भाग

सकल निगम और शिशु नर नारी

स्व-स्व पदोचित करके त्याग

चलें जुड़ाकर कर में कर को

दृढ़ता पग में नयनों जाग

यही पारणा यही धारणा

यही साधना कवि मत भाग

नया तराणा गूंज उठावो

नया देश का गावो राग

कुल मिलाकर हिंदी का आर्थिक पत्रकारिता ने यथासंभव खुद को आम आदमी के मसलों से जोड़कर रखा है। बैंकों के राष्ट्रीयकरण, बीमा के राष्ट्रीयकरण से जुड़े मसलों पर हिंदी अखबारों में जमकर बहस चली। दिनमान ने आर्थिक पत्रकारिता के नये आयाम पेश किये। खास तौर पर अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक मसलों पर दिनमान ने बेहतरीन कवरेज दी। राष्ट्रीय सहारा के विशिष्ट परिशिष्ट हस्तक्षेप ने आर्थिक मसलों पर विशिष्ट विश्लेषण पेश करके अपने समय में महत्वपूर्ण तरीके से हस्तक्षेप किया।

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वर्तमान स्थितियों में आर्थिक पत्रकारिता नयी चुनौतियों का सामना कर रही है। मुचुअल फंड, कामोडिटी एक्सचेंज, शेयर बाजार की कवरेज को बेहतर कैसे किया जाये, इस पर शोध-विश्लेषण किये जाने की आवश्यकता है।

इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता, भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष जी.एन.रे, और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति और वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र मौजूद थे।

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किताब कैसे खरीदें इस बारे में आप पुराणिक जी से संपर्क करेंगे. कुछ दिनों में इस पुस्तक की एक समीक्षा भी प्रस्तुत करने का प्रयास किया जायेगा.

कल प्रियंकर जी के चिट्ठे पर एक मासूम सा सवाल उठा “ये त्रिलोचन कौन है?” जिसका उत्तर अपने संस्मरणों के साथ पहलू में दिया गया. फिर बोधिसत्व जी ने थोड़ा जीवन परिचय देते हुए दो कविताय़ें भी छाप दी. उसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए पेश हैं त्रिलोचन की कुछ कविताऎं.

कुछ बातें जो मैं जानता हूँ त्रिलोचन के बारे में.

नागार्जुन, शमशेर और त्रिलोचन की त्रयी आधुनिक हिंदी कविता का आधारस्तंभ मानी जाती है. इस त्रयी के त्रिलोचन हरिद्वार के ज्वालापुर इलाके में लोहामंडी की एक तंग गली के मकान में अपनी बीमारी से जूझ रहे हैं. त्रिलोचन भारतीय सॉनेट के अहम हस्ताक्षर रहे हैं.उन्होने सॉनेट को भारतीय परिवेश दिया .उन्होने 500 से ज्यादा सॉनेट लिखे हैं. सॉनेट चौदह लाइन की कविता होती है जिसे शेक्सपियर ने अपनी रचनाओं में बखूबी प्रयोग किया.

त्रिलोचन के कुछ सॉनेट

जनपद का कवि

उस जनपद का कवि हूँ जो भूखा दूखा है,
नंगा है, अनजान है, कला–नहीं जानता
कैसी होती है क्या है, वह नहीं मानता
कविता कुछ भी दे सकती है। कब सूखा है
उसके जीवन का सोता, इतिहास ही बता
सकता है। वह उदासीन बिलकुल अपने से,
अपने समाज से है; दुनिया को सपने से
अलग नहीं मानता, उसे कुछ भी नहीं पता
दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँची; अब समाज में
वे विचार रह गये नही हैं जिन को ढोता
चला जा रहा है वह, अपने आँसू बोता
विफल मनोरथ होने पर अथवा अकाज में।
धरम कमाता है वह तुलसीकृत रामायण
सुन पढ़ कर, जपता है नारायण नारायण।

भीख मांगते उसी त्रिलोचन को देखा कल

भीख मांगते उसी त्रिलोचन को देखा कल
जिस को समझे था है तो है यह फ़ौलादी
ठेस-सी लगी मुझे, क्योंकि यह मन था आदी
नहीं; झेल जाता श्रद्धा की चोट अचंचल,
नहीं संभाल सका अपने को । जाकर पूछा
‘भिक्षा से क्या मिलता है। ‘जीवन।’ ‘क्या इसको
अच्छा आप समझते हैं ।’ ‘दुनिया में जिसको
अच्छा नहीं समझते हैं करते हैं, छूछा
पेट काम तो नहीं करेगा ।’ ‘मुझे आप से
ऎसी आशा न थी ।’ ‘आप ही कहें, क्या करूं,
खाली पेट भरूं, कुछ काम करूं कि चुप मरूं,
क्या अच्छा है ।’ जीवन जीवन है प्रताप से,
स्वाभिमान ज्योतिष्क लोचनों में उतरा था,
यह मनुष्य था, इतने पर भी नहीं मरा था ।

कुछ अन्य कवितायें.

आत्मालोचन

शब्द
मालूम है
व्यर्थ नहीं जाते हैं

पहले मैं सोचता था
उत्तर यदि नहीं मिले
तो फिर क्या लिखा जाए
किन्तु मेरे अन्तर निवासी ने मुझसे कहा-
लिखा कर
तेरा आत्मविश्लेषण क्या जाने कभी तुझे
एक साथ सत्य शिव सुन्दर को दिखा जाए

अब मैं लिखा करता हूँ
अपने अन्तर की अनुभूति बिना रँगे चुने
कागज पर बस उतार देता हूँ ।

आछी के फूल

मग्घू चुपचाप सगरा के तीर
बैठा था बैलों की सानी पानी कर
चुका था मैंने बैठा देखकर
पूछा,बैठे हो, काम कौन करेगा.
मग्घू ने कहा, काम कर चुका हूं
नहीं तो यहां बैठता कैसे,
मग्घू ने मुझसे कहा,
लंबी लंबी सांस लो,
सांस ले ले कर मैंने कहा,सांस भी
ले ली,
बात क्या है,
आछी में फूल आ रहे हैं,मग्घू ने कहा,अब
ध्यान दो,सांस लो,
कैसी मंहक है.
मग्घू से मैंने कहा,बड़ी प्यारी मंहक है
मग्घू ने पूछा ,पेड़ मैं दिखा दूंगा,फूल भी
दिखा दूंगा.आछी के पेड़ पर जच्छ रहा करते हैं
जो इसके पास रात होने पर जाता है,उसको
लग जाते हैं,सताते हैं,वह किसी काम का
नहीं रहता.
इसीलिये इससे बचने के लिये हमलोग
इससे दूर दूर रहते हैं

पीपल

मिट्टी की ओदाई ने
पीपल के पात की हरीतिमा को
पूरी तरह से सोख लिया था
मूल रूप में नकशा
पात का,बाकी था,छोटी बड़ी
नसें,
वृंत्त की पकड़ लगाव दिखा रही थी
पात का मानचित्र फैला था
दाईं तर्जनी के नखपृष्ठ की
चोट दे दे कर मैंने पात को परिमार्जित कर दिया
पीपल के पात में
आदिम रूप अब न था
मूल रूप रक्षित था
मूल को विकास देनेवाले हाथ
आंखों से ओझल थे
पात का कंकाल भई
मनोरम था,उसका फैलाव
क्रीड़ा-स्थल था समीरण का
जो मंदगामी था
पात के प्रसार को
कोमल कोमल परस से छूता हुआ.

हिन्दी चिट्ठाजगत की दुनिया आजकल शोधमय भी है और हिटास के प्रति जागरूक भी.कोई हिट होना सिखा रहा है तो कोई हिट करना.हिट पर आधारित सभी चीजें हिट हैं.हिट की हीट का ये असर है कि लोग हिट की चाह में लेखन कर रहे हैं.भले ही आप कहें कि हिट के लिये न लिखो खुद के लिये लिखो लेकिन इसका परोक्ष लाभ भी है कि हिन्दी में ‘कुछ’ लिखा जा रहा है. सारा लिखा स्तरीय ना भी हो तो कूड़ा भी नहीं है.

विषयों की विविधता भी बढ़ी है. विविधता चुनाव का अवसर देती है और बने बनाये परिवार या गुट से अलग होने का अवसर भी. वो दिन धीरे धीरे खतम हो रहे हैं जब आपको किसी भी लेख को पढ़कर ना चाहते हुए भी “अच्छा है अच्छा है” कहना पड़ता था. अभी आप “पीठ खुजाने” के बोरिंग काम से ऊपर उठकर विमर्श के लिये तैयार हो पाते है या हो पायेंगे. टिप्पणीयों में विमर्श हो या लेखों में विमर्श किसी भी तरह का काम हिन्दी के लिये अच्छा ही है. हाल में हुए विवादों ने भले ही किसी के लिये व्यक्तिगत रूप से भला किया हो या ना हो हिन्दी और हिन्दी चिट्ठाजगत का जरूर भला किया है.लोग अपने विचार खुलकर रखने लगे है. चाहे उसकी परिणति भड़ास के रूप में हो या परिवर्तित पंगेबाज के रूप में.

ये परिवर्तन मैने भी खुद में भी महसूस किया है.मेरा भी हिन्दा चिट्ठाजगत से पारिवारिक मोह भंग हुआ है और मेरी अन्य विषयों के प्रति सोच विस्तृत हुई है. पहले मैं सोचा करता था कि शायद में किसी चिट्ठाकार से ना मिलूं या उससे बातें ना करूँ ..गुमनाम रहकर ही लिखते रहूँ ऎसी सोच थी..यह मेरे अन्दर के भय के कारण था या मेरे अंतर्मुखी व्यक्तित्व के कारण ..नहीं मालूम ..पर अब वो सोच नहीं रही.. प्रमोद जी ने मेरे किसी लेख पर अपनी टिप्पणी में कहा था कि “डरो मत अब बड़े हो गये हो”…मुझे लगता है कि मैं सचमुच बड़ा हो गया हूँ..ये अहसास मुझे दूसरों को समझने के लिये उकसाता है.. फालतू की बातों में उलझ कर समय व्यर्थ ना करूं ऎसी सोच देता है.. इसलिये मैं इसे चिट्ठाजगत की उपलब्धि मानता हूँ …कम से कम अपने लिये…

नये फीड संयोजको का आना शुभ संकेत है आने वाले समय इनकी जरूरत और भी महसूस की जायेगी..इनका स्वरूप भी बदलेगा और इनसे होने वाली अपेक्षाऎं भी ..

आशा करें हम हिन्दी का रोना रोने वाले लोग हिन्दी के नाम पर खुश भी हो सकेंगे..

रविवार 8 जुलाई को  अंग्रेजी के प्रमुख समाचार पत्र टाइम्स ऑफ इंडिया में एक लेख छ्पा था ” Blogging straight from the heartland” . हाँलाकि मैं इस समाचार पत्र को पढ़ता हूँ पर मेरी नजर इस लेख पर नहीं पड़ी.शाम को श्रीश जी ने बातचीत के दौरान इस लेख के बारे में बताया. तुरंत खोज कर पढ़ा ..लेख पढ़ कर लगा कहीं कुछ अधूरा सा है .. हिन्दी चिट्ठाकारी [पल्लवी जी,जिन्होने ये लेख लिखा था, ने कहा है कि ये लेख हिन्दी चिट्ठाकारी पर नहीं वरन हिन्दी और अंग्रेजी चिट्ठाकारी दोनों पर था] पर लेख और उल्लेख केवल कुछ ही चिट्ठों का!! बात कुछ हजम नहीं हुई ..श्रीश जी से इस बाबत बात हुई हाँलाकि नाम छपने से श्रीश जी खुश तो थे  पर थोड़ा निराश लगे कि इसमें नारद, सर्वज्ञ आदि का नाम नहीं आया. उनका कहना था कि उन्होने इस का उल्लेख तो लेखिका से किया था पर ना जाने छ्पा क्यों नहीं. 

नारद,हिन्दी ब्लॉग्स डॉट कॉम और सर्वज्ञ का हिन्दी चिट्ठाजगत में एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है…. और हिन्दी चिट्ठाजगत पर  लेख बिना इनके अधूरा सा लगता है.. इसके अलावा और भी कई महत्वपूर्ण स्तंभ (चिट्ठाकार) हैं हिन्दी चिट्ठाजगत में जिनके बारे में इस लेख में कोई जिक्र नहीं था.

वैसे बता दूँ कि इस लेख में किस किस का उल्लेख है.इसमें उल्लेख है यमुनानगर के श्रीश जी का, रतलाम के रवि जी का, जालन्धर के गोपाल अग्रवाल का, नागपुर के संतोष मिश्रा का, कोल्हापुर के नवीन तिवारी का. [मैने रवि जी और श्रीश जी के अलावा बांकी महानुभावों का चिट्ठा नहीं देखा है.यदि आपको मालूम हो तो टिप्पणी द्वारा बतायें ताकि लिंक दिया जा सके..पल्लवी जी ने अपने ई-पत्र में बताया है कि बांकी के चिट्ठाकार हिन्दी के नहीं वरन अंग्रेजी के हैं]. लेख में छ्पी रवि जी की फोटो बहुत अच्छी थी वो क्या कहते ना झक्कास. वैसे रवि जी ने इसका श्रेय अपनी पत्नी रेखा जी को दिया है. अब उनकी अच्छी फोटो में रेखा जी का हाथ कैसे है ये तो नहीं मालूम पर हाँ यदि कभी हमारी कोई खराब फोटो (जाहिर है खराब ही होगी) छपे तो (वैसे संभावना कम ही है) हम भी कहेंगे कि इसमें हमारी पत्नी का ना सिर्फ हाथ है वरन और भी बहुत कुछ है..आखिर उन्होने ही तो खिला पिला के इतना मोटा किया है कि अब तो आइने में भी पूरा मुँह नहीं समाता 🙂 खैर ये तो विषयातंर हो रहा है. लेख पर आते हैं.

पूरे लेख का चित्र देवाशीष जी के सौजन्य से यहां मौजूद है.

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लेख पढ़ने के बाद मैने उसी समय लेख की लेखिका पल्लवी जी को ई-पत्र लिखा और धन्यवाद सहित उन्हे सुझाया कि कुछ और प्रमुख हिन्दी चिट्ठाकारों के नामों को लेख में शामिल किया जा सकता था.मैने प्रमुख चिट्ठों के पते जानने के लिये उन्हे चिट्ठा जगत डॉट कॉम की सकियता सूची को देखने की भी सलाह दी. ताकि वो अपने अगले लेख में अधिकाधिक हिन्दी चिट्ठाकारों को सम्मिलित कर सकें.

पल्लवी जी ,जो टाइम्स ऑफ इंडिया की विशेष संवाददाता है,से मुझे किसी उत्तर की अपेक्षा नहीं थी लेकिन कल  मेरे पास जब उनका जबाब आया तो सुखद आश्चर्य हुआ. उन्होने अपने ई-पत्र में जो कहा उससे में सहमत होता दिखा.इसलिये आपकी जानकारी के लिये उसका सार आप तक पहुंचा रहा हूँ.

उनका कहना था कि उनका ये लेख हिन्दी चिट्ठाकारी पर नहीं वरन छोटे शहरों में रहने वाले हिन्दी चिट्ठाकारों पर केन्द्रित था जो तकनीक की बहुत अच्छी सुविधाऎं ना होने के बाबजूद चिट्ठाकारी कर रहे हैं. इसीलिये रतलाम के चिट्ठाकार रवि जी और यमुनानगर के चिट्ठाकार श्रीश जी और अन्य को चुना गया. (गौरतलब है कि तकनीक की अच्छी सुविधाऎं ना होने के बाबजूद दोनों चिट्ठाकारों का चिट्ठा तकनीकी विषयों पर ही आधारित है)

पल्लवी जी ने वादा किया है कहा है कि शीघ्र यदि वो एक लेख हिन्दी चिट्ठाजगत पर भी लिखेंगी तो मुझसे भी संपर्क करेंगी..जिसमें अधिकाधिक चिट्ठाकारों को शामिल किया जा सकेगा. आप लोग अभी से मुझे अपने बधाई संदेश भेज सकते हैं..हो सकता है फोटो देखने के बाद ना भेजें… 🙂

तो प्रतीक्षा कीजिये पल्लवी जी के अगले लेख की और इस लेख के लिये उन्हे पुन: धन्यवाद.

कल जब मित्र समीरलाल जी ने “मोटों की महिमा” छापी तो अपने मोटापे पर आती जाती शरम फिर गायब हो गयी और एक पुरानी पढी कविता याद आ गयी.. लीजिये कविता प्रस्तुत है…

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आराम करो

आराम करो

एक मित्र मिले, बोले, “लाला, तुम किस चक्की का खाते हो?
इस डेढ़ छँटाक के राशन में भी तोंद बढ़ाए जाते हो।

क्या रक्खा है माँस बढ़ाने में, मनहूस, अक्ल से काम करो।
संक्रान्ति-काल की बेला है, मर मिटो, जगत में नाम करो।”
हम बोले, “रहने दो लेक्चर, पुरुषों को मत बदनाम करो।
इस दौड़-धूप में क्या रक्खा, आराम करो, आराम करो।

आराम ज़िन्दगी की कुंजी, इससे न तपेदिक होती है।
आराम सुधा की एक बूंद, तन का दुबलापन खोती है।
आराम शब्द में ‘राम’ छिपा जो भव-बंधन को खोता है।
आराम शब्द का ज्ञाता तो विरला ही योगी होता है।
इसलिए तुम्हें समझाता हूँ, मेरे अनुभव से काम करो।
ये जीवन, यौवन क्षणभंगुर, आराम करो, आराम करो।

यदि करना ही कुछ पड़ जाए तो अधिक न तुम उत्पात करो।
अपने घर में बैठे-बैठे बस लंबी-लंबी बात करो।

करने-धरने में क्या रक्खा जो रक्खा बात बनाने में।
जो ओठ हिलाने में रस है, वह कभी न हाथ हिलाने में।
तुम मुझसे पूछो बतलाऊँ — है मज़ा मूर्ख कहलाने में।
जीवन-जागृति में क्या रक्खा जो रक्खा है सो जाने में।

मैं यही सोचकर पास अक्ल के, कम ही जाया करता हूँ।
जो बुद्धिमान जन होते हैं, उनसे कतराया करता हूँ।
दीए जलने के पहले ही घर में आ जाया करता हूँ।
जो मिलता है, खा लेता हूँ, चुपके सो जाया करता हूँ।

मेरी गीता में लिखा हुआ — सच्चे योगी जो होते हैं,
वे कम-से-कम बारह घंटे तो बेफ़िक्री से सोते हैं।

अदवायन खिंची खाट में जो पड़ते ही आनंद आता है।
वह सात स्वर्ग, अपवर्ग, मोक्ष से भी ऊँचा उठ जाता है।
जब ‘सुख की नींद’ कढ़ा तकिया, इस सर के नीचे आता है,
तो सच कहता हूँ इस सर में, इंजन जैसा लग जाता है।

मैं मेल ट्रेन हो जाता हूँ, बुद्धि भी फक-फक करती है।
भावों का रश हो जाता है, कविता सब उमड़ी पड़ती है।

मैं औरों की तो नहीं, बात पहले अपनी ही लेता हूँ।
मैं पड़ा खाट पर बूटों को ऊँटों की उपमा देता हूँ।

मैं खटरागी हूँ मुझको तो खटिया में गीत फूटते हैं।
छत की कड़ियाँ गिनते-गिनते छंदों के बंध टूटते हैं।

मैं इसीलिए तो कहता हूँ मेरे अनुभव से काम करो।
यह खाट बिछा लो आँगन में, लेटो, बैठो, आराम करो।

– गोपालप्रसाद व्यास

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