मई 2007



क्या आपको मालूम है आप अपने घर में अब योगाभ्यास नहीं कर सकते ? क्योंकि यदि आप योगाभ्यास करेंगे तो आपको श्री विक्रम चौधरी जी को पैसे देने पड़ेंगे…..क़्योकि योग का आविष्कार भले ही उन्होने न किया हो योग का पेटेंट उनके नाम जरूर है.

आज सुबह जब उठा तो सोचा बहुत मोटे हो रहे हैं थोड़ा योगाभ्यास कर लें.हम बचपन से ही योग (योगा नहीं) करते रहे हैं-ये रामदेव जी के आस्था में आने से बहुत पहले की बात है-पर पिछ्ले 6-7 सालों में धीरे धीरे योग और व्यायाम घटते गया और वजन बढ़ता गया.आज जब पार्क में योग करने गये तो एक मित्र मिल गये और उन्होने बताया कि अब भविष्य में इस तरह से योगाभ्यास करना या किसी को सिखाना मँहगा पड़ सकता है.

समाचार ये है कि ..कलकत्ता में जन्मे ,अमरीका के वेवरले हिल्स में रहने वाले, जाने माने योग विशेषज्ञ
श्री विक्रम चौधरी ने योग का पेटेंट अपने नाम करने का आवेदन दिया है. शायद आपको पता हो कुछ समय पहले हल्दी और बासमती के पेटेंट के लिये भी आवेदन दिये गये थे.

कौन हैं ये विक्रम चौधरी …और क्या है उनका पेटेंट …?

विक्रम चौधरी ने अपना पहला योग स्कूल 1973 में सैन फ्रेंसिस्को में खोला था और आज उनके पूरी विश्व भर में 900 से ज्यादा ऎसे स्कूल चल रहे हैं .उनके शिष्यों में मैडोना और सेरेना विलियम्स भी शामिल हैं. अमरीका में योग व्यवसाय खूब फल फूल रहा है और इस व्यवसाय में विक्रम योग स्कूल का अग्रणी नाम है . एक अनुमान के अनुसार अमरीका में योग सालाना 25 अरब डॉलर का व्यापार करता है.

अमरीकी पेटेंट और ट्रेडमार्क कार्यालय ने 150 योग संबंधित कॉपीराइट और 2315 योग ट्रेडमार्क आबंटित किये है. इसका मतलब उन योग क्रियाओं का प्रयोग,बिना किसी को पैसा दिये करना अवैध माना जायेगा.

विक्रम चौधरी का कहना है कि उन्होने सिर्फ 26 ऎसे योगक्रियाओं को पेटेंट करवाया है जो यदि उसी क्रम में की जायें तो व्यक्ति को बहुत लाभ पहुंचाती हैं. उनका कहना है कि इन क्रियाओं को कोई भी, इसी क्रम में या किसी और क्रम में भी,किसी को नहीं सिखा सकता.यदि कोई सिखाना ही चाहे तो उसे 1500 डॉलर दे के चौधरी जी के इंस्टीट्यूट से इसकी ट्रेनिंग लेनी पड़ेगी. इतना ही नहीं इसके बाद उसे चौधरी जी का फ्रेंचाइजी बनना पड़ेगा और नियमित पैसा देना पड़ेगा.

भारत की बौद्धिक संपत्ति का दूसरे देशों,विशेषकर अमरीका में, इस तरह का उपयोग कहाँ तक उचित है ??

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(इस पोस्ट को साइबर कैफे से ऑनलाइन हिन्दिनी औजार का प्रयोग कर लिख रहा हूँ . इसलिये कुछ मात्रा की गलतियाँ हैँ जो कल ही सुधार पाऊँगा . आप मन ही मन सुधार लेँ . एक दिन उधार दें.)

आजकल कवियों पर शोध करने का फैशन चल निकला है . कोई कवि और कविता को नापने के चक्कर में पड़ा है ..तो कोई कवि की खोली झोली में झाँक रहा है.

कोई कवियों की शैली और कार्यों कि तुलना कर रहा है तो कोई कविता चर्चा में व्यस्त है.एक ओर कविता कोष में २००० पन्ने जोड़े जा चुके है और दूसरी ओर कवि तो कवि ,कविता-पाठकों तक को पुरुस्कार मिल रहे है . यानि पूरा का पूरा माहौल ही ‘कवितामय’ है . घुघुती जी की पड़ोसी ‘कविता’ तो फूले नही समा रही होगी .

अब कविता को नापने के चक्कर में हमारा क्या हाल हुआ था ….ये तो आप जान ही चुके हैं.

” सुबह आप की तरह मैं भी कविता को नापना चाहता था तो मिली नहीं ……. आप ने याद दिलाया और कहा कि पड़ोस वाली कविता को नापो तो उसकी माँ तो नहीं मिली पापा मिल गये ..आप ने कहा था माँ से पूछ लेना पापा का जिक्र तो था नहीं तो हम बिना पूछे नापने लगे. और जो झन्नाटेदार झांपड़ पड़ा कि घूम गये. आप भी ना …क्या क्या सलाह देती हैं…बू हू हू…. ”

कल सदी की महान मँत्र कविता को पढ़ने का भी सौभाग्य मिला . सचमुच मन गदगदा उठा ….. और मन गदा उठाकर भागना ही चाहता था कि उसे समझाया , धमकाया और उसे किसी तरह रास्ते पर लाया .

वैसे कुछ लोग आजकल प्रेरणा लेने के चक्कर मे भी पड़े हैँ … तो हमने सोचा कि हम भी प्रेरणा ले ही लेँ. अब जब खालिस,भावुक और सुन्दर कविता लिखने वाली घुघुती जी इतना अच्छा व्यँग्य लिख सकती हैँ तो अपन कविता मे हाथ क्यों नही आजमा सकते.

तो हमने भी लिख डाली सदी की महान ‘बिना मात्रा वाली’ कविता

चपल मन थम !!
मत मचल,
जतन कर,
हरदम अनबन ,
जखम, कनक-सम,
कसक तम,
चपल मन थम.

चल अचल,
बन मरहम, हरदम,
बन मत, तक्षक
न उगल गरल,
बन, मत-तक्षक,
बस संभल,
रहम कर,

खटर पटर ,
जमघट,
हट !! ,
बम-गरम, हमदम,
मचमच मत कर,
नटखट,
बदल !! ,
सब घर,
न डर,

बरस जलज सम,
कर अरपन,
नयन,चरन पर,

गलत मत कर,
खतम कर,
अब,
सब,
चपल मन थम !!

और कहते कहते मन को थाम ही लिया …. लेकिन इस महान बिना मात्रा की कविता से मन थम तो गया पर मन भरा नहीं . तो सोचा कि क्यों ना सदी की सबसे बरबाद कविता भी लिख डालेँ .

तो लीजिये वो भी हाजिर है .


झाँपड़ है, तमाचा है, कँटाप है,
बाबा जी की झोली में साँप है.

लिट्टी है चोखा है,
स्वाद ये अनोखा है. *
मूड़ी है झाल है, **
अंटी में माल है.

धांय किड़ी किड़ी,धांय किड़ी किड़ी, *!
सिगरेट को छोड़ जलाले एक बीड़ी.

घास की ओस,
बेटा है खरगोस,
तिनके वाली दूब,
अब सजेगी खूब.

फ्रीं फ्रां ध्रीग ध्रांग,
भ्रूम भाँ भ्रूम भाँ,
भों भों , काँव काँव,
आ गये अब चुनाव.

शोर है शराब है,
सत्ता का गलियारा है,
मार मत और इसे,
बेचारा दुखियारा है.

पेट में आंत है,
शेरनी के दांत है,
गाँवों की जीत है,
आज सभी मीत हैं.

सटर पटर ,
गटर गटर ,
तड़्क भड़्क,
कहाँ सड़क ?
कौन कड़क !!
मत हड़क ,
मत भड़क .

बाप ने कमाया है ,
बेटे ने लुटाया है .

झूठा है, झूठा है, झूठा है,
लूटा है, लूटा है, लूटा है,
टूटा है, टूटा है, टूटा है

खाया है, खाया है, खाया है,
भाया है, भाया है, भाया है,
माया है, माया है, माया है.

बरबाद कर,
स्वीकार कर,
जुलम कर,
जालिम बन,

अर्थ है, *(धन के अर्थ में)
अनर्थ है,
समर्थ है,
व्यर्थ है.

बिजली है ?
पानी है ?
बिटिया है ,
सयानी है .

खूँ खाँ खूँ खाँ ,
खून खराबा ,
कूँ काँ क़ूँ काँ ,
काके दा ढाबा ,

मान कर,
मानकर,
अपमान कर,
ध्यान कर ,
चल निकल,
सटक तू,
मत अटक तू,
गलहार है,
तैयार है,
आ बैठ ,
कुर्सी पर ,

अब इस सदी की सबसे बरबाद कविता का अर्थ कोई हम से ना पूछे .

अभय जी से पूछ ले.

हम तो चले..

* (ये प्रमोद जी की एक टिप्पणी से लिया है.लिट्टी-चोखा बिहार के प्रमुख व्यंजनो में है)
** (झाल-मूड़ी बंगाल में बहुत प्रसिद्ध है,भेल पूरी या लैया-चना जैसा)
*! (उड़ीसा में बोलचाल में प्रयुक्त होता है)

पिछ्ले हफ्ते मौन थे इसलिये नहीं कि किसी भाई ने धमकाया / समझाया हो कि मौन रहूं बल्कि इसलिये कि रोटी देने वाले ने भेज दिया किसी काम से और हम मजदूर की तरह चल दिये …यानि कि ऑफिस के काम से हमें शहर के बाहर जाना पड़ा . लप्पू-ट्प्पू (लैपटौप) तो साथ था पर मुए विचार थे कि आ ही नहीं रहे थे. लगता है हमारा शब्दज्ञान कुछ कम ही है .क्योकि कल ही पता चला कि शब्दों के बिना विचार नहीं आते. आ तो अब नहीं रहें हैं पर क्या करें मजबूरी है . कुछ ना कुछ तो लिखना ही पड़ेगा …

आजकल पता नहीं लोग शब्दों के पीछे क्यों पड़ गये हैं . कोई “नि:शब्द” दिखा रहा है तो कोई “शब्दों” की महत्ता बतला रहा है . कहा गया ..शब्दों का ज्ञान व्यक्ति के अनुभव की पहचान है . सही बात.. इसीलिये तो अपना देश महान है क्योकि अपने पास तो शब्दों की खान है. अब पुराने कवियों को ही देख लें .हमारे पुराने कवियों ने शब्दों को अनेक अर्थों में प्रयोग किया . एक ही शब्द अलग अलग जगह अलग अलग अर्थ दे जाता है. बचपन में हमें बताया गया शब्दों का ऎसा प्रयोग ‘यमक अलंकार’ भी कहलाता है . जैसे “कनक कनक ते सौ गुनी , मादकता अधिकाय “ … और कहीं पढ़ाया गया “रहिमन पानी राखिये , बिन पानी सब सून “ इसका अर्थ तो तब मालूम ही नहीं था . हम सोचते थे कि रहीम दास जी बता रहे है कि “टॉयलेट में पानी हमेशा रखो , बिना पानी के टॉयलेट का क्या मतलब ‘ अब उस जमाने में नल और टंकी तो होती नहीं थी. पानी रखना पड़ता था . इसीलिये ये बात आयी .

वैसे शब्द केवल कोरे शब्द नही है . शब्द अपने निहित अर्थों में महत्वपूर्ण हैं . शब्दों का चतुर प्रयोग और चतुर अर्थ विश्लेषण शब्दों को नये अर्थों में परिभाषित करता है . अब किसने सोचा था कि ‘तटस्थ’ (तट पर स्थित) रहने वाले ‘समय’ के पीछे हाथ धोकर पड़ जायेंगे . अब आप पूछेंगे कि उन्हें हाथ धोने की आवश्यकता क्यों पड़ी . शायद आपने ध्यान दिया हो उन्होने लिखा था कि “सोचते सोचते हमारी दशा शोचनीय हो गयी” अब शौच के बाद हाथ तो धोएंगे ही ना.

शब्द भले ही अपने अर्थों से महत्वपूर्ण हों पर हमें तो ये शब्द हमेशा कंफ्यूजियाते है. कब किस शब्द का क्या अर्थ होगा समझना थोड़ा कठिन हो जाता है.हमने कभी लिखा था .

“नाग के फन को देखकर , सपेरा अपना सारा फ़न भूल गया , और उस फन गेम में भी फनफनाने लगा ”
यहां फन शब्द तीन अर्थों में प्रयोग में आया है . हिन्दी का फन उर्दू का फ़न और फिर अंग्रेजी का फन .

ऎसी ही एक दिन “ फूल लेकर फूल आया , हमने फूलकर कहा फूल क्यों लाये हो तुम तो खुद ही फूल हो” ( यहां एक फूल हिन्दी का है तो एक अंग्रेजी का )

महाकवि भूषण की यह कविता तो आपको याद होगी ही ना

’ऊँचे घोर मन्दर के अन्दर रहन वाली,
ऊँचे घोर मन्दर के अन्दर रहाती हैं
नगन जड़ाती थी , वो नगन जड़ाती हैं
तीन बेर खाती थी, वो तीन बेर खाती हैं’

(इस कविता में युद्ध में हारे हुए राजाऑं कि रानियों कि दशा का वर्णन है . भूषण कहते है कि जो ऊँचे बड़े महलों के अन्दर रहती थी,वह अब ऊँची घोर गुफाओं के अन्दर रहती हैं. पहले जो नगीनों आभूषणों से जड़ी रहती थी , अब को कपड़ों की कमी से नग्न हो सर्दी में ठिठुरती हैं .जो दिन में तीन बार खाती थी, अब वो सिर्फ तीन बेर खाकर जिंदा हैं )

तो ये है शब्दों और उनके अर्थों का चमत्कार . अब कुछ दोहे मेरे भी सुन लें

शब्दों की पड़ताल में , मिले शब्द अनुकूल
‘फूल’ ढूंढने हम चले , खुद ही बन गये ‘फूल’

‘सफर’ कठिन है आजकल , करें ‘सफर’ बिन बात
गरमी तो चिपचिप करे, और घमौरी साथ

‘सोना’ दूभर हो गया , अब सपनों के संग
सोना’ चांदी बन गये , जब दहेज के अंग

मन की गहरी ‘पीर’ को , मिले कौन सा ‘पीर’
चादर चढ़े विश्वास की , बेबस है तकदीर

‘आम’ हो गये ‘आम’ अब , ये गरमी का रूप
तरबूजे तर कर गये , निकली जब जब धूप

शब्द रहे सीधे सादे, अर्थ हो गये गूढ़
‘भाव’ बढ़ गये भीड़ के,‘भाव’ ढूंढते मूढ़

जितने जितने शब्द मिले , उससे ज्यादा अर्थ
हम तो बौड़म ही रहे , वो कर गये अनर्थ

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