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मेरा ऎलान :ये मेरी व्‍यक्तिगत रुचि-अरुचि से जुड़ी हुई मौज है- आप इस पर या तो प्रशंसा भाव से (टिप्पणी) लिखें, या आलोचना की एक ग्राह्य शैली में ही अपनी (टिप्पणी) बात रखें. लेकिन जो भी करें …करें जरूर.

अभी आज ही जब हमने इतना अच्छा गाना गाया तो लोगों ने सुना ही नहीं (अभी भी सुन लीजिये भाई) ….. बस कुछ लोग आदतन आये और पीठ थपथपा के निकल लिये… हमारे भेजे में ये बात ही नहीं आयी कि ऎसा आखिर क्यों कर हुआ …हम सिर पकड़ कर बैठ गये कि कुछ शोर सा हुआ …फिर ध्यान से सुना तो कुछ आवाजें सुनायी दी…आवाजें पड़ोस से ही आ रहीं थी.

बाहर निकले..जैसे जैसे नजदीक बढ़ते गये शोर बढ़ता गया….

एक : मैं तुम्हारे सामाजिक दायित्वबोध से खुश नहीं हूँ.

दो : लेकिन मेरी दाल-भात…

इस शोर गुल के बीच हम मौकाए वारदात पर पहुंचे… पास जाकर देखा तो अपने ही पड़ोस के दो दुकानदार थे जो आपस में लड़ रहे थे. हमने बीच बचाव करते हुए एक से पूछा …जो ज्यादा हल्ला मचा रहा था और ऊंची ऊंची आवाज में बोल रहा था….

भाई आखिर बात क्या है…किस बात की लड़ाई है….

एक : अरे ये जो पंडित जी है ना…
हम : कौन पंडित जी…???
तभी हमारी नजर गुलाबी गमछा-धारी सज्जन पर पड़ी… इतनी गरमा गरमी से माथे पर पसीने की बूदें चुहचुहा रहीं थी… माथे का पसीना गमछे से पोंछ्ते हुए बोले..
दो : देखिये मेरी यहां पर एक दुकान है …जिसमें मैं खुद दाल-भात बनाता हूँ… खुद भी खाता हूँ और लोगों को भी खिलाता हूँ….
तो …!!! हमने पूछा …
एक : अरे यहीं हमरी भी एक दुकान है….
हम : और … आप क्या बेचते हैं….????
एक : हम सभी कुछ बेचते हैं …. बिरयानी…. नमक मिर्च लगा के चिकन…मटन.. .मच्छी…
पंडित जी : छी: ..छी: ..छी: ..छी: ….. नाक भों सिकोड़ कर पंडित जी बोले.
हमारा : तो आप पूरी तरह शाकाहारी है .
एक : शाकाहारी..!!…. ये जनाब तो प्याज लहसुन भी नहीं खाते….
हम : तो इसीलिये इनको …आपसे प्रोब्लम है….
एक : अरे प्रोब्लम इनको हमसे नहीं ….हमको इनसे है…
हम : वो क्यों….???
एक : अरे आजकल लोग इनकी दाल-भात को हमारी बिरयानी से ज्यादा पसंद कर रहे हैं…
हम : लेकिन लोग तो पहले वो नमक मिर्च वाला …चिकन …मटन ….
दो : खाते थे…लेकिन जब साफ-सुथरा,स्वादिष्ट,स्वास्थवर्धक भोजन इतने कम दामों में मिले तो लोग वो क्यों लें ये ना लें…
हम : मान गये भाई पंडित जी …
पं : किसे…..
हम : आपकी पारखी नजर और आपके दाल भात को….
एक : लेकिन इससे मैं तो नहीं मानुंगा ना….
हम : क्यों…??
एक : अरे मेरा नुकसान हुआ जा रहा है और आप….

अब “एक” तैश में आ गये थे. हमने उनसे पूछा …क्या आप भी खाना खुद ही बनाते हैं ??
एक : कोशिश तो करता हूँ ..पर मुझसे ढंग का खाना बनता ही नहीं..इसलिये ज्यादा नहीं बनाता ..

तो क्या करते हैं ??
एक : मैं तो दूसरों के बनाये खाने को अपनी दुकान में सजाता हूँ …हाँ खाना कैसा भी हो,किसी ने भी बनाया हो उसे नमक मिर्च लगा के सजाने का काम मैं ही करता हूँ और अपने मन माफिक परोसता हूँ …

वो ठीक है … लेकिन आपको दूसरों के दुकान के खाने से क्या मतलब…?? कोई बिरयानी खाये-खिलाये या दाल भात ..क्या फरक पड़ता है….?????

एक : नहीं जी .. फरक कैसे नहीं पड़ता ..यदि किसी की दाल भात की दुकान चल निकली तो मेरे लजीज व्यंजनों का क्या होगा…?
हम : लेकिन व्यंजन तो आपको लजीज लगते हैं …हो सकता है लोगों को वो पसंद ना हों…
एक : अरे पसंद करना पड़ेगा … कैसे नहीं करेंगे …??? जब ये अपनी दुकान में दाल-भात रखेंगे ही नहीं तो फिर उसे खायेगा ही कौन….? भूखा आदमी इधर ही आयेगा ना …!! उनके होंठों पर कुटिल मुस्कान थी….
उनकी बात सुनकर पंडित जी भड़क उठे ..अरे ये क्या बात हुई … मेरी दुकान है… मैं निर्धारित करुंगा कि मुझे क्या बेचना है…

तभी पीछे खड़े और अभी तक चुपचाप सारा माजरा देखने वाले चूहा नुमा एक व्यक्ति सामने आये और बोले….(उन को ठीक से हिन्दी भी नहीं बोलनी आ रही थी…गले से आवाज नहीं निकल रही थी….पर फिर भी बोले….)

आप इतना भड़कीये मत पंडित जी की यहां पर आपका जो मन करेगा वही माल बेचेंगे…!!! …नहीं…. आपका एक सामाजिक जीवन है और ताक़त के षडयंत्र को समझने सोचने वाले लोग बहुत नहीं हैं इसलिए आप जैसे ही लोगों से उम्मीद की जाती है तभी कोई बात कही जाती है और कोई वाद और गुट का मामला नही है हम लोगों को एक बेहतरीन समाज बनाने के क्रम मे कई भावुक और परंपरागत बातों को छोड़कर अपने आप में भी बदलाव लाना होगा. बेचारों का विकास होते रहना चाहिए ताकि भाई…. चारा बरक़रार रह सके.

अब वो भाई कौन से चारे की बात कर रहे थे ये तो हमें समझ में आया नहीं. हमने फिर बीच बचाव करते हुए उनसे कहा….देखिये महोदय आप चुप रहिये…और “एक” से बोले…

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अरे पंडित जी को लगा लेने दो ना जिस भोजन की दुकान लगाना चाहते हैं ..आप क्यों बेकार की बहस में पढ़ते हैं.

देखिये ये एक सार्वजनिक स्‍पेस में अपने भोजन को ला रहे हैं- इसलिए उस पर बात-बहस तो होगी।

लेकिन हम तो सिर्फ भोजन ही बेच रहे हैं ..हमें दाल भात अच्छा लगता है इसलिये वही बनाते,खाते खिलाते हैं……पंडित जी थोड़ा भावुक होकर बोले….

एक : सार्वजनिक संवाद में इस कदर भावुक होंगे, तो काम नहीं चलेगा।
पंडित जी : तो क्या करूं .. लड़ूं आपसे …!!
एक : नहीं ….हमारा समर्थन कीजिये…
पंडित जी : जी नहीं ..मैं आपका समर्थन नहीं करता ..
एक : तो आप हमारा विरोध करते हैं…!!
पंडित जी : जी नहीं ..मैं आपका विरोध भी नहीं करता ..
एक : ये क्या कुछ तो करना ही पड़ेगा ही ना…
हम : अरे ये तो वही बात हो गयी … हम तो डूबेंगे सनम तुमको भी ले डूबेंगे.
पंडित जी : कहने तो ये भी कह सकते हैं … आप डूबे बामना , ले डूबे जजमान

अब जो भी है इस किस्से को यहीं खतम करो ना यार…हमारी बात सुन कर वो लोग थोड़े संभले…

अब रात ज्यादा गहरा रही थी…दोनों अपने अपने पक्ष में कुछ और तर्क जुटाने ,थोड़ी और भीड़ बढ़ाने के इरादे से अपनी अपनी राह चल दिये…

हम दोनों को जाते देर तक देखते रहे…फिर हम भी घर की ओर चल दिये….

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