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घुघुती जी का ‘आदेश’ हुआ की आप कौवों को फरमान भेजिये कि वो उनके घर के आस पास जायें क्योकि वो पिछ्ले सात साल से कौवों को घुघुतिया नहीं खिला पा रही हैं. वैसे अब तो घुघुतिया अगले साल आयेगा लेकिन हमने सोचा कि चलो हम तो अपना काम कर ही दें . तो हम जुट गये फरमान की तैयारी करने में . इधर हम फरमान की तैयारी में व्यस्त थे और उधर कुछ घटनायें हो गयी .एक तो मुहल्ले में ‘कुत्तों का आतंक’ फैल गया और उस आतंक को दूर करने की कवायदें शुरु हो गयी . कुछ बोले कि ‘मुहल्ले में गंदगी’ है इसलिये शायद कुत्ते आये हों ( पर हमारा ‘कुत्ता ज्ञान’ कहता है कि गंदगी के कारण कुत्ते नहीं आते वरन कुत्तों के कारण गंदगी आती है ) कुछ ने कहा कि ‘मुहल्ले में किसी ने ऊंची दुकान खोली’ है जहर बेचने की ….शायद इसलिये कुत्ते… पर ये तो कोई बड़ी घटना नहीं है आजकल जगह जगह इस तरह की जहर बेचने वाली दुकानें खुली हैं कुछ खुले आम बेचते हैं कुछ अच्छी पैकेजिंग कर.. और दूसरी घटना ये कि हमारे ही राज्य के कुछ कौवे एक शादी में व्यस्त हो गये इस आशा में कि इतनी बड़ी शादी है तो कुछ ना कुछ जूठन तो मिल ही जायेगी और फिर कुछ दिन आराम से कटेंगे … काम नहीं करना पड़ेगा .. इस चक्कर में कौवों के कई गुट रात रात भर विवाह ‘जलसाघर’ के आगे डेरा डाले ‘प्रतीक्षा’ करते रहे कि शायद कोई डाल दे थोड़ी सी जूठन पर निराशा ही हाथ लगी. … बाद में खबर आयी की पूरी जूठन तो क्या उन्हें तो एक आद जूठन-बाईट भी नहीं मिली.

खैर ये तो वो कारण रहे जिनकी वजह से फरमान भेजने में देरी हुई . अब आप भी सुनिये ये फरमान …

मेरी प्रजा के कौवो ,

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वैसे तो आपको मालूम ही होगा कि हमारी संख्या निरंतर कम होते जा रही है . इसमें हमारा दोष नहीं है ये तो एक पर्यावरणीय समस्या है .लेकिन हमारा होना या ना होना उन लोगों को भी कहीं ना कहीं प्रभावित करता ही है जो हमारी इस घटती जनसंख्य़ा के लिये जिम्मेवार हैं . मनुष्य ने बड़ी तादाद में जंगल काटे हैं ऎसे में हमारी जनसंख़्या ही नही वरन अन्य पशु – पक्षियों की जनसंख्या में भी लगातार कमी हो रही है . प्राचीन काल से भारत देश में सभी पशु – पक्षियों को बड़े सम्मान की नजर से देखा जाता था. आपको पंचतंत्र के हमारे पूर्वज लघुपतनक कौवे की याद तो होगी ही .

अब आपको क्या बतायें . कुछ लोग हमें मूरख समझते हैं कहते हैं कि हम कोकिलों की संतानो को पालते हैं . लेकिन उन्हें शायद ये नहीं मालूम कि हमको तो पता रहता ही है कि ये कोयल की ही संतान है वही कोयल.. जो बहुत मीठा बोलती है. कोयल की मीठी बोली के कारण ही अधिकतर लोग कोयल को ज्यादा महत्व देते हैं लेकिन उन्हें क्या मालूम कि जो मीठा बोलता है उसका दिल भी मीठा हो कोई जरूरी तो नहीं . कोयल तो चार दिन की चांदनी है हम तो सदाबहार हैं. हम तो साफ दिल के हैं इसलिये सब कुछ जानने के वावजूद भी पाल लेते हैं उन बच्चों को और फिर बच्चे तो बच्चे होते हैं . हम मूरख नहीं वरन “ अनाथों के नाथ “ हैं.

वैसे पिछ्ले कुछ समय से हमें उस तरह का सम्मान नहीं दिया जाता जो पहले दिया जाता था. हम तो रामायण के काल में थे “कागभुसंडी के रूप में . उस समय तो भगवान कुछ भी देने को तैयार हो गये थे.

‘काकभुसुंडि मागु बर अति प्रसन्न मोहि जानि।
अनिमादिक सिधि अपर रिधि मोच्छ सकल सुख खानि’

( हे काकभुशुण्डि ! तू मुझे अत्यन्त प्रसन्न जानकर वर माँग. अणिमा आदि अष्ट सिद्धियाँ, दूसरी ऋद्धियाँ तथा सम्पूर्ण सुखों की खान मोक्ष )

पर हमने मांगा क्या …सिर्फ भक्ति ….

‘भगत कल्पतरु प्रनत हित कृपा सिंधु सुख धाम।
सोइ निज भगति मोहि प्रभु देहु दया करि राम ‘

( हे भक्तों के कल्पवृक्ष ! हे शरणागतके हितकारी ! हे कृपा सागर ! हे सुखधाम श्रीरामजी ! दया करके मुझे अपनी वही भक्ति दीजिये )

ये थी हमारे पूर्वजों की महानता ….और कृष्ण जी के तो हम सखा ही रहे हैं . उनसे तो खिलवाड़ चलता ही था…

‘ काग के भाग बड़े सजनी, हरि हाथ सों ले गयो माखन रोटी ‘

पुरानी बातें और थी.तब हम समाज का एक हिस्सा थे. हमें तो पहले बच्चों को मनाने के लिये भी बुलाया जाता था.

‘करिया कउंआ आजा रे,
बुधवा कउंआ आजा रे ।
जंगाय हे मुन्ना राजा रे,
ए पँवरा ला खाजा रे ॥’

( काले कौए आ जाओ,
विद्वान कौए आ जाओ
मुन्ना राजा नाराज है,
इस ग्रास को खा जाओ )

और मकर संक्रांति पर तो हमारी बहार थी. बागेश्वर ( उत्तराखंड में एक जगह ) में उतरैणी मेला लगता था. घर में तरह तरह के व्यंजन बनाये जाते थे. मीठे आटे से अलग-अलग आकृतियां जैसे घुघुतिया , शकरपारे (खजूरे) , डमरू , तलवार , मेंचुला , दाणिम का फूल आदि बनाकर घी/तेल में तल ली जाती थीं और फिर घुघुती की माला बनाई जाती थी जिसमें बीच में संतरे रहता था और उसके चारों और पूरी , बड़ा ( एक पहाड़ी पकवान) , और सारी आकृतियां लगाकर माला बना दी जाते थी. इसके पीछे तर्क ये है कि संतरा सूर्य का प्रतीक है और बाकी सारी चीजै बाँकी ग्रहों के प्रतीक . ये त्योहार सर्दी के समाप्त होने और गर्मी के आगमन का प्रतीक है . अगले दिन सारे बच्चे और बड़े भी हमें बुलाते हैं और कहते थे.

काले कौवा काले , घुघुती मौवा खाले।
ले कौवा पूरी , मुकु दिजा सुनै-की चूरी ।
ले कौवा बड़ा , मुकु दिजा सुनै-को घड़ा ।
ले कौवा तलवार , मुकु दिजा भॉल भॉल परिवार ।

( काले कौए आ जाओ , घुघुती की माला खा जाओ ,
ले जा कौवा पूड़ी ,मुझे दे जा सोने की चूड़ी
ले जा कौवा बड़ा ,मुझे दे जा सोने का घड़ा
ले जा कौवा तलवार ,मुझे दे जा अच्छा सा परिवार )

और जब कौवा नहीं दिखायी देता तो उसे प्रेम-मिश्रित डाँट भी मिलती थी.

‘ले कौवा मेचुलो , नि आले आज तो तेरा गालड़ थेचुलों’
( आ जा कौवा आजा यार , आज ना आया तो खायेगा मार)

इतनी प्यार से हमें बुलाया जाता था जैसे पंडित को जीमने के लिये बुला रहे हों तब हम आते थे बड़े ही आदर के साथ. आजकल तो लोग इतने व्यस्त हो गये हैं कि इन सभी रीति रिवाजों को बेकार मानने लगे हैं .

हमको तो बुद्धिमान भी खूब माना जाता था . बच्चो को ये कविता पढ़ाई जाती थी.

“तेज धूप से कौवा प्यासा , पानी की थी कहीं ना आशा”

ये कहानी तो मेरे को मेरे नाना ने सुनाई थी. गरमी का मौसम था ….. सभी नदियाँ, तालाब , कुँए सूख गये थे. पानी का नामोनिशान तक ना था. तेज धूप से मुझे बहुत प्यास लग गयी थी , पानी की तलाश में इधर-उधर उड़ता रहा . थक-हार कर एक पेड़ पर जा बैठा तो मुझे एक घड़ा दिखाई दिया . घड़े में पानी बहुत नीचे था और मेरी चोंच पानी तक नहीं पहुँच पा रही थी . मैं आसपास बिखरे पड़े कंकड़-पत्थर चोंच से ला-लाकर घड़े में डालने लगा बस क्या था ! पानी धीरे-धीरे घड़े के मुँह तक आ गया । मैंने पानी पीकर अपनी प्यास बुझायी और उड़ गया .

सुबह-सुबह घर की मुंडेर पर कौए का बोलना शुभ माना जाता है .ऎसा विश्वास है कि यदि कौआ बोले, तो उस दिन परदेश गये किसी अपने का घर आगमन होता है. इसीलिये पहले नायिकाऎं कहती थी.

‘ मोरी अटरिया पे कागा बोले जिया डोले मेरा कोई आ रहा है ’

‘ माई नि माई मुंडेर पे मेरे बोल रहा है कागा ‘

या फिर …..

‘पैजनी गढ़ाई चोंच सोन में मढ़ाइ दैहौं
कर पर लाई पर रुचि सुधिरहौं ।
कहे कवि तोष छिन अटक न लैहौं कवौ
कंचन कटोरे अटा खीर भरि धरिहौं ।
ए रे काग तेरे सगुन संजोग आजु
मेरे पति आवैं तो वचन ते न टरिहौ ।
करती करार तौन पहिले करौंगी सब
अपने पिया को फिरि पाछे अंक भरिहों । ‘

अब कोई सुन्दरी हमारी चोंच सोने मे मढ़ाने को तैयार हो सोने के कटोरे में खीर भर कर रख दे और पति के आने पर पति को छोड़ अपन को अपनी बाँहों में भरने को तैयार हो तो भला कौन नहीं आयेगा .

अमीर खुसरो के जमाने में भी कुछ ऎसा कहा जाता था .

परदेसी बालम धन अकेली , मेरा बिदेसी घर आवना.
बिर का दुख बहुत कठिन है , प्रीतम अब आ जावना.
इस पार जमुना उस पार गंगा , बीच चंदन का पेड़ ना.
इस पेड़ ऊपर कागा बोले , कागा का बचन सुहावना.

तो कौए के वचन को सुहावना बोला जाता था . अब कोई इतनी मान मनुहार करे तो हम क्यों ना आयें भला. आज तो कौए के बोलने को केवल ‘कोरी काँव काँव’ ही माना जाता है.

अब देखिये मैने आपके पक्ष की सारी बातें इस फरमान में रख दी क्योंकि मैं समझ सकता हूँ आपकी परेशानियां पर इस लोकतंत्रीय सत्ता में परेशानियां समझना एक बात है उनका समाधान ढूँढना दूसरी बात.

लेकिन फिर भी मेरा आप लोगों से निवेदन है कि आप इन बातों के बावजूद भी घुघुती जी के घर जायें और उनके दु:ख भरी पैरोडी की लाज रख लें.

आपका राजा — काकेश
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