रविवार, अप्रैल 8th, 2007


कल स्वामी जी से मुलाकात हुई तो उन्होने ब्लौग लिखने के कई तरीके बताए. कई नयी बातें सीखने को मिली. य़े सत्य है कि आज भी हिन्दी चिट्ठाकरिता में उस विविधता की कमी है जो अन्य भाषाओं के ( विशेषकर अंग्रेजी ) के चिट्ठों में मिलती है लेकिन विकसित और विकाशसील का अंतर समाप्त होने पर ये विविधता अपनी हिंदी में भी आ जायेगी. स्वामी जी के लेख से प्रेरित हो आज कुछ नया (और मौलिक ) लिखने का प्रयास कर रहा हूं.

कुछ बातें यादों के रूप में आपसे चिपक जाती हैं . उनको आप अपने आप से बाहर नहीं निकाल सकते . उन्हीं यादों को जब आप मुड़कर देखते हैं तो “नराई” ( नॉस्टालजिया ) जैसा भाव पैदा होता है. ऎसे ही किसी “नराई” के बारे में लिखने बैठा हूं पर पहले कुछ और…..

हम , लोगों को जज करके एक खांचे में फिट कर देते हैं और फिर उन्हें उस खांचे से बाहर नहीं देख पाते . बहुत से सृजनात्मक माध्यम जैसे लेखन और फिल्म में यह बात अधिकांशत: लागू होती है . हम भारतीयों में यह खांचा बनना शुरु होता है किसी व्यक्ति के नाम से जिसमें उसका सर-नेम (जाति) भी आ जाती है .यदि मैं अपने ‘काकेश’ नाम से मुसलमान या हिन्दू विरोधी बात करूं तो पाठक उसे किसी और नजर से देखेंगे और यदि ठीक वही लेखन मैं किसी और नाम जैसे ‘क़माल अशरफ़’ से करूं तो उसी बात को पाठक किसी और नजरिये से देखेंगे .और फिर दूसरा खांचा बनता है व्यक्ति के व्यवसाय (प्रोफेशन) से .यदि मैं बोलूं कि मैं डाक्टर हूं तो मेरे स्वास्थ्य संबंधित लेखों की उपयोगिता लोगों की नजर में बढ़ जाएगी. आप कहेगें कि ये बात तो ठीक ही है कि एक डाक्टर की बात ज्यादा प्रमाणिक लगेगी ही .हाँ यह ठीक है पर आप तो लेखक की कही बात का ही भरोसा कर रहे हैं ना .कोई उसका प्रमाणपत्र तो सत्यापित नही कर रहे. ऎसे बहुत से खांचे हैं .एक ऎसा ही खांचा है अपने जन्मस्थान का . बहुत से हिन्दी चिट्ठों में भी ये खांचा प्रयोग होते दिखा. मैं यदि कानपुर की ठग्गू के लड्डू और बदनाम कुल्फी की दुकान या परेड के बाहर बिकती हुई सस्ती किताबों या फिर आर्यनगर की बिरयानी का जिक्र करने लगूं तो लोग समझेंगे कि मैं कान्हेपुर का हूं और फिर मेरे लेखन को भी स्तरीय समझने लगेगें :-). हाँलाकि देर सबेर अच्छा लेखन ही सराहा जाता है लेकिन चिट्ठाकारिता जगत में जहां एक रचना की उम्र बहुत ही छोटी होती है वहां ये खांचे लोगों की पठनीयता निर्धारित करते हैं और ब्लौगजगत में सफलता का पैमाना अच्छा लेखन नहीं अच्छी हिट्स होती हैं . अच्छी हिट्स ही अधिक टिप्पणीयों की जननी है और अधिक टिप्पणीयां ही आपकी लोकप्रियता और कमोबेश आपके अच्छे लेखन का मानक. यानि परोक्ष रूप से हम भी ये मानने लगे हैं अच्छा लेखन वही है जो ज्यादा पढ़ा जा रहा है बिल्कुल फिल्मी दुनिया की तरह .जहां बाक्स ऑफिस की सफलता ही एक अच्छी फिल्म की पहचान है ( जहां दादा कोंडके की “अंधेरी रात में….” गुरुदत्त की “कागज के फूल” से ज्यादा अच्छी फिल्म है ) . ये व्यवसायीकरण है..तो क्या हम हिन्दी चिट्ठाजगत को भी व्यवसायीकरण की ओर ले जा रहे हैं.

अभी हिंदी चिट्ठा जगत में लिखने वाले कम हैं किंतु हमारे आज के छोटे-छोटे कुछ कदम हमारे चिट्ठा जगत के भविष्य को निर्धारित करेंगे. जैसा कि कयास लगाया जा रहा है कि आने वाले समय में हिन्दी माध्यम से लिखने वालों की संख्या बहुत अधिक हो जायेगी तो नये चिट्ठाकारों के लिये हमारे ये मानक उनके लिखने के तौर तरीके निर्धारित करेंगे. यदि हम अंग्रेजी भाषा के ब्लौग्स को ही फॉलो करेंगे तो फिर यहां भी लोग उन विषयों को ज्यादा लिखेंगे जिनसे पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जा सके ( अभी भी भड़काऊ शीर्षक लगाकर अपने चिट्ठों में खीचने वाले चिट्ठाकारों की कमी हिन्दी चिट्ठाजगत में नहीं है ) . तब फिर लोग हिट्स के लिये ही लिखेंगे फिर स्वांत: सुखाय वाली भावना गौण हो जायेगी …तो क्या ऎसे में स्तरीय लेखन संभव होगा.

बहुत से लोग ये तर्क देंगे कि ये सब तो अंग्रेजी चिट्ठा जगत में ऎसे ही चल रहा है .य़े सच है इसीलिये वहां पौर्न लिखने वाले चिट्ठाकार ज्यादा चर्चा में रहते हैं और उनमें से कई व्यवसायिक रूप से ये लेखन कर रहे हैं और फिर ये आवश्यक तो नहीं कि जो अंग्रेजी चिट्ठा जगत में हो रहा है हम भी उसी का पालन करें हमारा देश भारत तो विश्व-गुरु रहा है कई मायनों में..तो क्यों ना यहां भी हम कुछ नया और मौलिक इस चिट्ठा-विश्व को दें.

य़े कुछ मुद्दे हैं जिनपर विचार करने की आवश्यकता है. हम मात्र मूक-दर्शक (फेंससिटर) बन कर नहीं रह सकते…

शेष फिर …… अगली पोस्ट में ..अभी तो चलें ऑफिस …

कल जब अपनी नयी प्रयोगात्मक पॉड्कास्ट को फाइनल टच दे रहे थे  कि कहीं से आवाज आयी.

का गजब हुआ जब लव हुआ ….. का गजब हुआ जब लव हुआ ..

गांव के गँवार छोरे को जब शहर की स्मार्ट लड़की से प्यार हो जाता है तो वो जैसे खुश होकर इधर उधर डोलता है वैसे ही कुछ अंदाज में जूता महाशय ने कमरे में प्रवेश किया. पिछ्लों  दिनों की घटनाओं से तो हम सोच बैठे थे कि जूता महाशय कहीं पिट पिटा रहे होंगे लेकिन उन को इस तरह देख कर घोर आश्चर्य हुआ. हम पौड्कास्ट के प्रयोग से काफी थक चुके थे फिर भी हमने पूछ ही लिया क्या हुआ महोदय बड़े खुश नजर आ रहे हो.

दो कारण हैं हमारे खुश होने के …एक तो ये कि तुम्हारी दुकान नहीं चल रही और दूसरी यह की हमारी दुकान चल निकली.

हम तो कुछ समझे ही नही थे इसलिये पूछ बैठे.

क्या मतलब ?

देखो तुम अभी ये ब्लौग का नया धंधा शुरु किया ना और फिर अपनी पूरी फैमिली को लेकर नया नया माल टिकाने की कोशिश कर रहा है ना … तो ना तो तेरा धंधा चल रहा और ना ही तेरा माल  बिक रहा .

बिक नहीं रहा.. मतलब ?

यही कि कितना लोग तेरे ब्लौग पे आता है….कितना हिट्स मिलता है तेरे को.

नहीं… लोग पढ़ते तो हैं ना.

खाक पढ़ते हैं ..अरे तेरे से ज्यादा हिट्स तो वो सैक्सी फोरवर्डेड पिक्चर चेपने वाले को मिल जाता है ..और वहां कमेंट्स भी मिलते हैं ढेरों . 

लेकिन वो तो सिर्फ  टाईम पास के लिये होता है और वहां तो लोग केवल टाइम पास के लिये ही जाते हैं.

तो तेरे ब्लौग को कौन सा लोग ज्ञान प्राप्ति के लिये पढ़ते हैं ..तू भी तो टाइम पास ही लिखता है..

लेकिन मैं तो ब्लौग के माध्यम से कुछ संदेश भी देना चाहता हूं.

वो तो तेरे को लगता है ना ..यदि तू अच्छा लिखता तो तेरा नाम भी ब्लौग की टी.आर.पी रेटिंग में होता ना.

देखो जूता महोदय …ना तो मैं हिट्स के लिये लिखता हूं ना ही किसी रेटिंग …

उसने मेरी बात को अनसुनी करते हुए कहा ..और तो और अब तेरे को अप्रगतिशील साहित्य की श्रेणी में भी डाल दिया जायेगा… तो क्या तू भी अब मेरे को छोड़ , कुत्ते पे लिखेगा ??  मेरा मजाक सा उड़ाते हुए आवाज आयी.

मेरे को कुछ भी समझ ही नहीं आ रहा था कि जूता महोदय क्या बोल रहे हैं किंतु उन्होने बोलना जारी रखा ..इस बार मजाक उड़ाने की नहीं बल्कि समझाने वाले अंदाज में ..

देखो चपड़गंजू तुम अभी ब्लौग-जगत में नये नये आये हो ..यहां भी फिल्मी जगत की तरह पहले से ही अमिताभ और शाहरुख बैठे हैं जिनके सिर्फ नाम से ही फिल्में बिकती हैं .तुम भी कुछ दिन यहां रहो अपना काम अच्छा करो ..फिर जब काम अच्छा होगा तो नाम भी होगा ..फिर लोग तुम्हें भी पढ़ेंगे..

उनकी बात अब कुछ कुछ समझ आने लगी थी…उसी समय एक कहानी भी याद आयी लेकिन वो बाद में ..अभी तो अपने वार्तालाप को ही आगे बढ़ाते हैं.

लेकिन आपकी दुकान कैसे चल निकली ..क्या आपकी जूती जी से सुलह हो गयी ..

सुलह ..अरे कलह हुआ ही कहाँ था जो सुलह होती..

लेकिन उस दिन तो आपका झगड़ा हो रहा था ना…

अरे किस पति पत्नी में झगड़ा नहीं होता .और फिर हम भारतीय पति-पत्नियों की यही तो खासियत है ना कि हम कितना भी झगड़ें ज्यादा देर एक दूसरे से अलग नहीं रह सकते ..

लेकिन वो आपकी प्रेमिका वाली बात पता चल गयी थी ना ..

हाँ उसको लेकर झगड़ा तो हुआ था पर हमने अपनी गलती मान ली और कान पकड़ लिये कि आगे से ऎसा नहीं होगा और जूती ने भी एक अच्छी भारतीय पत्नी की तरह हमें माफ कर दिया…बल्कि इस घटना के बाद तो हमारे रिश्ते और भी अच्छे हो गये हैं ..इसीलिये तो मैं शुरु में गाना गा रहा था ..का गजब हुआ….

ओ..इसलिये गा रहे थे ..हमने तो सोचा था…

..और हां जूती ने एक बात तेरे लिये भी बोली है कि तू अब सैंडल की बात नहीं मानेगा ….

मतलब…!!

मतलब ये कि ..तू ये जो मोटी-मोटी किताबें लेकर हमारा इतिहास-भूगोल खंगाल रहा है अब वह इतिहास नहीं लिखने का ..

अरे ..लेकिन मैने ये जो जानकारी जमा की है उसका क्या …

वो तो तू फिर कभी यूज कर लेना अभी तो इस एपिसोड को खतम कर…

ठीक है ठीक है ..लेकिन एक बात बताओ यार ( अब मैं थोड़ा खुल गया था ) तुम्हें तो अपने इतिहास के बारे में पता है ना…

ज्यादा तो नहीं ..बस इतना ही …कि हमारे जन्मदाता कोई आदिदास जी थे..

आप कहीं संत रैदास की बात तो नहीं कर रहे ना..

ना ..ना…वो आदिदास ..कहीं अंग्रेजी में पढ़ा था ..ADIDAS…

मेरे समझ में बात आ गयी और मैं मन ही मन हँसा और फिर मैने जूते महोदय से विदा ली…..

तो क्या करूं दोस्तो अब चुंकि वादा किया है इसलिये अब जूते का इतिहास तो फिर कभी लिखुंगा …अभी इतना ही …

Joota