गुरूवार, अप्रैल 5th, 2007


सर की सूजन से कुछ आराम मिला ही था कि अचानक फिर सर बज उठा . हम सोचे ..कि अब क्यों सैंडल रानी हम पर बजी पर देखा तो सैंडल रानी नहीं बल्कि जूता महाशय थे …हमने उनसे पूछा कि भाई अब आपको क्या आपत्ति है .तो वो बोले कल आपने “जूते की प्रेमिका सैंडल रानी” क्यों लिखा अपने चिट्ठे पर .हमने कहा कि अरे ये तो जग जाहिर ही है कि….

वो बोले ये तुम्हारी दुनिया में जग जाहिर होगा हमारी दुनिया में नहीं .

हम बोले…लेकिन वो तुम्हारी प्रेमिका तो हैं ना ..

हाँ हैं लेकिन यह हमारी पत्नी जूती को नहीं ना मालूम ..

अब तो जैसे हमें सारी बात समझ में आ गयी ..हमने हाथ जोड़कर माफी मांगते हुए पूछा लेकिन ये बात तो बहुतों को नहीं पता कि जूती आपकी पत्नी हैं और फिर आपको कभी जूती के साथ देखा भी नहीं .

कैसे देखोगे!!… अक्सर लोग प्रेमिकाओं के साथ ही देखे जाते हैं. पत्नियों को तो घर की रसोई से ही फुरसत नहीं . इसीलिये तो आजकल कुछ प्रगतिशील महिलाओं द्वारा रसोई को घर से बाहर निकालने का अप्रगतिशील आंदोलन खड़ा किया जा रहा है .

हमने दिखने और विचारों में युवा किंतु उम्र में 12-13 साल बड़े ब्लौगर की तरह चिंता जताई. अरे रसोई बाहर हो जाएगी तो फिर घर में रस ही नहीं रहेगा .

भाड़ में जाओ तुम और तुम्हारा रस ..पीछे से आती ये आवाज जूती महोदया की थी.अरे क्या हम औरतें घर में रहकर सजने संवरने में ही दिन बिताऎं और तुम आदमी लोग फुरसत से ब्लौग पे ब्लौग लिखो वो भी इतने लंबे लंबे ..अरे अब हम लोगों ने भी सोचा है कि हम भी ब्लौग लिखेंगे.. पर क्या करें कहां से लायें समय ..इसीलिये बच्चों और पतियों के टिफिन के साथ छोटी छोटी कविताऎं ही पैक कर पाते है ..हम तो वोट देने जाते हैं तो भी बच्चों को ले के जाना पड़ता है..

हम जब तक रवीन्द्र नाथ टैगोर के किसी अंग्रेजी लेख का हिन्दी तर्जुमा सोचते वो फिर बोल उठी..

तुम लोग घर से बाहर निकल कर ना जाने कहां कहां मटरगस्तियां करते फिरते हो और हमें कभी घर से बाहर भी नहीं ले जाते ..ये नहीं कि कभी कोई पिक्चर ही दिखा दो . अब हमने भी पिलान बनाया है कि हम भी उ नई पिक्चर प्रोवोक्ड देखेंगी और उससे कुछ प्रेरणा लेंगी ….

हम लिखने तो बैठे थे जूते का भूत यानि इतिहास पर अब हमें जूते का (उज्जवल?) भविष्य नजर आने लगा. ..आगे क्या हुआ ..ये बताएगे बाद में… अभी तो चले ऑफिस ..

आज जीतू जी के अतीत की कथा सुनकर ब्लोग-नाद के बारे में पता चलाए .तो मेरी भी इच्छा हुई कि मैं अपनी आवाज रिकार्ड कर पोडकास्टिंग करूं .तो प्रस्तुत करता हूं मेरा पहला पोडकास्ट .

अभी ये केवल .mp3 में ही अपलोड कर पा रहा हूं.

पोडकास्ट यहां सुने .

अपनी टिप्पणी दें और कोई गलती हुई हो तो क़ृपया बताऎं..

जूतमबाजी जारी है..कोई सिले जूते की भाषा सुनते सुनते इतना पक गया है कि कहता है जूते की सुनो वो तुम्हारी सुनेगा कोई फटे जूते की व्यथा कथा कहते नहीं थक रहा. . लेकिन मजे की बात यह है कि ये तो कोई बता ही नहीं रहा जूते का इतिहास ,भूगोल ( आप चाहें तो और विषय भी जोड़ लें ) क्या है ? आज के युग में जूतमबाजी का क्या महत्व है ?… .जूता बिरादरी के अन्य सदस्य मसलन जूते की प्रेमिका सैंडल रानी , छोटी बहिन चप्पल और भी अन्य सदस्य जैसे जूती , बूट इत्यादि नाराज हैं कि ये भेदभाव क्यों ..अब कल ही सैंडल रानियों से पाला पड़ गया ..कैसे पड़ा ये तो बाद में बताऊंगा लेकिन उन्होने भी कल मेरे सर में अपनी छाप छोड़ने के बाद  ढेर सारा उपदेश दे डाला और सर का तबला कुछ ज्यादा ही देर तक बजाया ..मेरे विरोध करने पर कहने लगी कि तुम चिट्ठाकार केवल जूते की ही बात क्यों करते हो मैं इतनी सुंदर , सुशील ,स्लिम एंड ट्रिम हूं मेरे बारे में क्यों नही लिखते .हम गिड़गिड़ाकर बोले अरे अपन तो अभी इस ‘लाईन’ में नये नये आये हैं बहनजी ..आप शायद नही जानती कि जूतमबाजी के दंगल में उतरे दोनों खिलाड़ी धुरंधर खिलाड़ी हैं ..एक फुरसत से लिख्नने वाले इंसान हैं (उनके पास बहुत फुरसत है)  दूसरे इंडी-ब्लौग पुरस्कार प्राप्त … बात को काटकर फिर से सर में बजते हुए वो बोलीं कि फिर क्यों नारा लगाये फिरते हो कि “हम भी हैं लाईन में”....जब लाईन में हो तो लिखो हम पर ..और हाँ… हमारी हिस्ट्री पर भी लिखियो .. उन से ये वादा कर कि जरूर एक चिट्ठा लिखेंगे हम किसी तरह जान बचाकर भागे…तो पेश है ये चिट्ठा.. 

पर पहले ये तो बता दें कि कैसे हम सैंडल रानी के चुंगुल में फंस गये..

जब हमने चिट्ठाकारिता शुरू की तो कुछ ‘शुरुआती झटके’ लगे …. हुआ यूं कि हम इतने बड़े जुरासिक पार्क में पहली बार आये थे और एक साथ इतने सारे बड़े-बड़े लोगों को देख घबराहट में “ढैंचू- ढैंचू” चिल्लाने लगे .. ‘भाई’ लोग (कुछ दस्यु सुन्दरियां भी ) अपन को समझाये कि

” ढैंचू- ढैंचू ना चिल्लाओ ,

पढ़ो पढ़ाओ ,लाईफ बनाओ “

फिर एक भाई ने तो धमकी ही दे डाली कि नहीं सुनोगे तो ‘धूमकेतु” बना दिये जाओगे .हम तो पहले बहुत खुश हुए की चलो अब हम भी “धूम-2” , “धूम-3″ की तरह धूम-केतू” बन कर इतिहास में जगह पा जाऎंगे पर जब असलियत समझ में आयी तो सारी ‘अभिलाषाऎं’ बहते पानी की तरह बह गयी और हम होश में आ गये जैसे एक बार हॉस्टल में पूरी तरह टल्ली होने के बाद जब सामने से प्रिंसिपल को आता देखा था तो सारी की सारी ‘ओल्ड मोंक”  पुराने  सन्यासी (ओल्ड मोंक) की तरह गायब हो गयी थी. होश में आने के बाद जब देखा तो ठाना .. कि अब तो बस हम चिट्ठों को पढ़ेंगे और उनसे अच्छे बच्चों की तरह अच्छी- बातें सीखेंगे …वैसे भी हिन्दी में अच्छी चीजों के ब्लौग उपलब्ध भी हैं.

फिर क्या था हम पढ़ने लगे और गुनने लगे.. 

अब हमने पढ़ा कि तू मेरी पीठ खुजा मैं तेरी पीठ खुजाऊं ..वो भी एक सुंदरी से.. तो भय्या बात गांठ बांध ली .. कल अपन जब बस स्टेंड पर खड़े होकर मरफी के नियमों से दो चार हो रहे थे तो अचानक पीठ में खुजली सी हुई ..अब पीठ को खुजली खुद तो दूर कर नहीं सकते थे तो पढ़ी हुई बात याद आ गयी और सामने खड़ी सुंदरी की पीठ खुजाने लगे इस आशा में कि वो हमारी पीठ खुजा देगी ..पर ये क्या उसने तो खुजाने की जगह हमारा सर बजा दिया…. ये थी हमारी सैंडल रानी से पहली मुलाकात ..

अब कसम खायी कि बातों को अक्ष:रक्ष ना समझ कर उनमें निहित अर्थ को समझेंगे ..और उसी पोस्ट को फिर से पढ़ा तो पता चला कि आजकल कि नयी पृथा के अनुसार सुन्दरियां “टिप्पणीयों” (कमेंटस)  से बहुत खुश होती हैं ..शाम को घर लौटते समय फिर एक बस स्टेंड पर एक सुन्दरी को देखा और उस को खुश करने की ठानी ..और कमेंट्स पर कमेंट्स देने शुरु किये ..वो पहले तो  सुनती रही ..हम सोचे कि खुश हो रही है अचानक वो घूमी और उसने भी हमारा सर बजा दिया…

अब तो हम को कुछ भी सूझना बंद हो गया और हमारे सर का सूजना शुरू हो गया…बात पल्ले नहीं पड़ी अब क्या गलती हो गयी हमसे ..आप को समझ आये तो बुझाना..    

लो हम भी बातों बातों में कहां आ गये.. अभी ज्यादा फुरसत नहीं है ..कल फिर लिखेंगें .. नहीं तो सैंडल रानी फिर बज गयी तो…

अभी तो आप ये सुनिये…

एक ग्राहक (फोटोग्राफर से)-  क्या आप मेरा ‘पासपोर्ट साइज’ का फोटो खींच सकते हैं, जिसमें मेंरा सिर और जूता दोनों नजर आए।

फोटोग्राफर- क्यों नहीं साहब, बस आप अपने जूते सर पर रखकर बैठ जाएँ।

बांकी कल…जरूर आईयेगा..