May 17, 2007
मेरा ऎलान :ये मेरी व्यक्तिगत रुचि-अरुचि से जुड़ी हुई मौज है- आप इस पर या तो प्रशंसा भाव से (टिप्पणी) लिखें, या आलोचना की एक ग्राह्य शैली में ही अपनी (टिप्पणी) बात रखें. लेकिन जो भी करें …करें जरूर.
अभी आज ही जब हमने इतना अच्छा गाना गाया तो लोगों ने सुना ही नहीं (अभी भी सुन लीजिये भाई) ….. बस कुछ लोग आदतन आये और पीठ थपथपा के निकल लिये… हमारे भेजे में ये बात ही नहीं आयी कि ऎसा आखिर क्यों कर हुआ …हम सिर पकड़ कर बैठ गये कि कुछ शोर सा हुआ …फिर ध्यान से सुना तो कुछ आवाजें सुनायी दी…आवाजें पड़ोस से ही आ रहीं थी.
बाहर निकले..जैसे जैसे नजदीक बढ़ते गये शोर बढ़ता गया….
एक : मैं तुम्हारे सामाजिक दायित्वबोध से खुश नहीं हूँ.
दो : लेकिन मेरी दाल-भात…
इस शोर गुल के बीच हम मौकाए वारदात पर पहुंचे… पास जाकर देखा तो अपने ही पड़ोस के दो दुकानदार थे जो आपस में लड़ रहे थे. हमने बीच बचाव करते हुए एक से पूछा …जो ज्यादा हल्ला मचा रहा था और ऊंची ऊंची आवाज में बोल रहा था….
भाई आखिर बात क्या है…किस बात की लड़ाई है….
एक : अरे ये जो पंडित जी है ना…
हम : कौन पंडित जी…???
तभी हमारी नजर गुलाबी गमछा-धारी सज्जन पर पड़ी… इतनी गरमा गरमी से माथे पर पसीने की बूदें चुहचुहा रहीं थी… माथे का पसीना गमछे से पोंछ्ते हुए बोले..
दो : देखिये मेरी यहां पर एक दुकान है …जिसमें मैं खुद दाल-भात बनाता हूँ… खुद भी खाता हूँ और लोगों को भी खिलाता हूँ….
तो …!!! हमने पूछा …
एक : अरे यहीं हमरी भी एक दुकान है….
हम : और … आप क्या बेचते हैं….????
एक : हम सभी कुछ बेचते हैं …. बिरयानी…. नमक मिर्च लगा के चिकन…मटन.. .मच्छी…
पंडित जी : छी: ..छी: ..छी: ..छी: ….. नाक भों सिकोड़ कर पंडित जी बोले.
हमारा : तो आप पूरी तरह शाकाहारी है .
एक : शाकाहारी..!!…. ये जनाब तो प्याज लहसुन भी नहीं खाते….
हम : तो इसीलिये इनको …आपसे प्रोब्लम है….
एक : अरे प्रोब्लम इनको हमसे नहीं ….हमको इनसे है…
हम : वो क्यों….???
एक : अरे आजकल लोग इनकी दाल-भात को हमारी बिरयानी से ज्यादा पसंद कर रहे हैं…
हम : लेकिन लोग तो पहले वो नमक मिर्च वाला …चिकन …मटन ….
दो : खाते थे…लेकिन जब साफ-सुथरा,स्वादिष्ट,स्वास्थवर्धक भोजन इतने कम दामों में मिले तो लोग वो क्यों लें ये ना लें…
हम : मान गये भाई पंडित जी …
पं : किसे…..
हम : आपकी पारखी नजर और आपके दाल भात को….
एक : लेकिन इससे मैं तो नहीं मानुंगा ना….
हम : क्यों…??
एक : अरे मेरा नुकसान हुआ जा रहा है और आप….
अब “एक” तैश में आ गये थे. हमने उनसे पूछा …क्या आप भी खाना खुद ही बनाते हैं ??
एक : कोशिश तो करता हूँ ..पर मुझसे ढंग का खाना बनता ही नहीं..इसलिये ज्यादा नहीं बनाता ..
तो क्या करते हैं ??
एक : मैं तो दूसरों के बनाये खाने को अपनी दुकान में सजाता हूँ …हाँ खाना कैसा भी हो,किसी ने भी बनाया हो उसे नमक मिर्च लगा के सजाने का काम मैं ही करता हूँ और अपने मन माफिक परोसता हूँ …
वो ठीक है … लेकिन आपको दूसरों के दुकान के खाने से क्या मतलब…?? कोई बिरयानी खाये-खिलाये या दाल भात ..क्या फरक पड़ता है….?????
एक : नहीं जी .. फरक कैसे नहीं पड़ता ..यदि किसी की दाल भात की दुकान चल निकली तो मेरे लजीज व्यंजनों का क्या होगा…?
हम : लेकिन व्यंजन तो आपको लजीज लगते हैं …हो सकता है लोगों को वो पसंद ना हों…
एक : अरे पसंद करना पड़ेगा … कैसे नहीं करेंगे …??? जब ये अपनी दुकान में दाल-भात रखेंगे ही नहीं तो फिर उसे खायेगा ही कौन….? भूखा आदमी इधर ही आयेगा ना …!! उनके होंठों पर कुटिल मुस्कान थी….
उनकी बात सुनकर पंडित जी भड़क उठे ..अरे ये क्या बात हुई … मेरी दुकान है… मैं निर्धारित करुंगा कि मुझे क्या बेचना है…
तभी पीछे खड़े और अभी तक चुपचाप सारा माजरा देखने वाले चूहा नुमा एक व्यक्ति सामने आये और बोले….(उन को ठीक से हिन्दी भी नहीं बोलनी आ रही थी…गले से आवाज नहीं निकल रही थी….पर फिर भी बोले….)
आप इतना भड़कीये मत पंडित जी की यहां पर आपका जो मन करेगा वही माल बेचेंगे…!!! …नहीं…. आपका एक सामाजिक जीवन है और ताक़त के षडयंत्र को समझने सोचने वाले लोग बहुत नहीं हैं इसलिए आप जैसे ही लोगों से उम्मीद की जाती है तभी कोई बात कही जाती है और कोई वाद और गुट का मामला नही है हम लोगों को एक बेहतरीन समाज बनाने के क्रम मे कई भावुक और परंपरागत बातों को छोड़कर अपने आप में भी बदलाव लाना होगा. बेचारों का विकास होते रहना चाहिए ताकि भाई…. चारा बरक़रार रह सके.
अब वो भाई कौन से चारे की बात कर रहे थे ये तो हमें समझ में आया नहीं. हमने फिर बीच बचाव करते हुए उनसे कहा….देखिये महोदय आप चुप रहिये…और “एक” से बोले…
अरे पंडित जी को लगा लेने दो ना जिस भोजन की दुकान लगाना चाहते हैं ..आप क्यों बेकार की बहस में पढ़ते हैं.
देखिये ये एक सार्वजनिक स्पेस में अपने भोजन को ला रहे हैं- इसलिए उस पर बात-बहस तो होगी।
लेकिन हम तो सिर्फ भोजन ही बेच रहे हैं ..हमें दाल भात अच्छा लगता है इसलिये वही बनाते,खाते खिलाते हैं……पंडित जी थोड़ा भावुक होकर बोले….
एक : सार्वजनिक संवाद में इस कदर भावुक होंगे, तो काम नहीं चलेगा।
पंडित जी : तो क्या करूं .. लड़ूं आपसे …!!
एक : नहीं ….हमारा समर्थन कीजिये…
पंडित जी : जी नहीं ..मैं आपका समर्थन नहीं करता ..
एक : तो आप हमारा विरोध करते हैं…!!
पंडित जी : जी नहीं ..मैं आपका विरोध भी नहीं करता ..
एक : ये क्या कुछ तो करना ही पड़ेगा ही ना…
हम : अरे ये तो वही बात हो गयी … हम तो डूबेंगे सनम तुमको भी ले डूबेंगे.
पंडित जी : कहने तो ये भी कह सकते हैं … आप डूबे बामना , ले डूबे जजमान…
अब जो भी है इस किस्से को यहीं खतम करो ना यार…हमारी बात सुन कर वो लोग थोड़े संभले…
अब रात ज्यादा गहरा रही थी…दोनों अपने अपने पक्ष में कुछ और तर्क जुटाने ,थोड़ी और भीड़ बढ़ाने के इरादे से अपनी अपनी राह चल दिये…
हम दोनों को जाते देर तक देखते रहे…फिर हम भी घर की ओर चल दिये….



May 17, 2007 at 6:28 am
आप की व्यंग्य की मार घातक है.. और तस्वीरों की और भी ज़्यादा.. सही है भाई..
May 17, 2007 at 6:45 am
पहले अभय जी का पोस्ट आ गया तो अब मैं भी बोल ही दु। कक्ष जी पहले तो ये बता दे कि आपने अच्छा कटाक्ष लिखा है। चित्रो का चयन तो सुभान अल्लाह । लेकिन शायद ये लिख कर आपने एक के दुकान का प्रचार कर दिया। बुराई भी एक तरीके का prachar है। जो आपको नही पसंद उसे ना तो देखे ना ही बात करे। आत्मविस्वास का टूटना अच्छे अच्छो कि दुकान बंद कर देता है। वैसे दुकान में जाये ही ना। दुकान का ना चलना बहुत बड़ा चोट होगा।
May 17, 2007 at 6:48 am
आपका लेख अपनी तरफ. अपना वोट दाल-भात को. जात बिरादरी का मामला है. बाभन का पक्ष ही लेना है!
May 17, 2007 at 6:48 am
बहुत सही, करारा व्यंग्य.
May 17, 2007 at 6:49 am
हमने बाहर खाना बहुत कम कर दिया है और अपनी ही दुकान का कच्चा-पक्का खा लेते हैं।
कटाक्ष की धार तेज है…
May 17, 2007 at 7:51 am
दाल-भात ज़िन्दाबाद! (दाल-भात बचा रहे) .
May 17, 2007 at 8:06 am
आज का दाल भात अच्छा लगा अब आपका और भी अच्छा मै कहने और पढने का कार्य इन दुकाने से छॊड चुका हू पर आपने आज मेरी अभीलाषा पूर्ण की धन्यवाद मुझे दाल भात आपकालेख पढकर पढना पडा वो भी तारीफ़ के काबिल था
May 17, 2007 at 8:06 am
मजा आ गया
May 17, 2007 at 9:45 am
May 17, 2007 at 10:42 am
पसंद अपनी-अपनी।
May 17, 2007 at 7:05 pm
बिरयानी बढिया है
May 18, 2007 at 8:47 am
ये तो शायद अचार या लहसुन अदरक की करारी चटनी थी. बिरयानी का भी स्वाद सकती है और दाल भात का भी.
सचमुच मजेदार!
May 18, 2007 at 8:47 am
ऊपर स्वाद सकती है को स्वाद बढ़ा सकती है पढ़ें
May 23, 2007 at 10:26 pm
ବହୁତ ସୁନ୍ଦର ବ୍ଲୋଗ୍ ଟିଏ କରିଛନ୍ତି. ଯାହା ହେଉ ଓଡିଆ ଲିପିରେ ଏହାକୁ ପ୍ରକାଶନ କରିଥିବାରୁ ମୁଁ ଆପଣଙ୍କୁ ଅଶେଷ ଧନ୍ୟବାଦ ଜଣାଉଛି. ଏହାର ଅନୁକରଣ କରି ଆପଣ ଏକ ଓଡିଆ ଭାଷାରେ ବ୍ଲଗ୍ ଟିଏ ନିର୍ମାଣ କଲେ ପ୍ରୀୟ ଓଡିଆ ଭାଇ ଭଉଣୀ ମାନେ ଆପଣଙ୍କ ଉପରୋକ୍ତ ସୁନ୍ଦର ହସକଥା ଗୁଡିକର ମଜା ନେଇ ପାରିବେ.
ଧନ୍ୟବାଦ
ବନ୍ଦେ ଉତ୍କଳ ଜନନୀ
हिन्दी में ..काकेश द्वारा
( बहुत सुन्दर ब्लोग् टिए करिछन्ति. याहा हेउ ओडिआ लिपिरे एहाकु प्रकाशन करिथिबारु मुँ आपणङ्कु अशेष धन्य़बाद जणाउछि. एहार अनुकरण करि आपण एक ओडिआ भाषारे ब्लग् टिए निर्माण कले प्रीय़ ओडिआ भाइ भउणी माने आपणङ्क उपरोक्त सुन्दर हसकथा गुडिकर मजा नेइ पारिबे.
धन्य़बाद
बन्दे उत्कळ जननी)
May 23, 2007 at 11:28 pm
[...] उसका पहला लाभ पता चला. जब मेरी सात दिन पहले लिखी हुई पोस्ट पर उड़िया भाषा में एक टिप्पणी [...]