प्यार की निष्ठाओं पर उठते सवालों के बीच रहता हूँ इस घर में
शब्द ,जब मौन की धरातल पर सर पटक चुप हो जायें
आस्था, जब विडम्बना की देहली पर दस्तक देने लगे
गीली आँखों के कोने में कोई दर्द , बेलगाम पसरा हो
तनहाइयां ,जब चीख के बोलना भूल जायें
आसमान ,अपनी स्वतंत्रता के अहसास को कोसने लगे
बर्बादियों से रिश्ता कायम करना आसान हो जाये
अंगुलियाँ , तेरे चेहरे से जुल्फ हटाने में भी कांपने लगे
समझा पाओ तो समझाना
कि क्यों
रिश्ते की बुनियाद पर खड़ा महल
आज खंडहर बनने को बैचेन है
प्यार अब ताकता है सिर्फ दीवाल
और पसर कर सो जाते हैं हम
फिर उसी बिस्तर पर
एक दूसरे की ओर पीठ किये
काकेश – 16.04.2007

April 16, 2007 at 3:38 am
कुछ देर और पकड़ो आस्था की डोर को…
बस अब थोड़ी ही देर है होने में भोर को….
April 16, 2007 at 3:45 am
कविता अच्छी लगी….कहना रह गया था।
April 16, 2007 at 4:18 am
बढ़िया कविता, बधाई!!
April 16, 2007 at 5:26 am
बहुत सुन्दर!
घुघूती बासूती
April 16, 2007 at 7:18 am
बहुत अच्छे काकेश भाई । भावों को अच्छी तरह बाँधा है इस कविता में ।
April 16, 2007 at 2:51 pm
काकेश जी,
मन के भावों को ज्यों का त्यों रख दिया है आपने
बेजी जी की बात पर ध्यान दें