कल लिखना तो चाहता था अपनी “नराई” के बारे में पर लिखते लिखते चिट्ठाजगत पर लिखने बैठ गया. कारण शायद ये रहा कि मुझे भी लगा यदि मैं किसी विषय विशेष पर लिखुं तो मैं भी किसी खांचे में ढाल दिया जाऊंगा और लोग भी वही करेंगे जो आम तौर पर अन्य चिट्ठों के लिये करते हैं यानि चयनित पठन ( सलेक्टिव रीडिंग ) वैसे तो उम्मीद से ज्यादा ही टिप्पणीयां आयीं जिससे ये मन हुआ कि इसी विषय पर और कुछ लिखा जाये पर अभी वापस लौटते हैं “नराई” पर नहीं तो लोग कहेंगे कि “नराई” के बहाने मैं भी “बकरी और बिल्ली” को गुरु बनाने में तुला हुआ हूँ
मेरा पहाड़ से क्या रिश्ता है ये बताना मैं आवश्यक नहीं मानता पर पहाड़ मेरे लिये ना तो प्रकृति को रोमांटिसाईज करके एक बड़ा सा कोलार्ज बनाने की पहल है ना ही पर्यावरणीय और पहाड़ की समस्या पर बिना कुछ किये धरे मोटे मोटे आँसू बहाने का निठल्ला चिंतन ( तरुण जी इसे अन्यथा ना ले लें ये आपके लिये नहीं है ). ना ही पहाड़ मेरा अपराधबोध है ना ही मेरा सौन्दर्यबोध. मेरे लिये पहाड़ माँ का आंचल है ,मिट्टी की सौंधी महक है , ‘हिसालू’ के टूटे मनके है , ‘काफल’ को नमक-तेल में मिला कर बना स्वादिष्ट पदार्थ है , ‘क़िलमोड़ी’ और ‘घिंघारू’ के स्वादिष्ट जंगली फल हैं , ‘भट’ की ‘चुणकाणी’ है , ‘घौत’ की दाल है , मूली-दही डाल के ‘साना हुआ नीबू’ है , ‘बेड़ू पाको बारामासा’ है , ‘मडुवे’ की रोटी है ,’मादिरे’ का भात है , ‘घट’ का पिसा हुआ आटा है ,’ढिटालू’ की बंदूक है , ‘पालक का कापा’ है , ‘दाणिम की चटनी’ है क्या क्या कहूँ …लिखने बैठूं तो सारा चिट्ठा यूँ ही भर जायेगा. मैं पहाड़ को किसी कवि की आँखों से नयी-नवेली दुल्हन की तरह भी देखता हूं जहां चीड़ और देवदारु के वनों के बीच सर सर सरकती हुई हवा कानों में फुसफुसाकर ना जाने क्या कह जाती है और एक चिंतित और संवेदनशील व्यक्ति की तरह भी जो जन ,जंगल ,जमीन की लड़ाई के लिये देह को ढाल बनाकर लड़ रहा है . लेकिन मैं नहीं देख पाता हूँ पहाड़ को तो.. डिजिटल कैमरा लटकाये पर्यटक की भाँति जो हर खूबसूरत दृश्य को अपने कैमरे में कैद कर अपने दोस्तों के साथ बांटने पर अपने की तीस-मारखां समझने लगता है.
पहाड़ ,शिव की जटा से निकली हुई गंगा है .कालिदास का अट्टाहास है .पहाड़ सत्य का प्रतीक है .जीवन का साश्वत सत्य है . कठिन परिस्थितियों में भी हँस हँस कर जीने की कला सिखाने वाली पाठशाला है. गाड़, गध्यारों और नौले का शीतल , निर्मल जल है .तिमिल के पेड़ की छांह है , बांज और बुरांस का जंगल है . आदमखोर लकड़बग्घों की कर्मभूमि है . मिट्टी में लिपटे ,सिंगाणे के लिपोड़े को कमीज की बांह से पोछ्ते नौनिहालों की क्रीड़ा-स्थली है . मोव (गोबर) की डलिया को सर में ले जाती महिला की दिनचर्या है . पिरूल सारती ,ऊंचे ऊंचे भ्योलों में घास काटती औरत का जीवन है . ![]()
कैसे भूल सकता है कोई ऎसे पहाड़ को .पहाड़ तूने ही तो दी थी मुझे कठोर होकर जीवन की आपाधापियों से लड़ने की शिक्षा . कैसे भूल सकता हूँ मैं असोज के महीने में सिर पर घास के गट्ठर का ढोना ,असोज में बारिश की तनिक आशंका से सूखी घास को सार के फटाफट लूटे का बनाना, फटी एड़ियों को किसी क्रैक क्रीम से नहीं बल्कि तेल की बत्ती से डामना फिर वैसलीन नहीं बल्कि मोम-तेल से उन चीरों को भरना , लीसे के छिलुके से सुबह सुबह चूल्हे का जलाना , जाड़े के दिनों में सगड़ में गुपटाले लगा के आग का तापना , “भड्डू” में पकी दाल के निराले स्वाद को पहचानना. तू शिकायत कर सकता है पहाड़ ..कि भाग गया मैं , प्रवासी हो गया , भूल गया मैं ….लेकिन तुझे क्या मालूम अभी भी मुझे इच्छा होती है “गरमपानी” के आलू के गुटके और रायता खाने की .अभी भी होली में सुनता हूँ ‘तारी मास्साब’ की वो होली वाली कैसेट …अभी भी दशहरे में याद आते है “सीता का स्वय़ंबर” , “अंगद रावण संवाद”, “लक्ष्मण की शक्ति” . अभी भी ढूंढता हूँ ऎपण से सजे दरवाजे और घर के मन्दिर .अभी भी त्योहार में बनते हैं घर में पुए , सिंघल और बड़े. कहाँ भूल पाऊंगा मैं वो “बाल मिठाई” और “सिंघोड़ी” , मामू की दुकान के छोले और जग्गन की कैंटीन के बिस्कुट .
तेरे को लगता होगा ना कि मैं भी पारखाऊ के बड़बाज्यू की तरह गप मारने लगा लेकिन सच कहता हूं यार अभी भी जन्यू –पून्यू में जनेऊ बदलता हूं , चैत में “भिटोली” भेजता हूं , घुघुतिया ऊतरैणी में विशेष रूप से नहाता हूं ( हाँ काले कव्वा ,काले कव्वा कहने में शरम आती है ,झूठ क्यूं बोलूं ) , तेरी बोजी मुझे पिछोड़े और नथ में ही ज्यादा अच्छी लगती है .मंगल कार्यों में यहाँ परदेश में “शकुनाखर” तो नहीं होता पर जोशी ज्यू को बुला कर दक्षिणा दे ही देता हूं .
तू तो मेरा दगड़िया रहा ठहरा.. अब तेरे को ना बोलूं तो किसे बोलूं .तू बुरा तो नहीं मानेगा ना ..मैं आऊंगा तेरे पास . गोलज्यू के थान पूजा दूंगा ..नारियल ,घंटी चढाऊंगा .. बाहर से जरूर बदल गया हूँ पर अंदर से अभी भी वैसा ही हूँ रे ..तू फिकर मत करना हाँ..
ना जाने क्या-क्या लिख डाला, ना जाने कितनी नराई लगा बैठा .बहुत से शब्द आपकी समझ में नहीं आये होंगे ना…अभी क्षमा करें ..हो सका तो अर्थ बाद में बताऊंगा.
अप्रैल 10, 2007 at 5:05 pm
हमारे लिए भी तो पहाड़ यही सब है। बार बार उस पहाड़ की याद आती है। कई बार मन करता है चलो वापस अपने पहाड़ पर। वो दुनिया कितनी शांत कितनी अलग है।
‘क्वोदा’ की रोटी और ‘कनादी’ का डंक भूल गए आप।
चिंता न करें, इन शब्दों को समझने वाले आज की तारीख में कम से कम पाँच बंदे तो चिट्ठाजगत में हैं ही।
अप्रैल 10, 2007 at 9:01 pm
इसे पढके तो यही लगा कि आप भी अपनी तरह ही पहाड़ी हैं पहाड़ के बारे में ये वो ही लिख सकता है जिसके रस रस में वो बसा हो, रस रस में जो बसा हो वो याद आयेगा तो नराई तो लगेगी ही। अपनी तो उम्र ही इन पहाडो पर बीती है इसलिये आपने जो भी लिखा है उस का इक इक शब्द हमारे ऊपर एकदम फिट बैठता है।
‘हिसालू’ के टूटे मनके है , ‘काफल’ को नमक-तेल में मिला कर बना स्वादिष्ट पदार्थ है , ‘क़िलमोड़ी’ और ‘घिंघारू’ के स्वादिष्ट जंगली फल हैं , ‘भट’ की ‘चुणकाणी’ है , ‘घौत’ की दाल है , मूली-दही डाल के ‘साना हुआ नीबू’ है , ‘बेड़ू पाको बारामासा’ है , ‘मडुवे’ की रोटी है ,’मादिरे’ का भात है , ‘घट’ का पिसा हुआ आटा है ,’ढिटालू’ की बंदूक है , ‘पालक का कापा’ है , ‘दाणिम की चटनी’ है क्या क्या कहूँ
आपको ये पोस्ट बिल्कुल नही लिखनी चाहिये थी अब इस बात की नराई दूर होने में मुद्दत लग जायेगी।
अप्रैल 11, 2007 at 1:45 am
shivani ji’style recreated. well done.
अप्रैल 11, 2007 at 1:54 am
हाँ काकेशजी, शब्द तो बहुत से नहीं समझ में आए, पर यह जरूर समझ में आ गया कि अपनी जड़ों की ‘नराई’ लगती है तो कैसा लगता है। नराई शब्द का तात्पर्य घुघूती बासूतीजी से जाना था।
आपने ऐसा लिखा है मन करता है कि वहीं जाकर बस जाऊँ।
व्यंजन समझ में भले ही न आए हों परंतु बहुत स्वाद लगे हैं। आप अपने संस्मरण यूँ ही परोसते जाएँ।
अप्रैल 11, 2007 at 11:12 pm
[...] मैं बैचेन हूँ.. इसलिये नहीं की मेरी पिछली पोस्ट “निश:ब्द” की तरह पिट गयी.. इसलिये भी [...]
अप्रैल 12, 2007 at 6:17 am
इसी याद पर घुघुती जी ने भी लिखा था, आशा है आपने पढ़ा होगा। न तो जरूर पढं लें।
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पता नही कहने का साहस नहीं क्योंकि आपने हमारी बिरादरी के लोगों को पहले ही दुरदुरा दिया है लेकिन एक विनम्र सी अरज हे कि अविश्वास न करें पर पहाड़ गैर पहाडि़यों को भी पराए नहीं मानते। वे उन्हें ताकत भी देतें हैं शायद पर हमें तो वे हर बार और विनम्र बनाते हैं।
अप्रैल 15, 2007 at 4:55 pm
[...] से जुदा होते ही नराई के बहाने, बकौल काकेश – मेरा पहाड़ से क्या रिश्ता है ये बताना [...]
अप्रैल 15, 2007 at 10:38 pm
चलो आज नौराई दिवस ही मना लें । मैं तो आज भी आलू के गुटके, सिंघल, पुऐ बनाती हूँ । दिवाली पर एँपण देती हूँ । मेरे देशवाली पति भी दाडू, पडिया, पलयो, शब्दों का उपयोग करते हैं । आज भी जब वे अचानक आ जाते हैं तो माँ की सुनाई कहानी के अनुसार बोलते हैं, (स्वयं के लिए), ‘को छू रे तू भागवान ना पुछडी ना गाछडी लमालम बीतरहूँ ऊँडी ‘!
बौजू लहंगे पिछौड व नथ में आपको अधिक भाती हैं सुनकर मुझे भी अपने रंगवाली पिछौड की याद आ गई और याद आई उन्हें रंगने का ढ़ंग !शकुनाखर भी जैसे ….. सुन्दरी घ्वेरे , और बारात जाने के बाद घर में होते स्त्रियों के स्वांग । ओ इजा ओ बौज्यू भी । सिसूण के काँटे भी । 
घुघूती बासूती
June 4, 2007 at 9:01 am
Aaj mee thain bhi khud lageen ch aur yaad aani ch neerai ki ajj bhi yaad ch maa thian jab maan ji aur nani ji punguda maan nerai kada cha, aur mianunga dagda main jayun rendu cho , aur phir meri didi ji chay bne kar lende che, kan bhalu lagdu cho kode ki Rotio ghee aur chay. Aaj bhi jab main ghur janu chon ta yehi ummed kardu chon ki koita ho oon pugdiyon maa jakh mere maan ji gham main Neerai kadi che.
June 22, 2007 at 5:06 am
भाई धन्यवाद
मैं मिस कर गया था, लिंक भेजने के लिए शुक्रिया. बहुत ही सुंदर लिखा है आपने, तरसा के छोड़ दिया, और लिखिए पहाड़ के बारे में, हम पढ़ना चाहेंगे. थोड़ा थोड़ा चखाने, नाम भर बताने से काम नहीं चलेगा ज़रा ठीक से भर पेट एक दिन पहाड़ी खाना खिलाइए, उसके बाद सैर पर निकलते हैं, चीड़ देवदार और बुरांश के जंगल में….
September 12, 2007 at 2:53 pm
Hi!
Bhut se logo ne bahut kuch kah diya. Narai mujhe bhi laga di aapne. Pahad hamare liye Bhugol nahi ek ahsas hai, apane astitava ka. Mujhe isi sandarbh mei Rasool Hamjat ki “Mera Dagistaan” Yaad aati hai. Or akshar Narai ke bahane fir uske paanne palatane lagati hoo. Ek bada achcha kissa hai is kitab mei. “ek pahari pakshi ko pinjare mei kaid kar door kahi, ek ameer ke ghar mei rakha jata hai. Pakshi sirf pahad ki ratt lagata hai or sone ka pinja, behtar baag, mausam use bhate nahi. Ameer pakshi to chod deta hai, or uska peecha karate huye ek banjar pahad par pahunchta hai, or pareshan ho jaata hai ki kya hai yahan?”. Pakshi ka vahan sab kuch hai, par Baharwale ke liye kuch bhi nahi.
Ham sabka lagav bhi pahad ke sath aisa hi hai, use shabdo mei bandhna bahut muskil hai.
September 16, 2007 at 8:21 am
bahut achhi baat hai apne ghar se kise pyaar na ho wo bhi khoobsurat pahari ho to aur bhi suhana lagta hai…… main bhi garhali hoon meru nao ch Pushkar Singh Rana Ruderpryaag Garhwal